शुक्रवार, 24 जून 2011

भोजपुरी सिनेमा- जमीनी हकीकत से मुंह चुराती!



कतई यह आश्चर्य ही है कि बीते दस वर्षों से अपनी कामयाबी पर इतरा रही भोजपुरी सिनेमा के पास मात्र तीन नायक है, रवि किशन, मनोज तिवारी और दिनेस लाल यादव ‘निरहुआ’। हाल के दिनों में जब मनोज तिवारी और रवि किशन कमजोर पड़े हैं तो पवन सिंह की चर्चा भले ही जोर पकड़ने लगी है लेकिन भोजपुरी सिनेमा के साथ जो तीन नाम याद आते हैं वे रवि, मनोज और निरहुआ हीं हैं। नायिका की कतार यहां काफी लम्बी है, रानी चटर्जी, पाखी हेगड़े से लेकर मोनालिसा तक। लेकिन इनमें से शायद किसी की ऐसी स्थिति नहीं जो कट्रीना, करीना और ऐश्वर्या की तरह दर्शकों को सिनेमा घर तक खींच सके। ये फिल्मों में इसलिए होती हैं कि फिल्म में ग्लैमर का होना जरूरी होता है। अन्यथा इनकी मार्केट वैल्यू शून्य है। यह भोजपुरी के नायक भी समझते हैं इसलिए आश्चर्य नहीं कि एक फिल्म में काम करने के लिए अब वे 50 लाख तक मांगने में संकोच नहीं करते। लगभग बजट का आधा।

पिछले दिनों जब एक नामचीन भोजपुरी अभिनेता से 50 लाख की मांग पर सवाल उठाया तो उन्हौंने छूटते ही कहा, ‘रजनीकांत तो एक फिल्म के 80 करोड़ लेते हैं, हम तो उसके सामने कुछ भी नहीं मांगते। वह भी रिजनल फिल्म में हैं, हम भी। हम चाहते हैं हमारा सिनेमा भी उसी उचाई तक पहुंचे’। कौन नहीं मर मिटेगा इस भोलेपन पर! भोजफरी सिनेमा के बेहतर भविष्य की चाहत सराहनीय है, लेकिन यह चाहत यदि नितान्त हवा में हो तो सिर्फ हास्य के क्षण उपलब्ध करा सकती है, और कुछ नहीं। सवाल यह भी है कि रजनीकांत ने पहले ही 80 करोड़ मांगने शुरू कर दिये या फिर इंडस्ट्री को उस लायक बनाने के बाद 80 करोड़ हासिल किए? अपने निजी स्वार्थ में हमारे नामचीन अभिनेता भूल जाते हैं कि उनकी इंडस्ट्री किस लायक है, और उसे बेहतर बनाने के लिए उन्होंने कोशिश क्या की है? वास्तव में यदि भोजफरी सिनेमा के बीते दस वर्षों के इतिहास पर गौर करें तो शायद ही अपनी इंडस्ट्री के विकास और बेहतरी के लिए किसी अभिनेता की कोई कोशिश नजर आ सकती है। कोशिश एक ही हुई अपने पारिश्रमिक में निरंतर बढ़ोतरी की। इन तीनों नामचीनों में से शायद ही किसी ने कभी भोजपुरी सिनेमा के शक्ल को सुधारने की कोशिश की। दावे के साथ यह भी कहा जा सकता है कि इन तीनों में से शायद ही किसी ने अपने निर्माता-निर्देशक या पटकथा लेखक के साथ सार्थक हस्तक्षेप के लिए कभी कोई बैठक की होगी। शायद ही किसी ने अपनी फिल्मों की तकनीकी कमजोरियों पर अप्रसन्नता व्यक्त की होगी। अपनी फिल्मों की सफलता या असफलता के कारणों को जानने की कोशिश की होगी। कहा जा सकता है, अभिनेताओं से इतनी उम्मीदें क्यों? वह इसलिए कि जब फिल्म के बजट के आधे हिस्से की मांग वे करते हैं तो पूरी फिल्म की जवाबदेही से भी वे बच नहीं सकते।

वास्तव में भोजफरी सिनेमा के आरंभिक दौर को याद करते हैं तो नासिर हुसैन के नाम याद आते हैं, राजकुमार शाहाबादी के नाम याद आते हैं, कुंदन कुमार के नाम याद आते हैं, नायक नायिका के नाम याद नहीं आते। लेकिन आज भोजपुरी सिनेमा के इस तीसरे दौर में शायद ही किसी भोजपुरी फिल्मकार का नाम उनके फिल्मों के साथ याद कर सकें, याद आते हैं तो सिर्फ नायकों के नाम। ‘ससुरा बड़ा पइसा वाला’ के साथ मनोज तिवारी, ‘निरहुआ रिक्शावाला’ के साथ निरहुआ तो ‘मार देब गोली....’ के साथ रवि किशन। जाहिर है जब भोजपुरी सिनेमा का पूरा बाजार नायकों के इशारे पर दौड़ रहा हो तो इसकी अच्छाइ-बुराइ से भी इन्हें बरी नहीं किया जा सकता। मेरी स्पष्ट समझ है कि मनोज तिवारी और रवि किशन को भोजपुरी ने लोकप्रियता के उस शिखर तक पहुंचा दिया था, जहां वे भी भोजपुरी के लिए एक ‘पीपली लाइव’ और ‘लगान’ परिकल्पित कर सकते थे, लेकिन उन्होंने नहीं चाहा।

सबसे बड़ी मुश्किल यह रही कि वे भोजपुरी सिनेमा को एक क्षेत्रीय सिनेमा की तरह स्वीकार ही नहीं कर पाये। वे कर भी नहीं सकते थे, क्यों कि असमीया, मलयालम, बंगला और छत्तीसगढ़ी सिनेमा की तरह भोजपुरी सिनेमा का विकास अपनी जमीन पर हुआ ही नहीं। न तो इसका केन्द्र पटना बन पाया, न ही गोरखपुर। एक स्वतंत्र आकाश में विकसित होने के बजाय, इसने हिन्दी के हिमालय की छांव में अपने आपको सुरक्षित पाया। शुरूआत तकनीशियनों से हुइ, बाद में यहां के फिल्मकारों ने भी मुम्बइ में आशियाना तलाश लिया, कलाकार तो तैयार बैठे ही थे। वे भी मुम्बइ बस गये। नतीजा यह हुआ कि तथाकथित लोकप्रियता के दस वर्ष गुजारने के बाद भी भोजफरी सिनेमा की कोइ स्वतंत्र पहचान नहीं बन सकी, और न ही पहचान पाने की कोइ जिद दिखी।

आश्चर्य नहीं कि मुम्बइ में ही विकसित मराठी सिनेमा से प्रेरित होने के बजाय भोजपुरी सिनेमा हिन्दी की भोंड़ी नकल कर संतुष्ट होती रही। इतना ही नहीं हिन्दी के सान्निध्य ने भोजपुरी सिनेमा को भी राष्ट्रीय-अंतराष्ट्रीय होने की गलत फहमी दे दी। आज भोजपुरी सिनेमा की बात होती है तो लोग सीधे मॉरीशस, सूरीनाम से शुरूआत करते हैं। बाक्स ऑफिस की बात आती है तो हिन्दी की तरह ये भी पंजाब, महाराष्ट्र, बंगाल, गुजरात के सर्किट की भी चर्चा करते हैं। कुल मिलाकर जब भोजपुरी सिनेमा के बाजार की चर्चा होती है तो भ्रम यह पैफलाया जाता है कि इसका बाजार हिन्दी के बराबर अभी भले ही न हो, होना जरूर चाहिए।

यह गलतफहमी जहां से भी खड़ी की गइ हो, भोजपुरी सिनेमा के लिए सबसे नुकशानदायक रही। इस गलतफहमी ने भोजपुरी सिनेमा को कभी भी अपने बाजार का सही आंकलन करने नहीं दिया। मॉरीशस और सूरीनाम से कमाइ कर पता नहीं कितनी भोजपुरी फिल्में लौट सकीं, इसकी ओवरसीज बिजनेस का कोइ रिकार्ड कम से कम सार्वजनिक तो नहीं हुइ है। लुधियाना, सूरत और मुम्बइ में भी भोजपुरी सिनेमा कितनी कमाइ कर पाती है, लोगों को अंदाजा है। वास्तव में यदि भोजफरी सिनेमा का कोइ तयशुदा बाजार है तो वह है, बिहार और उत्तर प्रदेश के लगभग 200 बी ग्रेड सिनेमा घर। जहां टिकट की दर अभी भी 50 रूपये से 10 रूपये की बीच है। यह सीधा गणित का मामला है कि यदि सारे शो भी हाउसफुल हो तो एक भोजपुरी सिनेमा कितनी कमाइ कर पाती है? लेकिन भोजपुरी सिनेमा से जुड़े लोग इस सीधे से गणित को स्वीकार करने के लिए कतइ तैयार नहीं हैं। उन्हें लगता है यदि तमिल फिल्म 100 करोड़ की बन सकती है तो भोजपुरी की क्यों नहीं? यदि हिन्दी 20 करोड़ की बन सकती है तो भोजपुरी की क्यों नहीं? हम भुल जाते हैं कि जितने सिनेमा घर पूरे बिहार में है उतने अकेले चेन्नई शहर में, हिन्दी फिल्म यदि मल्टीप्लेक्स में तीन दिन चल जाती है तो मुनाफे में चली जाती है, लागत तो वह रिलीज होने के पहले ही तरह तरह के राइट्स से निकाल लेती है। आप को कौन से राइट्स मिलते हैं भाई?

मुश्किल यह है कि जब भी भोजपुरी सिनेमा को उसकी औकात की याद दिलायी जाती है, आप उसके दुश्मन में शुमार कर लिए जाते हैं। भाई साहब, पुरानी कहावत है पांव उतना ही फैलाना चाहिए जितनी बड़ी चादर हो। यदि भोजपुरी सिनेमा के अधिकतम वापसी दो करोड़ की भी मान ली जाय तो किस उम्मीद पर कोइ फिल्मकार 8 करोड़ की फिल्म बनाने की हिम्मत करेगा? और यदि उसने हिम्मत कर भी ली तो क्या फिर दोबारा वह भोजपुरी सिनेमा बनाने की कोशिश करेगा? आश्चर्य नहीं कि सुभाष घई से लेकर सरोज खान और दिलीप कुमार तक न जाने कितने फिल्मकार भोजपुरी की बहती गंगा में हाथ धोने आए लेकिन दोबारा पलटकर नहीं लौट सके। टिके वही जिन्हें भोजपुरी सिनेमा के बाजार की सीमा का अहसास था, चाहे वह अभय सिन्हा हो या संजय सिन्हा या फिर डॉ. सुनील कुमार।

लेकिन बजट इनके लिए भी समस्या बनी रही, जिसका प्रभाव भोजपुरी सिनेमा पर स्पष्ट महसुस किया जा सकता है। दो करोड़ अधिकतम कमाइ वाली फिल्म यदि बहुत उदारता के साथ भी बनायी जाय तो डेढ़ करोड़ से ज्यादा लगाने की हिम्मत कोइ भी समझदार प्रोड्युसर सायद ही जुटा पाए। इस डेढ़ करोड़ में यदि 40 से 50 लाख किसी एक ही कलाकार को देने की बाध्यता हो तो बाकी फिल्म के लिए संसाधन जुटाना कितना मुश्किल हो सकता है, यह भोजपुरी फिल्मकार ही समझ सकते हैं। आश्चर्य नहीं कि भोजपुरी फिल्म के तकनीकी पहलुओं पर गौर करने की कोशिश कोइ भी फिल्मकार नहीं उठाता, क्यों कि गौर करने का अर्थ है अधिक खर्च। और इस अधिक खर्च से बचने की कोशिश में उनकी कोशिश बस किसी तरह औने पौने फिल्म तैयार कर लेने की होती है क्यों कि उन्हें पता होता है कि सिंगल थियेटरों के लिए अब हिन्दी में फिल्में बन ही नहीं रही हैं, वे जो भी बनाएगें उन्हें दिखाना बी ग्रेड शहरों के सिंगल थियेटरों की मजबूरी है। और जब फिल्म पर्दे तक पहुंच गयी तो भला लागत निकलते कितनी देर लगती है। उन्हें यह भी पता है उनकी फिल्में वही देखते हैं जिन्हें कोइ भी फिल्म देख लेनी है। क्या यह आश्चर्य नहीं कि बीते दस वर्षों में या कहें पचास वर्षों में भोजपुरी दर्शकों के सामने कभी कोइ चयन की सुविधा नहीं रही। हमेशा से ही एक ही तरीके से, कमोबेस एक ही पृष्ठभूमि पर, एक ही विषय पर भी फिल्में बनती रहीं। बीते पचास वर्ष में प्रयोग के नाम पर देखें तो भोजपुरी सिनेमा में एक अद्भुत सन्नाटा दिखता है। यह शायद इसलिए कि भोजपुरी सिनेमा भोजपुरी के लिए बनती ही नहीं, बनती सिर्फ बाजार के लिए है।

जबकि उनके बरक्स मलयालम फिल्मों में देखें तो अश्लीलता की बाढ़ है तो अदूर गोपालकृष्णन भी हैं, बाग्ला में बाजार के लिए भी फिल्में हैं तो गौतम घोष भी हैं, मराठी में फूहड़ हास्य है तो ‘श्वास’ भी है। भोजपुरी में ऐसा क्यों नहीं हो पा रहा? शायद इसलिए कि क्षेत्रीय सिनेमा की तरह इसके प्रति हमने लगाव ही महसूस नहीं किया।

यही माकूल समय है। बड़े बजट और काल्पनिक बाजार का भ्रम छोड़कर छोटे बजट में नये प्रयोगधर्मी भोजपुरी सिनेमा की शुरूआत हो सकती है। जाहिर है इसके लिए बजट का बड़ा हिस्सा सितारों के बजाय हमें शोध और पटकथा पर खर्च करना होगा, कैमरा और संपादन पर खर्च करना होगा। लाइट्स और संगीत का इस्तेमाल सीखना होगा। ‘पिपली लाइव’ और ‘वेलडन अब्बा’ आखिर भोजफरी में क्यों नहीं बन सकती?

निश्चित रूप से इसके लिए भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री को मुम्बइ की सुविधाओं का मोह छोड़कर पटना या गोरखपुर में अपनी जमीन की तलाश करनी पड़ेगी। शायद तभी सितारों को भी अहसास हो सकेगा कि अपनी छोटी सी इंडस्ट्री में उन्हें कितनी बड़ी हिस्सेदारी चाहिए। सोने के अंडे देने वाली मुर्गी के पेट चीरने की कोशिश कभी भी हमें खाली हाथ कर दे सकती है। एक बार नहीं भोजपुरी सिनेमा ने कइ बार दुर्दिन देखें हैं। कोइ नहीं चाहेगा वे दिन दोबारा आए। लेकिन जरूरी है सोने के अंडे देने वाली मुर्गी को धैर्य से संभाल कर रखने की।

3 टिप्‍पणियां:

  1. aapkI chintaa jayaz hai. lekin bhojpuri cinema me kisi ko apni jholi bharane ke alaawaa kuchh nahi sujhata hai. bhojpuri cinema ne hindi cinema se uski koi achhai bhale na li ho buraiyan adhikatar grahan kar liya hai.

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  2. ye sab actor frod hai inhe koi matlab nahi hai ki acche fi;lm bane..bas apna mamala bana rahe.....tewari aur ravi to kya bataye....sapane me v nahi sochte ki kuch karna v hai bas much ka igo banakar ladenghe ye chu,..........

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