शुक्रवार, 13 जुलाई 2012

> नायक जो लडना जानता था
कहने को हिन्दी सिनेमा में 1962 भले ही 'साहब बीबी और गुलाम' के लिए याद की जाती है, लेकिन वास्तव में 1962 में आयी किसी फिल्म ने यदि हिन्दी सिनेमा का स्वभाव बदल दिया तो वह फिल्म थी, दारा सिंह की 'किंग कांग'। 'किंग कांग' 50 के दशक में विश्व चैंपियन पहलवान थे जिन्हे दारा सिंह ने अखाडे में पटकनी देकर फ्री स्टाइल कुश्ती में भारतीय वर्चस्व को स्थापित किया था। फिल्म की पूर्वपीठिका भी यही थी, जाहिर है दारा सिंह नायक की भूमिका में थे। 'गजनी' को लेकर जब आज हम अति उत्साहित होते हैं तो किंग कांग की याद स्वाभाविक है कि उस समय भी किसी नायक ने अपनी पहली बडी भूमिका नकारात्मक टाइटिल के साथ भी निभाने में संकोच नहीं किया था। दारा सिंह 1952 में जब फिल्मों में आए तो वह 'आन', 'बैजू बावरा', 'दाग' जैसी सामाजिक फिल्मों का दौर था, देश तुरंत आजाद हुआ था, पंचवर्षीय योजनाओं में देशवासियों को सुनहरे भविष्य की झलक दिखने लगी थी ,ऐसे में 'संगदिल' में अवसर मिला दारा सिंह को,एक छोटी सी भूमिका के लिए। साथ में थे दिलीप कुमार। बावजूद इसके दारा सिंह पहचान लिए गए, लेकिन अभिनेता के रुप में नहीं अपनी निजी पहचान से जो उन्होंने वर्षों की मशकक्त से हासिल की थी। आश्चर्य नहीं कि दारा सिंह अपने सक्रिय जीवन में ही किंवन्दति बन गए। दारा सिंह भारतीय ताकत के पर्याय के रुप में स्वाकार कर लिए गए। शायद इसीलिए 60 वर्ष से उपर की उम्र में टेलीविजन धारावाहिक रामायण में हनुमान की भूमिका उन्होंने इस तरह निभाई कि कालान्तर में हनुमान के प्रतीक रुप में वे स्वीकार कर लिये गए। 2003-2009 तक वे सांसद भी रहे। लेकिन इन तमाम पहचानों के बावजूद दारा सिंह हिन्दी सिनेमा के एकमात्र अभिनेता रहे जिन्होंने अपनी मूल पहचान कभी नहीं खोयी। उनकी सार्वजनिक पहचान पहलवान की थी और आजीवन उन्होंने उस पहचान का सम्मान किया। खेलों की लोकप्रियता को लेकर चिंतित आज की पीढी शायद चकित भी हो सकती है कि क्रिकेटर के अलावे भी किसी खिलाडी को कैसे इस कदर लोकप्रियता मिल सकती है। कहा जाता है दारा सिंह की कुश्तियों का आयोजित होना किसी भी शहर के लिए एक महत्वपूर्ण परिघटना होती। कुश्ती के पहले और बाद वर्षों तक उसके अनुभव लोग एक दूसरे से बांटने का सुख उठाते रहते। अमृतसर के पास धरमूचक में जन्म लिया था दारा सिंह ने।उनके भाई थे रन्धावा । दोनों भाइयों को बचपन से ही कसरत का शौक था। अखाड़े में जाकर वे रोज दण्ड पेलते थे और कहा जाता है कि 100 बादाम, दूध-मक्खन के साथ रोज खाते थे। लेकिन पिता नहीं चाहते थे कि उनका बेटा पहलवान बने। पिता का मानना था कि पहलवानों के अंतिम दिन बेहद परेशानी में गुजरते हैं और उसे काफी परेशानियों का सामना करना पड़ता है। दारा सिंह के चाचा ने बढ़ावा दिया और दोनों भाइयों को पहलवान बनाया। दोनों ने छोटी उम्र से ही पहलवानी की शुरूआत कर दी और गाँव के दंगलों से लेकर शहरों तक में ताबड़तोड़ कुश्तियाँ जीतकर अपने गाँव का नाम रोशन किया। लेकिन दारा की बात अलग थी। कुश्ती के प्रति इनकी दीवानगी का यह आलम था कि नवम्बर19 1928को जन्मे दारा सिंह लगभग 20 वर्ष की उम्र में गांव से आगे विश्वविजय के लिए निकल पडे। 1947 में दारा सिंह सिंगापुर आ गये। वहाँ रहते हुए उन्होंने भारतीय स्टाइल की कुश्ती में मलेशियाई चैम्पियन तरलोक सिंह को पराजित कर कुआलालंपुर में मलेशियाई कुश्ती चैम्पियनशिप जीती। एक पेशेवर पहलवान के रूप में सभी देशों में अपनी धाक जमाकर वे में भारत1952 लौट आये। उनकी लोकप्रियता को भुनाने के उद्देश्य से शीघ्र ही हिन्दी सिनेमा उनके आगे रोल की झोली फैला कर हाजिर हो गया। फिल्मों में काम की शुरुआत तो उन्होंने कर दी लेकिन कुश्ती की ललक नहीं छूटी। 1954 में वे भारतीय कुश्ती चैम्पियन बने। उसके बाद उन्होंने कामनवेल्थ देशों का दौरा किया और विश्व चैम्पियन किंगकांग को परास्त कर दिया। बाद में उन्हें कनाडा और न्यूजीलैण्ड के पहलवानों से खुली चुनौती मिली। जिसका जवाब उन्होंने 1959 में.कलकत्ता में हुई कामनवेल्थ कुश्ती चैम्पियनशिप में कनाडा के चैम्पियन जार्ज गार्डियान्को एवं न्यूजीलैंड के जान डिसिल्वा को धूल चटाकर दिया। दारा सिंह ने उन सभी देशों का दौरा किया जहाँ फ्रीस्टाइल कुश्तियाँ लड़ी जाती थीं। अंततः29 मई 1968 को अमरीका के विश्व चैम्पियन लाऊ थेज को पराजित कर फ्री स्टाइल कुश्ती के विश्व चैम्पियन बन गये। 1983 में उन्होंने अपराजेय पहलवान के रूप में कुश्ती से सन्यास ले लिया। दारा सिंह ने कुश्ती से भले ही संन्यास ले लिया लेकिन कुश्ती के प्रति उनका लगाव कभी कम नहीं हो सका। कुश्ती के छोटे बडे किसी आयोजन के आमंत्रण को शायद वे कभी नहीं टाल सके। जिस किसी अखाडे ने उनसे सहयोग की गुजारिश की, उसके सहयोग को वे तत्पर रहे। हालांकि उनके प्रशंशकों को उम्मीद थी कि दारा कुश्ती से संन्यास लेने के बाद अपना पूरा समय फिल्मों को दे सकेंगे,और उनका शारिरिक सौष्ठव वास्तविक जीवन में न सही परदे पर दिखता रहेगा, लेकिन निश्चय ही यदि सार्वजनिक जीवन में सक्रिय रहने की गुंजाइश होती तो दारा सिंह उसे कुशती में ही लगाना पसंद करते। फिल्मों में काम उन्होंने अवश्य जारी रखा लेकिन शायद अपनी सीमा का अहसास था उन्हें, कभी भी उन्होंने अभिनय में चुनौती लेने की कोशिश नहीं की। उन्होंने वही भूमिका स्वीकार की जो उनके व्यक्तित्व से मेल खाती थी । जब वी मेट में पंजाब के एक परिवार के मुखिया के रुप में वे दिखते हैं परदे पर बडे बडे मेथड एक्टरों को चुनौती दे डालते हैं। जवानी के दिनों में दारासिंह बेहद हैंडसम थे। ऊंचा कद, चौड़ा सीना, मजबूत बांहे और सहज भोली मुस्कान । वह दौर नाजुक नायकों का था,पारिवारिक सज्जन सुंदर। दारा सिंह ने हिन्दी सिनेमा को एक नया नायक दिया जो लडना जानता था। मारधाड़ वाली फिल्म बनाने वालों को ऐसा हीरो चाहिए था जो उनकी फिल्मों में फिट बैठ सके। दारा सिंह के बारे में सबसे अहम बात यह थी कि वे ऐसी भूमिकाओं में विश्वसनीय लगते थे क्योंकि विश्व विजेता पहलवान का तमगा उनके साथ जुडा था। उनको लडते देख दर्शकों को विश्वास हो जाता कि वे वाकइ लड सकते हैँ।आज जब अपनी भूमिका में फिट बैठने के लिए सितारों को सिक्स पैक की तैयारी में खास तौर से जुटा देखते हैं दारा सिंह की अहमियत का अहसास होता है। उस दौर में तलवार बाजी, स्टंट्सम और फाइटिंग वाली फिल्मों का एक अलग ही दर्शक वर्ग था। यह नायक सिनेमा के व्याकरण पर कितना सही था,यह अलग विमर्श का विषय हो सकता है लेकिन इससे इन्कार नहीं किया जा सकता कि आने वाले दिनों में वही हिन्दी सिनेमा का भविष्य बनी। आज यही हिन्दी सिनेमा की मुख्यधारा है। अमिताभ बच्चन से लेकर दबंग सिंघम तक देखते हुए आप दिलीप कुमार को याद नहीं कर सकते ,दारा सिंह को ही याद कर सकते हैं। दारासिंह की शुरुआती फिल्मों के नाम भी उनके व्यक्तित्व के अनुरुप रखे जाते थे, रुस्तम-ए-रोम, रुस्तम-ए-बगदाद, फौलाद क्योंकि जब दर्शक दारा सिंह की फिल्म देखने जाते तो उन्हें सिर्फ दारा सिंह चाहिए था,कहानी तकनीक वगैरह दारा सिंह की लोकप्रियता के सामने बेमानी हो जाते थे । इन फिल्मों की कहानी बड़ी सामान्य होती थी और इनमें अच्छाई बनाम बुराई को दिखाया जाता था। दारा सिंह अच्छाई के साथ होते थे। स्क्रिप्ट इस तरह लिखी जाती थी कि ज्यादा से ज्यादा फाइट सीन की गुंजाइश हो ।जंग और अमन, बेकसूर, जालसाज, थीफ ऑफ बगदाद, किंग ऑफ कार्निवल, शंकर खान, किलर्स जैसी कई फिल्में दारा सिंह ने की और दर्शकों को रोमांचित किया। कहा जा सकता है कि दारा सिंह पहले अभिनेता थे जिन्होंने शर्टलेस होकर उन्होंने अपने शारिरिक सौष्ठव का प्रदर्शन किया। लेकिन जिंदगी है तो जिंदगी का अंत भी। अपार ताकत और अपार लोकप्रियता के प्रतीक दारा सिंह को हमारी लाख सद्भावनाएं भी नहीं रोक पा सकी। लेकिन उनकी स्मृतियां उतनी ही मजबूती के साथ हमारे मन पर कायम रहेगी। लडना सिखाने वाले अभिनेता के रुप में ही नहीं ,देश की ताकत के प्रतीक के रुप में भी।

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