मंगलवार, 5 मई 2015

बेहतर सिनेमा के सपने को सम्मान


मेरे पास मां है,भारतीय सिनेमा के इतिहास में शशिकपूर को अमर बनाने के लिए दीवार का यही एक संवाद काफी था,लेकिन अब जब 77 वर्ष की उम्र में उन्हें दादा साहब फाल्के अवार्ड से सम्मानित के जाने की घोषणा हुई तो यही माना जा सकता है,यह शशि कपूर से कहीं अधिक उनके सिनेमा का सम्मान है,उस सिनेमा का जो उनके सपनों में बसता था, जिस सिनेमा के लिए उन्होंने अपनी पूरी सफलता दांव पर लगा दी थी। शशि कपूर ने कहने को 150 से भी अधिक फिल्मों में काम किया,यदि इनमें से कुछ आरंभिक दौर की फिल्मों को छोड दिया जाय तो अधिकांश काफी सफल रहीं।इसके बावजूद शशि कपूर जब 1978 में जब फिल्म निर्माण में आए तो शुरुआत जूनून से की।1857 के दौर पर ऐतिहासिक संदर्भों के साथ श्याम बेनेगल के निर्देशन में बनी यह फिल्म अपने आप में यह कहती लगती थी कि शशि कपूर आखिर सिनेमा से चाहते क्या थे। जुनून नहीं चली,लेकिन बेहतर सिनेमा के प्रति शशि कपूर ने अपने जुनून के कभी विराम नहीं दिया। वास्तव में शशि कपूर के अभिनय की स्कूलिंग जहां से हुई थी, फकीरा का विजेता के रुप में रुपांतरण अस्वभाविक भी नहीं था। 
पृथ्वीराज कपूर के सबसे छोटे बेटे के रुप में जन्में शशि कपूर के लिए भी बाकी कपूरों की तरह सिनेमा की डगर आसान नहीं रही थी। पृथ्वी राज कपूर एक सख्त अभिभावक थे और उन्होंने कभी किसी बेटे को अपने पोजिशन का लाभ नहीं उठाने नहीं दिया।शशि कपूर की प्रतिभा हालांकि आग और आवारा जैसी फिल्मों से बाल भूमिकाओं में ही दिखने लगी थी,लेकिन पृथ्वीराज कपूर ने उन्हें थियेटर में सक्रिय होने की सलाह दी।पृथ्वी थियेटर में काम करते हुए शशि कपूर ब्रिटेन के नाटककार केण्डेल के संपर्क में आए जो अपनी नाट्यकंपनी शेक्सपियेराना के साथ भारत आए हुए थे। शेक्सपियेराना के साथ शशिकपूर को देश के कई रंगमंच पर उतरने का मौका मिला। शेक्सपियेराना ने उन्हे जीवन के अनुभवों के साथ जेनिफर केण्डेल जैसी पत्नी भी दी,जिनके साथ ने शशि कपूर के जीवन को दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। अस्सी के दशक में शशि कपूर जब सहनायक के रुप में सफलता का नया व्याकरण रच रहे थे,उसी समय जेनिफर की असमय मौत ने उन्हें तोड ही नहीं दिया,उनके जीवन की दशा और दिशा भी बदल दी।वे सिनेमा से भी लापरवाह हो गए और सबसे दुखद अपने आप से भी।
शशि कपूर ने परदे पर अभिनय की शुरुआत 1961 में यश चोपडा की निर्देशक के रुप में पहली फिल्म धर्मपुत्र से की,फिल्म हालांकि नहीं चली लेकिन अपने विषय के कारण आज भी याद की जाती है। प्रेमकथाओं के उस दौर में शशि कपूर को चार दीवारी’, ‘मेहंदी लगी मेरे हाथ’, ‘प्रेमपत्र’, ‘मोहब्बत इसको कहते हैं’, ‘नींद हमारी ख्वाब तुम्हारे’,’जुआरी’,’कन्यादान’, ‘हसीना मान जाएगी जैसी कई फिल्में मिलीं,लेकिन ज्यादातर फ्लॉप रहीं। यह वह दौर था जब दिलीप कुमार, राजेन्द्र कुमार,देवआनंद जैसे अभिनेता सफलता के पर्याय के रुप में स्थापित थे,जाहिर है शशिकपूर को सफलता के लिए प्रतीक्षा करनी पडी।1965 में जब जब फूल खिले आयी और कश्मीरी हाउसबोट मालिक के रुप में अपनी सहज मुस्कान और खूबसूरत चेहरे से प्रशंसकों की कतार खडी कर ली,जो अब उनकी फिल्मों की प्रतीक्षा कर रही थी। 70 के दशक में उनकी व्यस्तता का यह आलम था कि एक साथ तीन तीन शिफ्टों में वे शूटिंग किया करते थे। यह शशि कपूर का आत्मविश्वास ही था कि उन्होंने कभी भी किसी स्टार या अभिनेता के साथ काम करने में कभी संकोच नहीं किया,न ही कभी अपनी भूमिका के लिए चिंतित रहे।राजेश खन्ना जब निर्विवाद सुपर स्टार थे,शशि कपूर ने प्रेम कहानी जैसी फिल्म में सहनायक की भूमिका में उतरने का जोखिम उठाया,अमिताभ बच्चन के साथ तो कभी कभी,दीवार,सुहाग,इमान धरम,त्रिशूल,काला पत्थर, दो और दो पांच’, सिलसिला’, ‘नमक हलाल जैसी फिल्मों में कमजोर चरित्र के बावजूद वे आते रहे।शत्रुघ्न सिन्हा का भी आ गले लग जा और गौतम गोविंदा जैसी फिल्म में साथ निभाया। वास्तव में इन फिल्मों को देखते हुए यही कहा जा सकता है कि शशि कपूर के लिए महत्वपूर्ण सिर्फ और सिर्फ काम रहा। आश्चर्य नहीं कि लगातार काम करते हुए कभी भी किसी अवार्ड के लिए उन्हें नामांकन नहीं मिल सका।शायद शशि कपूर को भी पता था कि वे इन फिल्मों के लिए नहीं बने हैं।
बेसिरपैर की भूमिकाओं और सिनेमा के प्रति शशि कपूर की अनथक दौड का अर्थ उनके प्रशंसकों को तब समझ में आया जब उन्होंने  शेक्सपीयरवाला के नाम से अपने होम प्रोडक्शन की शुरुआत की। इस बैनर माध्यम से उन्होंने श्याम बेनेगल,गोविंद निहलाणी,अपर्णा सेन,गिरीश कर्नाड जैसे अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता के लिए चर्चित फिल्मकारों के सहयोग से जूनून (1979), कलयुग (1981), ‘36 चौरंगी लेन (1981), ‘विजेता (1983) तथा उत्सव (1985) जैसी फिल्म का निर्माण कर हिन्दी दर्शकों को एक नए सिनेमा का आस्वाद दिया। अनुभवी शशिकपूर को पता था कि इन फिल्मों का व्यवसायिक हश्र क्या होने वाला है,लेकिन शायद कहीं न कहीं रंगमंच की वैचारिक प्रतिबद्धता का दवाब था कि शशि कपूर पीछे नहीं मुडे। उन्होंने शेक्सपीयरवाला के साथ अपने जीवन का एक बडा हिस्सा पृथ्वी थियेटर के रुप में रंगमंच को समृद्ध करने में लगा दिया,जिसका निर्वहन आज भी उनकी बेटी संजना कपूर पूरे उत्साह के साथ कर रही है।
यह हिन्दी सिनेमा के परंपरागत अभिनेताओं से इतर दिखती परिपक्वता ही थी कि ब्रिटिश फिल्मकारों के वे प्रिय अभिनेताओं में रहे।1972 में कोनार्ड रुक्स की सिद्धार्थ में जब भारतीय चेहरे की बारी आयी तो शशि कपूर का विकल्प नहीं था। जेम्स आइवरी-इस्माइल मर्चेण्ट की फिल्म शशि कपूर से ही जानी और देखी जाती थी। द हाउस होल्डर (1963), ‘शेक्सपीयरवाला (1965), ‘बॉम्बे टॉकी (1970) तथा हीट एंड डस्ट (1983) में अभिनेता के तौर पर उनकी उंचाई किसी को भी चमत्कृत कर सकती है। 1993 में इन्होंने मर्चेंट आइवरी की के साथ इन कस्टडी(मुहाफिज) पूरी की,एक शायर की ढलती हुई जिंदगी को निभाते हुए उन्हें शायद ही अहसास होगा कि यही उनकी जिंदगी का सच बनने जा रहा है।

आज शशि कपूर अस्वस्थ हैं। व्हील चेयर पर हैं। तब उन्हें दादा साहब फाल्के अवार्ड दिया जा रहा है। वास्तव में यह अवार्ड शशि कपूर को नहीं बेहतर सिनेमा के लिए देखे उनके सपने को समर्पित माना जा सकता है।

मंगलवार, 14 अप्रैल 2015

समय की क्रूरता से टकराती एन एच 10



कहानी कोई नई नहीं,हिन्दी में अब तक सौ से ज्यादा फिल्में बन चुकी होंगी जिसमें नायिका अपने और अपने पति पर हुए अन्याय का हिंसक बदला लेती है।एन एच 10 की कहानी भी वहीं से चलती वहीं खत्म होती है,लेकिन खत्म होने के पहले हरेक मोड और घुमाव पर यह जिन जिन सवालों से टकराती है,वह इस फिल्म को एक नई ऊंचाई पर खडी करती है।हाल के वर्षों में आयी फिल्मों में एन एच 10 को ऐसी कुछेक फिल्म में शामिल किया जा सकता है जो फ्रेम दर फ्रेम उंची उठती चली जाती है,पूरी फिल्म में ऐसे मौके विरले ढूंढे जा सकते हैं,जहां लगे कि लेखक निर्देशक के पास कहने के लिए कुछ नहीं है।और वह अपनी शून्यता की भरपाई खूबसूरत दृश्यों या आइटम नंबर या भारी भरकम संवादों से करने की कोशिश कर रहा है।निर्देशक नवदीप सिंह की कुशलता इसी से समझी जा सकती है कि महिला सशक्तीकरण,ऑनर कीलिंग,उपभोक्तावाद,शहरीकरण,कानून व्यवस्था,पुलिस व्यवस्था,पंचायती राज और समस्याओं के प्रति समाजिक चुप्पी जैसे मुद्दों को उधेडती यह फिल्म दृश्यों के सहारे ही संवाद करती है,यहां शब्दों की अहमियत बस दृश्य को सपोर्ट करने तक ही सीमित हैं।
कहानी एक महानगर के सफल जोडे के सहज संवादों से शुरु होती है।हालांकि अस्पष्ट संवाद और अस्पष्ट दृश्य पहले फ्रेम से दर्शकों को यह समझाने में सफल हो जाते हैं कि एन एच 10 का यह सफर आसान नहीं,इसीलिए बहुत रिलैक्स होने की कोशिश न करें। मीरा (अनुष्का शर्मा) और अर्जुन(नील भूपलम) नवविकसित शहर गुडगांव के मल्टीनेशनल कंपनियों में काम करते हैं। दक्षिण भारतीय मीरा और उत्तर भारतीय अर्जुन के प्रेम विवाह में कोई समस्या नहीं,दोनों ही एक दूसरे को स्पेश देते हुए, एक दूसरे के साथ होने की भी कोशिश करते दिखते हैं। अर्जुन को अपने दोस्त की पार्टी में जाना है जबकि मीरा की इच्छा घर पर साथ समय गुजारने की है,लेकिन मीरा अर्जुन की इच्छा सम्मान करते हुए पार्टी जाना तय करती है। वहीं चुंबन लेने के बाद जब अर्जुन मीरा से फिर से सिगरेट पीने की शिकायत करता है, और मीरा उसे हंसकर टाल देती है तो अपने आप में यह संबंधों पर आर्थिक स्वतंत्रता के प्रभाव की कथा कह जाती है। पार्टी के बीच मीरा को एक प्रेंजेटेशन के लिए अर्जेंट कॉल आता है, और अर्जुन का दोस्त कहता है, तुम कार लेकर चली जाओ, मैं इसे अपनी गाडी से छोड दूंगा।वास्तव में शुरुआत के ये छोटे छोटे डिटेल्स बाद में मीरा के उस चरित्र को सहजता से स्थापित करने में सहायक होते हैं, जो ऊंची खडी चट्टान की चढाई करती भी दिखती है और अपराधियों के साथ मिले पुलिस इंसपेक्टर की आंखों में कलम घोंपते भी। कलम भी आत्मरक्षा का हथियार बन सकता है,नवदीप मीरा के बहाने शायद आज की लडकियों को समझ भी देते हैं,जरुरत सिर्फ आत्मविश्वास की होती है। वास्तव में नवदीप मीरा को सशक्त दिखाना चाहते हैं तो वे संवादों के बजाय दृश्यों के सहारे बढते हैं।
रात में अकेले कार से लौटते हुए लाल सिगनल देख सडक खाली होने के बावजूद मीरा कार रोक कर सिगनल होने का इंतजार करती है। वास्तव में नवदीप कानून पर उसके भरोसे को स्थापित करने की कोशिश करते हैं। यहीं उसका सामना दो गुंडों से होता है जो उसकी गाडी का सीसा तोड उसके साथ बदतमीजी करना चाहते हैं।लेकिन वह अपनी गाडी को भगा कर बच निकलती है। बदलते समय ने महिलाओं के प्रति हमारी समझ किस तरह बदली है,यह दिखाने की शुरुआत यहीं से होती है।मीरा की गाडी का सीसा तोडने वाले कोई पेशेवर अपराधी नहीं दिखते, एक सामान्य युवक की तरह वे बाइक से जा रहे होते है,बस अकेली लडकी को कार में अकेले देख कर वे लपक पडते हैं। अभी तक शायद ही कोई समाजशास्त्री इसका जवाब ढूंढ पाए हैं कि आखिर क्यों अकेली लडकी को देख कर उसके प्रति हिंसक भावनाएं बलवती होने लगती है। आखिर क्यों नहीं एक सामान्य जीव की तरह लडकियों को भी हम देख पाते हैं? अपराध की इस नई प्रवृति को पुलिस अधिकारी भी अपने तर्क से रेखांकित करता है, बढता हुआ बच्चा है साहब,कूदी तो मारेगा ही। यहां इसका जवाब नहीं मिलता कि बढते बच्चों की शैतानियों को तो उनके मां-बाप, परिवार शिक्षक नियंत्रित करने की कोशिश करते हैं,यहां शहर के संदर्भ में अभिभावक के रुप में पुलिस या जनप्रतिनिधियों की भी कोई भूमिका बनती है या नहीं? पुलिस आसान सा रास्ता सुझाती है, बडे पुलिस अधिकारी आपके मित्र हैं,रिवाल्वर का लाइसेंस ले लिजिए।
यदि एन एच10 को ऑनर किलिंग या किसी एक विषय से जोड कर देखें तो फिल्म छोटी लग सकती है,लेकिन फिल्म अपने को बांध कर नहीं रखती,जहां अवसर मिलता है,बदलते समय और समाज पर अपने दृश्यों से टिप्पणी करती चलती है।फिल्म भारतीय समाज में आ रहे एक बडे अंतर को भी शिद्दत से रेखांकित करती है,एक ओर छोटे बेटे के सामने सास से पिटती महिला है, दूसरी ओर पुरुषों के बोर्ड के सामने सेनेटरी नेपकीन के ब्रांड प्रमोशन की रणनीति तैयार कर रही मीरा। यह फर्क मीरा के शब्दों से भी जाहिर होता है,जब वह कहती है कि आमतौर पर अभी भी नेपकीन खरीदने महिलाएं स्वयं नहीं निकलती। मीरा को निर्देशक एक प्रोफेशनल के रुप में दिखाते हैं, जिसके लिए सबसे महत्वपूर्ण उसका काम है, लेकिन मीरा अपने स्व को अपने प्रोफेशन के सामने समर्पित नहीं करती। वह महिला अधिकार की झंडाबरदार नहीं,लेकिन जब ढाबे के बाथरुम में दरवाजे पर वह महिलाओं के प्रति अपशब्द लिखी देखती है,तो उसे मिटाए बिना नहीं निकलती। लेकिन यही मीरा तब अधिकांश लोगों की तरह चुप रहती है,जब उसके सामने एक लडकी मारपीट कर उठाया जा रहा होता है। रोती चीखती भागती मीरा को निर्देशक कहीं पर भी सुपर वोमैन दिखाने की कोशिश नहीं करते। वास्तव में यह फिल्म किसी टेक्स्टबुक की तरह भी देखी जा सकती है कि कठिनाइयों में फंसने पर हम किस तरह अपना बचाव कर सकते हैं।
लौटते हैं कहानी पर अर्जुन मीरा को उसके जन्मदिन पर वीकएंड बिताने पास के किसी सुंदरपुरा फार्महाउस पर ले जा रहा होता है। शहर की सीमा खत्म होती है,गांव की हरियाली और खुलापन दिखने लगता है,लेकिन नहीं दिखता तो हमारे सपनों का गांव, गांव के एक मुहाने पर चार लोग बैठे हैं,उम्रदराज, ताश खेलते और शराब पीते हुए। उनसे जब अर्जुन सुंदरपुरा का पता पूछता है, तो वे उनसे पानी और शरबत के लिए नहीं पूछते, बल्कि पूरी बदतमीजी से कहते हैं,बोलो तो गोद में लेकर पहुंचा दूं। निर्देशक यह कहने में कतई संकोच नहीं करते कि एन एच से आ रही समृद्धि गांव से कीमत के रुप में सबसे पहले उसका गांवपन ही छीन रही है।
हाइ वे के एक ढाबे पर वे एक लडकी से टकराते हैं,जो प्रेम विवाह कर अपने पति के साथ गांव छोडकर भाग रही होती है। जबकि उसके भाई और रिश्तेदार उनकी जान लेने उनका पीछा कर रहे हैं।ढाबे पर वे लडके और लडकी को पकड लेते हैं,सारे लोग चुपचाप अत्याचार देखते रहते हैं,लेकिन अर्जुन अपने को रोक नहीं पाता,और लडकी के भाई सुरजीत(दर्शन कुमार) से भिड जाता है।समूह के सामने अकेला अर्जुन असहाय पिट जाता है।लेकिन पिटने का अपमान वह गले के नीचे नहीं उतार पाता। लगता है उसकी उत्तेजना को बैग में रखी रिवाल्वर हवा देती है।यहां नवदीप हमारे स्वभाव पर हथियार के प्रभाव को रेखांकित करने में सफल होते हैं। अर्जुन हाथ में रिवाल्वर लेकर उनके पीछे निकल जाता है, मीरा के रोकने पर वह कहता है,अरे गांव वाले हैं रिवाल्वर देख कर डर जाएंगे,उसे पता नहीं कि गांव के लिए हथियार अब सामान्य बात हो चुकी है। यहां नवदीप यह स्पष्ट करने से नहीं चूकते कि अर्जुन के लिए अब महत्वपूर्ण लडकी को बचाना नहीं,अपने अपमान का बदला लेना अधिक है, मीरा उसे उलझने से रोकने की कोशिश करती है,लेकिन वह नहीं रुकता और मीरा को गाडी में अकेले छोडकर चला जाता है।
अर्जुन की आंखों के सामने लडकी और लडके की क्रूरता से हत्या कर दी जाती है।वह मीरा को लेकर जान बचाकर भागता है। लेकिन भाग नहीं पाता, चोट खाए अर्जुन को अकेले छोडकर मीरा मदद की गुहार लेकर रात भर भागती है,लेकिन पुलिस उसकी मदद नहीं करती है। उसकी पूरी यात्रा में एकमात्र एक बिहारी दंपति उसके साथ होता है। उल्लेखनीय है कि लंबे अंतराल के बाद एन एच 10 में बिहारी चरित्र दिखते हैं।हरियाणा के एक क्रशर पर मजदूर दंपति के रुप में दिखते ये पात्र गरीब भले ही दिखते हैं,लेकिन कमजोर नहीं। स्थानीय गुंडों से जान बचाकर भागती नायिका इनके झोंपडे में शरण मांगती है, ये गुंडों के खिलाफ खडे नहीं होते,लेकिन नायिका को बचाते अवश्य हैं। उनके चेहरे पर डर नहीं दिखता। यह है हिन्दी सिनेमा में दिखता नया बिहार। आमतौर पर अधिकतर हिन्दी फिल्मों में बिहारियों को तिकड़मी और अपराधी के रूप में चित्रित कर घृणा का पात्र बनाया जाता रहा था, या फिर मूर्ख गंवार के रूप में हंसी का। परदे पर दिखता यह बिहार अब अलग है।एन एच 10 में फिल्मकार दिखाता है कि गुंडे बिहारी मजदूर से पानी पिलाने को भी कहता है तो दरवाजे के बाहर से,घर के अंदर घुसने की हिम्मत नहीं करता। हिन्दी सिनेमा में मजदूर ही सही,लेकिन आत्मविश्वास से भरे बिहारियों का दिखना सुकून देता है।
मीरा बडी उम्मीदों के साथ सरपंच के यहां पहुंचती है।यहां भी छोटे छोटे दृश्यों से गांवों की हमारी परंपरागत मान्यता को खारिज करने की कोशिश करते हैं। गांव में 26 जनवरी के अवसर पर तमाशे हो रहे हैं। वहीं मीरा को एक छोटा बच्चा मिलता है,जिससे वह सरपंच के घर पहुंचाने का अनुरोध करती है, लगभग सात आठ साल का दिखता वह बच्चा उसके बदले मीरा से घडी की मांग करता है,फिर बोलता भी है इसमें लाइट नहीं,मेरे तो जूते में भी लाइट है। यह है गांवों पर एन एच का प्रभाव। यहां महिलाओं का महिलाओं के प्रति क्रूरता भी दिखती है,और गांवो  मे धूमधाम से चल रहे प्रजातांत्रिक व्यवस्था की हकीकत का भी।

वास्तव में एन एच 10 समय के बदलाव की कथा है,जिसके लिए नवदीप छोटी छोटी चीजें रेखांकित करते हैं। फिल्म में आरंभ से अंत तक नवदीप एक वातावरण बनाने में सफल होते हैं,जो दर्शकों को कहीं रिलैक्स होने का या कहें कहानी से निकलने का अवसर नहीं देती। लगभग रात भर की यह कहानी नीम अंधेरे में गुजरती है। फिल्म का कलर टोन धूसर रखा गया है,जो कहानी के तनाव को बनाए रखती है। फिल्म में अनुष्का,नील,दीपक झंकाल और दीप्ति नवल के अतिरिक्त अधिकांश पात्रों को पहचानना भले ही मुश्किल होता हो,लेकिन ऐसा कम होता है सभी अपने पात्रों की जीते दिखें। इस फिल्म के निर्माण से भी अनुष्का जुडी हैं,और इस फिल्म के लिए अनुष्का के सौ पी के माफ किए जा सकते हैं। 

शुक्रवार, 4 अप्रैल 2014

सनी लियोनी की स्वीकार्यता के मायने




सनी लियोनी ने प्रियंका चोपडा,करीना कपूर के साथ अभी तक स्क्रीन भले ही शेयर नहीं किया हो,लेकिन 'लक्मे फैशन वीक' जैसे आयोजन में शो स्टापर की भूमिका में सनी ने इनके साथ रैम्प शेयर कर बता दिया कि हिन्दी सिनेमा में अब जल्दी ही उनकी हैसियत को वह चुनौती दे सकती हैं। सनी की फिल्में चलें न चलें, सनी चल रही है। कभी मल्लिका शेरावत के लिए हाय तौबा मचाने वाला हिन्दी सिनेमा अब सनी लियोनी को सर पर बिठाए घूम रहा है। उसे न अभिनय आता है, न ही हिन्दी, बावजूद इसके वह हिन्दी सिनेमा की स्टार है। स्टार याने जिसके नाम से फिल्में बिकती हैं,चलती हैं।वह 'कांति शाह' की नायिकायों की तरह हिन्दी सिनेमा के हाशिए पर नहीं, मुख्यधारा में शामिल है। शर्लिन चोपडा और पूनम पांडे की तरह उससे अछूत की तरह व्यवहार नहीं किया जा रहा। हिन्दी सिनेमा के तमाम बडे सितारे अवार्ड इवेंट्स में सनी के साथ थिरकने को तैयार हैं।बडी कंपनियों के इंडोर्समेंट उसे मिल रहे हैं। टेलीविजन शो में वह परफार्म कर रही है। कपिल शर्मा ने कुछ ही दिन पहले 'कामेडी नाइट विद कपिल' में सनी को बुलाने से यह कहते हुए इंकार कर दिया कि यह पारिवारिक शो है,अब वही कपिल सनी के साथ रागिनी एम एम एम2' का प्रमोशन करते दिख रहे हैं, अपने उसी पारिवारिक शो में।

सनी को हिन्दी सिनेमा में लाने का श्रेय जाता है महेश भट्ट को।पता नहीं 'बिग बॉस' के घर में समय बिता रही सनी में उन्होंने कौन सी अभिनय प्रतिभा देख ली कि बगैर शो के खत्म होने की प्रतीक्षा के वे 'जिस्म2' में मेन लीड का आफर लेकर 'बिग बॉस' के घर पहुंच गए। यह तो महेश भट्ट ही बता सकते हैं कि सनी में आखिर कौन सा स्पार्क उन्हें दिख गया था। क्योंकि इसके पहले सनी जिस रुप में आम दर्शकों के लिए उपलब्ध थी वहां चाहे और जो कुछ दिखता हो अभिनय की तो गुंजाइश नहीं ही थी। यह भारतीय मानस पर महेश भट्ट की पकड ही थी कि उन्होंने सनी के इतिहास को छिपाने की कोई कोशिश नहीं की,बल्कि कह सकते हैं उसके पोर्न इंडस्ट्री से जुडे होने को उन्होंने उसकी यू एस पी के रुप में इस्तेमाल किया। भारतीय समाज में जहां नैतिकता के रेशे से बंधे रहने में लोग अभी भी खुशी महसूस करते हैं, जहां अभी भी वैधानिक रुप से पोर्न उद्योग पूरी तरह प्रतिबंधित है,देखना तक भी। वहां यह यकीन वाकई महेश भट्ट ही कर सकते थे कि हिन्दी दर्शक उसे नायिका के रुप में स्वीकार करेंगे, जिसे 'मैक्सिम' जैसी पत्रिका 2010 में ही टॉप 12 पोर्न स्टार में शामिल कर चुकी हो। महेश भट्ट का यह यकीन गलत भी साबित नहीं हुआ,रणदीप हुडा,अरुणोदय सिंह जैसे सितारों की मामूली सी फिल्म को सनी के आकर्षण ने कमाऊ बना दिया। हालांकि सनी के लिए 'जिस्म2' में अपनी बनी बनायी इमेज से अलग कुछ करना नहीं था,बावजूद इसके हिन्दी दर्शकों के बीच अपनी एक फैन फोलोइंग बनाने में वह सफल रही। आश्चर्य नहीं कि अनिल कपूर, जॉन अब्राहम,कंगना राणावत अभिनीत मल्टीस्टारर 'शूटआउट एट वडाला' में एक खास आयटम नंबर के लिए सनी को साइन किया गया। कहा जा सकता है इस आयटम नंबर के साथ सनी घर घर दिखने ही नहीं लगी,उसकी स्वीकार्यता भी आम हो गई। और आज एकता कपूर जैसा ब्रांड सनी के साथ खडी है।'रागिनी एम एम एस2' कमाई में पहले का रिकार्ड तोडने को तैयार है। भोजपुरी फिल्मों की अश्लीलता से परहेज करने वाली हर मल्टीप्लेक्स में सनी के न्यूड पोस्टर लहरा रहे हैं।

यदि बोल्ड दृश्यों से जोड कर देखें तो सनी की उपस्थिती न तो चकित करती है,न ही चिंतित। हिन्दी सिनेमा ने बी और सी ग्रेड के नाम पर कहीं अधिक नग्नता का बोझ उठाया है। सवाल है पोर्न इंडस्ट्री के एक जाने माने चेहरे की स्वीकार्यता का। कहीं न कहीं महेश भट्ट का नाम जुडा होने से हिन्दी सिनेमा में सनी का खैरमकदम किसी क्रांतिकारी की तरह ही हुआ था।सामाजिक हल्कों में भी उसकी उपस्थिती की यह कहते हुए सराहना की गयी कि अपने अतीत की गलतियों से छुटकारा पाने का हक सबों को मिलना चाहिए।सोशल साइट्स पर महिलाओं के काम के चयन के निर्णय की आजादी के नाम पर उसके पोर्न उद्योग से जुडे अतीत को भी सम्मानित करने की कोशिशें की गयी। सवाल है क्या पोर्न को किसी सामान्य काम की तरह देखा जा सकता है,यदि कोई मजबूरी में जुडता है तो उससे सहानुभूति भले ही हो सकती है,लेकिन एक सामान्य काम की तरह पोर्न को कैसे प्रतिष्ठा दी जा सकती है। महेश भट्ट जैसे लोगों ने तो सनी को साहस का प्रतीक बताने से भी संकोच नहीं किया।वास्तव में सारा मामला मार्केटिंग का है,न्यूड माडलिंग कर लोकप्रियता के लिए पूनम पांडे छटपटाती रह जाती है और हम अपना सारा सद्भाव सनी पर उडेल देते हैं।

वाकई सनी को साहसी मानने में संकोच नहीं होता यदि पोर्न इंडस्ट्री से उसका जुडना किसी मजबूरी के कारण होता।सनी स्वयं गर्व के साथ बताती है कि यह उसका निजी चयन था। भारतीय मूल की अमेरिकन कनाडियन नागरिक सनी को बेहतर परिवार और पारिवारिक सुविधाएं हासिल थी।पढाई पूरी कर उसने नर्सिंग भी ज्वाइन की,लेकिन अमीर बनने की ललक में उसने 'पेंटहाउस' और 'हस्लर' जैसी पत्रिकाओं में न्यूड माडलिंग की शुरुआत की जो अंततः पोर्न इंडस्ट्री तक उसे ले ही नहीं गई,सनी ने अपना स्टूडियो, अपना वेबसाइट खोलकर इंडस्ट्री को मजबूत भी करने की कोशिश की।आश्चर्य नहीं कि हिन्दी सिनेमा से जुडने के बाद भी सनी पोर्न से दूरी नहीं बना सकी।बल्कि इस अवसर का उपयोग उसने पोर्न इंडस्ट्री में अपनी स्थिति मजबूत करने में की। यह हिन्दी सिनेमा का ही कमाल माना जा सकता है कि इंटरनेट पर एक पोर्न स्टार सचिन तेंदुलकर और ऐश्वर्या राय से अधिक सर्च किया जाने लगे। आज भी सनी अपनी पोर्न फिल्मों पर उसी तरह बात करती है जैसे कोई अभिनेत्री अपनी शुरुआती फिल्मों पर करती है।जब वह कहती है मेरे पापा या परिवार ने कभी मेरे काम पर कोई आपत्ति नहीं की,तो समझना मुश्किल होता है वह क्या संदेश देना चाहती है कि नर्सिंग छोड कर पोर्न फिल्मों में उतरना उसका सही कदम था। सनी की बातचीत अब किसी एडल्ट साइट की मोहताज नहीं,प्रतिष्ठित हिन्दी अखबारों के पूरे पेज पर वह आ रही है,और हिन्दी समाज पोर्न को एक सामान्य काम की तरह माने जाने की उसकी वकालत पर तारीफ में जुटा है। भारतीय समाज में वाल्मिकी हर काल में स्वीकार्य रहे हैं, आपत्ति सनी की स्वीकार्यता पर भी नहीं होती,यदि सनी अपने अतीत को गौरवान्वित करने की कोशिश नहीं करती।लेकिन सनी की हमेशा कोशिश पोर्न को गौरवान्वित करने की रही है,शायद इसलिए कि हिन्दी सिनेमा उसके लिए माध्यम भर है, अपनी पोर्न के व्यवसाय के विज्ञापन का।कुछ ऐसे ही जैसे लक्ष्य बैगपाइपर शराब बेचना होता है,लेकिन बेचा बैगपाइपर मिनरल वाटर है।  

जाहिर तौर पर यह भारतीय समाज में पोर्न उद्योग को सम्मानित और स्वीकार्य बनाने की शुरुआत है। अगली कडी में 'शांति डाइनामाइट' हिन्दी सिनेमा की प्रतीक्षा सूची में है। यदि समय रहते इसे नियंत्रित करने की कोशिश नहीं की गई तो हमें तैयार रहना होगा कि यहां भी नर्सिंग के स्थान पर पोर्न के चयन को तरजीह दी जाने लगेगी,इस उम्मीद पर कि हिन्दी सिनेमा के रास्ते सुगम हो जायेंगे।

महिला सशक्तिकरण से आगे की कथा कहती क्वीन


पेरिस पहुंच कर भी निर्देशक का कैमरा नहीं भटकता हो तो उनके धैर्य को दाद देनी ही पडेगी। आमतौर पर हिन्दी सिनेमा में विदेशी लोकेशन का अर्थ वहां की सडकें,मकानें,पार्क,समुद्र,पहाड,झरने ही रहे हैं।बाकी की तो बात ही छोड दे,संगम’,’दिलवाले दुल्हनियां ले जाएंगे से लेकर जब तक है जान तक विदेश पहुंचते ही कैमरे की कोशिश अधिक से अधिक खूबसूरत ,नयनाभिराम दृश्यों को समेट लेने भर की दिखती रही है ताकि दर्शकों को विस्मित किया जा सके। विकास बहल की क्वीन इस मायने में असाधारण फिल्म है कि दो तिहाई से अधिक पेरिस और एमस्टर्डम में शूट होने वाली इस फिल्म में शहर उतना ही दिखता है,जितना कहानी के लिए अनिवार्य होता है। यहां पेरिस की उपस्थिती कहानी को विचलित नहीं करती,मजबूती प्रदान करती है।यहां तक कि एफिल टावर के पास जाकर भी फिल्मकार दर्शकों को एफिल टावर देखने का अवसर नहीं देता। परदे पर एफिल टावर दिखता है,लेकिन उतना ही,जितना पात्र देखता है।विदेश में फिल्मायी गयी हिन्दी की यह शायद पहली फिल्म होगी,जिसमें कहानी और पात्र से इतर कुछ नहीं दिखता।

अंतर्राष्ट्रीय होने की कई परिभाषाएं हो सकती हैं, देशों की सीमाओं से परे मानवीय संवेदना को स्थापित करने के कारण भी यदि किसी फिल्म को अंतरराष्ट्रीय माना जा सकता है तो क्वीन शायद हिन्दी की पहली फिल्म होगी।अकेले पेरिस घूमने वाली रानी(कंगना राणावत) को अमस्टर्डम में तीन रुममेट मिलते हैं,एक जापानी,एक रसियन और एक अफ्रिकन। रानी उनकी भाषाएं नहीं जानती,वे रानी की भाषा नहीं समझते,लेकिन साथ रहते चारों की अद्भुत बांडिंग बन जाती है। बाथरुम में छिपकिली देख कर रानी की चीख निकल जाती है, वह निकल कर भागती है,बाद में वे तीनों भी झांकने जाते हैं और उसी तरह चीख मार कर भागते हैं,उन्हें किसी भाषा की जरुरत नहीं होती।ये चारों एक दूसरे की भाषा नहीं समझते,लेकिन एक दूसरे की भावनाएं समझते हैं।और बगैर कोई रिश्ता कायम किए एक दूसरे के लिए खडे होते हैं,रिश्ता मतलब कायदे की दोस्ती भी नहीं दिखती उनके बीच,बस एक ही रिश्ता दिखता है,आदमी होने का। जब औरत मर्द के रिश्ते में सेक्स को अनिवार्य ही नहीं,सहज भी माना जाता हो,वहां तीन अजनबी पुरुषों के साथ संबंध को जिस कोमलता और सहजता से बगैर किसी नाटकियता के विवेक स्वीकार्य बनाते हैं,चकित करता है।

फिल्म में अलग अलग देशों के कई चरित्र है,और वे सब अपनी अपनी पहचान के साथ कहानी मे गुंथे हैं। न तो रानी पर फ्रेंच सीखने का दवाब दिखता है,न ही रानी किसी को हिन्दी सीखने के लिए प्रेरित करती है,बस एक स्वभाविक भावनात्मक रिश्ते में लोग जुडते चले जाते हैं। पूरी फिल्म में सभी अपनी अपनी भाषा में बात करते हैं, दर्शकों को भी न तो कही डबिंग की जरुरत महसूस होती है,न ही सबटाइटिल की। वास्तव में क्वीन वैश्विक भाइचारे का कोई संदेश नहीं देती,बस स्मारित करती है कि सीमा,भाषा और रंग बदलने से लोग नहीं बदल जाते।

स्वाद के लिए मशहूर एक रेस्टोरेंट मालिक को रानी अपने खाने को भारतीय मशाले से बेहतर बनाने का सुझाव देती है। सुझाव से चिढा वह फ्रेंच मालिक एक दिन खाना बनाने की एक प्रतियोगिता में रानी को अपने भारतीय खाने के साथ शामिल होने की चुनौती देता है। रानी अपने तीनों जापानी,रसियन और अफ्रिकन साथी के साथ मिल कर गोल गप्पे बनाती है,और सबसे अधिक बिक्री की चुनौती जीत लेती है। चार देश के लोग मिलकर गोलगप्पे बना रहे हैं,और पांचवे के लोग खा रहे हैं,अद्भुत।यह विकास बहल की पटकथा और निर्देशन की कुशलता है कि ये सारी घटनाएं कहानी के विस्तार में अपने स्वभाविक रौ में आती हैं।अमस्टर्डम में ही उसकी मुलाकात एक पाकिस्तानी लडकी होती है जो एक सेक्स क्लब में काम कर रही है। रानी का परिचय देते ही फ्रेंच में बातचीत की शुरुआत करने वाली वह लडकी खालिस उर्दू में बात करने लगती है। रानी जब उसके काम पर टिप्पणी करती है तो वह कहती है,परिवार की सबसे बडी बेटी थी,अब बेटा बन कर परिवार पाल रही हूं।

वास्तव में यदि महिला सशक्तिकरण का अर्थ महिलाओं का सिर्फ ताकत से सशक्त होना नहीं,बल्कि मन से सशक्त होना है तो विकास बहल अपनी क्वीन को बगैर किसी दावे के आहिस्ते के साथ एक प्रतीक के रुप में दर्शकों के सामने स्थापित करते हैं। यूं तो क्वीन के हरेक दृश्यों पर विस्तार से बात की जा सकती है,लेकिन कुछ दृश्यों में विकास जिस सहजता से विषय को रेखांकित करते जाते हैं,विस्मित करती है।इसलिए नहीं कि दृश्य भव्य हैं,संवाद में गंभीर बात कही जा रही हो,विस्मित अपने नएपन और सार्थकता के कारण करती है।पेरिस में वह रात मे  अकेले सूने सडक से गुजर रही होती है।एक गुंडा उसका बैग छीन कर भागने की कोशिश करता है।पहली बार विदेश गयी रानी बगैर धैर्य खोये बैग की कसकर पकड लेती है, उस अनजान मुल्क की सडक पर अपनी ही भाषा में चीखती है,चिल्लाती है।पकड मजबूत बनाने के लिए वह बैग पकडे हाथों को पैर के बीच दबा लेती है,और बीच सडक पर लोट जाती है।आस पास से लोगों की आवाजें आने लगती है और अंततः वह हट्ठे कट्ठे गुंडे से अपने बैग बचा लेती है।  

रानी राजौरी गार्डन की एक आम लडकी है।पारिवारिक दोस्त के बेटे विजय(राज कुमार राव) से उसकी शादी हो रही है। विजय रानी को पहली ही नजर में दिल दे बैठा था और लगातार पीछा कर रानी को प्रभावित करने में सफल रहा था।लेकिन अब जबकि दो दिन बाद शादी होने वाली है,लंदन से इंजीनियरिंग पढ कर लौटा विजय रानी के देशज व्यक्तित्व के कारण शादी से इन्कार कर देता है।रानी कोई कारण समझ नहीं पाती और टूट जाती है।लेकिन दादी के हिम्मत देने पर वह अपने आपको संभालती है और हनीमून के लिए पेरिस में आरक्षित होटल में अकेले समय बिताने के लिए निकल पडती है। यह वही रानी है जो अपने मंगेतर से भी मिलने अपने छोटे भाई के साथ जाती है। लेकिन अब विजय ने हनीमून पर जो सब दिखाने की उम्मीदे बधायीं थी,रानी वह सब कुछ देख लेना चाहती है।

होटल में ही उसकी मुलाकात रुम अटेंडेंट विजयलक्ष्मी(लीजा हेडेन) से होती है।वह सिंगल मदर है, उसे शराब और सेक्स से परहेज नहीं। लेकिन रानी के लिए वह मायने नहीं रखता, मायने रखता है विजयलक्ष्मी का सद्भाव।विजयलक्ष्मी के साथ एक नई दुनिया से वह रु ब रु होती है।यहां सबसे महत्वपूर्ण उसकी इच्छाएं आकांक्षाएं हैं।विजयलक्ष्मी उसका ख्याल रखती है,लेकिन किसी बडी बहन की तरह नहीं,दोस्त की तरह एक स्पेश देते हुए। विकास की खासियत है कि क्वीन में वे महिला सशक्तीकरण को उसकी शारिरिक स्वतंत्रता से अलग कर देखते ही नहीं,स्थापित भी करते हैं। आजादी रानी को अच्छी लग रही है,लेकिन वह शरीर दिखाने वाले कपडे पहनने को तैयार नहीं हो पाती। क्वीन में परदे पर कई बार ब्रा दिखायी जाती है। कहीं न कहीं विकास 60 के दशक में अमेरिका में शुरु हुए बर्न द ब्रा मूवमेंट का शालीनता से जवाब देते देखते हैं। वे शायद यह दिखाने की कोशिश करते हैं कि ब्रा उतार फेकना आजादी का प्रतीक नहीं हो सकता। विजयलक्ष्मी शराब और सेक्स की चाह में एक क्लब में जाने को तैयार होती है,लेकिन रानी आग्रह करती है,कहीं और नहीं चल सकते,और वह मान जाती है।रानी जब विजयलक्षमी से अलग हो रही होती है तब वह रानी के कुरते में होती है।स्वभाविक है यहां महादेवी वर्मा के उस संस्मरण की याद आती है जिसमें वे अपनी सेविका को हिन्दी नहीं सिखा सकी,लेकिन उन्हें  भोजपुरी सिखा देती है।

विदा लेते हुए रानी कहती भी है।शराब थोडी कम पिया करो,और वो हर किसी के साथ सेक्स भी ठीक नहीं।लेकिन इसी रानी को जब रेस्टोरेंट का मालिक यह कहता है कि गोलगप्पे भले ही हिन्दुस्तानी अच्छे होते हैं,लेकिन फ्रेच किस का जवाब नहीं,तो रानी पल भर नहीं हिचकती उसे किस करने से।निश्चय ही विकास आजादी और अराजकता के फर्क का अहसास कराने की कोशिश करते हैं।

रानी शराब नहीं पीती,सेक्स नहीं करती,सिगरेट नहीं पीती,छोटे कपडे नहीं पहनती..इसके बावजूद पेरिस से लौटने के बाद उसमें इतनी हिम्मत दिखती है कि वह शादी के लिए घिघनते अपने मंगेतर के हाथ में मंगनी की अंगूठी खुद जाकर थमा सकती है। महिलाओं की आजादी के नाम पर शुद्ध देशी रोमांस और सशक्तीकरण के नाम पर गुलाब गैंग जैसे तमाशे के बाद क्वीन वाकई सुकून देती है।

शुक्रवार, 20 सितंबर 2013

हिन्दी के रवि किशन



किसी अभिनेता की दो फिल्में एक साथ रिलीज हों,और दोनो ही फिल्मों में उसके अभिनय और चरित्र को खासतौर से रेखांकित भी किया जाय,अमूमन ऐसा कम देखा जाता है।लेकिन रवि किशन जैसा आमतौर पर हिन्दी सिनेमा के लिए पराया माने वाला अभिनेता जब ऐसा कमाल कर जाता है, तो मानना पडता है जिंदगी में अनुभव और मेहनत कभी न कभी जरुर प्रतिदान देती है। अनुभव और मेहनत का यही प्रभाव देखा जा सकता है,हाल ही में रिलीज 'बजाते रहो' और 'इस्सक' में।एकदम अलग जोनर की सामान्य सी दोनों फिल्मों को यदि कुछ विशिष्ट बनाती है,तो वह है रवि किशन। 'बजाते रहो' में रवि किशन एक चिटफंड बैंक के मालिक बने हैं,जो लोगों को रकम बढाने का झांसा देकर करोडों रुपसे इकट्ठा करता है।लेकिन जब लोगों को रकम लौटाने की बारी आती है तो खुद पीछे हो जाता है और सारी जवाबदेही अपने एक कर्मचारी पर लाद देता है,जो अपमानित होकर आत्महत्या कर लेता है।एक ओर शातिर ठग और दूसरी ओर रईस पंजाबी व्यवसायी सब्बरवाल के दोहरे चरित्र को कुशलता से साकार कर रवि किशन विनय पाठक और रणवीर शौरी जैसे कलाकारों को बराबर की चुनौती ही नहीं देते,अपनी अलग पहचान बनाने में भी सफल होते हैं।इसके ठीक विपरीत मनीष तिवारी की 'इस्सक' में रवि बनारस के बालू माफिया सीता सिंह की दबंग भूमिका में दिखते हैं।जो भूमिका छोटी होने के बावजूद पूरी फिल्म को अपने नियंत्रित रखता है।ये हैं हिन्दी के रवि किशन,अपनी भोजपुरी सिनेमा की जमीन से कोसों दूर। जिसकी गवाही इन्हीं दोनों फिल्मों के साथ में रिलीज हुई उनकी भोजपुरी फिल्म 'धुरंधर' देती भी है।
सिर्फ 'इस्सक' और 'बजाते रहो' में ही नहीं,रवि किशन जब भी ङिन्दी सिनेमा में दिखाई देते हैं,भूमिका  की  लंबाई से परे चमत्कृत करते हैं,चाहे 'रावण' के मंगल हों या '1971' के कैप्टन जैकोब। 1971 के भारत पाक युद्ध पर बनी  पियूष मिश्रा लिखित इस  फिल्म के साथ रामानंद सागर की प्रतिष्ठित फिल्म  कंपनी ने लंबे समय के बाद बडे परदे पर दस्तक ही नहीं दी थी, रामानंद सागर के बेटे अमृत सागर ने निर्देशन की शुरुआत भी की थी। मनोज वाजपेयी,दीपक डोबरियाल सहित दर्जन भर पुरुष अभिनेताओं के बीच भी रवि किशन को भुलाना संभव नहीं होता। खास कर अपने साथी सैनिकों को बचाने के लिए अपनी जान न्यौछावर करने के क्लोज अप में दिखाए जारहे उनके दृश्य में अभिनय की परिपक्वता देखी जा सकती है। मणि रत्नम की 'रावण' में अभिषेक बच्चन के बरक्स रवि की कुछेक दृश्यों में सिमटी छोटी सी भूमिका थी,लेकिन 'द हिन्दू' ने अपनी समीक्षा में खास तौर से रवि के अभिनय की सराहना करते हुए लिखा,अभिषेक बच्चन को रवि किशन से सीखना चाहिए कि किस तरह अभिनेता को पात्र के अंदर प्रवेश करना होता है।'द हिन्दू' की समीक्षा इसलिए भी अतिशयोक्ति नहीं लगती कि आखिर कोई तो बात है कि श्याम बेनेगल,मणि रत्नम,डा.चंद्र प्रकाश द्विवेदी,तिग्मांशु धूलिया,आनंद एल राय जैसे निर्देशक रवि की अभिनय क्षमता पर यकीन कर रहे हैं।'बुलेट राजा' जैसी हार्डकोर कामर्शियल फिल्म में रवि को स्त्री और पुरुष की दोहरी भूमिका सौंपी जा रही है। उल्लेखनीय है कि हिन्दी फिल्मों में रवि के लिए कोई टेलरमेड भूमिका नहीं लिखी जा रही। भोजपुरी में देशज भूमिकाओं की एकरसता के विपरीत हिन्दी में रवि की पहचान विविधता से है,या कह सकते हैं उस अभिनेता के रुप में जो कोई भी भूमिका में अपनी छाप छोड सकता है।'एजेंट विनोद' के रा एजेंट और 'लक' के शातिर अपराधी को देख कर कैसे यकीन किया जा सकता है कि इसकी बुनियाद अभी भी भोजपुरी सिनेमा पर ही टिकी है।
दांत पीस कर और गले फाडकर संवाद बोलते और नायिकाओं के लंहगे को रिमोट से उठाते रवि किशन को देख कर किसी को भी आश्चर्य हो सकता है कि सिर्फ भाषा बदलने  के साथ किसी अभिनेता का अभिनय  ही नहीं,उसका संपूर्ण व्यक्तित्व भी इस कदर किस तरह बदल सकता है। हिन्दी  सिनेमा में रवि की सिर्फ भाषा ही नहीं बदलती लुक से लेकर जेश्चर पोश्चर तक में एक नए रवि दिखाई देते हैं,जो इमरान खान के बरक्स श्रुति हसन जैसी आधुनिका को प्रभावित करने की कोशिश करता है। स्वभाविक सवाल उठता है आखिर रवि किशन अपना उत्कृष्ट हिन्दी के लिए बचा कर क्यों रखते हैं।क्यों नहीं उसका एकांश भी भोजपुरी सिनेमा में प्रदर्शित कर उसे समृद्ध करने की कोशिश करते हैं। जब भोजपुरी में सीजंड निर्देशक किरण कांत वर्मा के साथ रवि किशन 'हमार देवदास' में देवदास की भूमिका में अवतरित हुए तो हर कोई को उम्मीद थी कि भोजपुरी सिनेमा के लिए यह एक प्रस्थान विन्दु बन सकेगा । लेकिन देवदास की कहानी के बावजूद रवि इसे भोजपुरी की सामान्य फिल्म से बेहतर नहीं बना सके।
यह बात सही है कि रवि किशन ने शुरुआत हिन्दी फिल्म से ही की थी, वह भी काजोल जैसी अभिनेत्री के अपोजिट,जितेन्द्र जैसे अभिनेता के साथ, फिल्म थी 'उधार की जिन्दगी'। फिल्म हिट भी हुई लेकिन रवि के लिए मददगार साबित नहीं हुई। रवि को वास्तविक पहचान मिली भोजपुरी सिनेमा से ही । यह संयोग ही कहा जा सकता है कि रवि किशन जब हिन्दी सिनेमा से निराश हो चुके थे, भोजपुरी सिनेमा को सदी के आखिरी दशक में हिन्दी सिनेमा की वह जमीन मिल गई जो डेविड धवन और गोविन्दा की जोडी के साथ कायम भदेशपन के हाशिए पर जाने से खाली हुई थी। यह वह समय था जब हिन्दी सिनेमा एन आर आई  दर्शकों को लुभाने के दवाब में भव्यता को समर्पित होते जा रही थी। स्वभाविक था हिन्दी के मूल दर्शकों को भोजपुरी में थोडा अपनापन दिखा। भोजपुरी फिल्में बनने की गति भी तेज हुई और उसकी सफलता का प्रतिशत भी। इसी जमीन पर उदय हुआ रवि का। उत्तर प्रदेश के जौनपुर से मुम्बई पहुचने वाले रवि के लिए यह सहज भी था। अभिनेता के रुप में रवि की पहचान को भोजपुरी सिनेमा भले ही मजबूत  नहीं कर सकी,एक ब्रांड के रुप में स्टैबलिश होने में रवि को देर नहीं लगी।
लेकिन हिन्दी सिनेमा से शुरुआत करने वाले रवि किशन अपनी क्षेत्रीय पहचान से संतुष्ट नहीं हो सकते थे। भोजपुरी में लोकप्रियता के चरम पर रहते हुए ही उन्हे जब 'बिग बास' में आने का आफर मिला ,तो बेहिचक उन्होंने हामी भर दी ,यह जानते हुए भी कि उनके स्थापित कैरियर के लिए यह खतरनाक हो सकता है। रवि के आत्म विश्वास ने उसका साथ भी दिया और दर्जन भर सेलिब्रेटी के बीच उसने अपने दर्शकों को याद करवा दिया,'जिंदगी झंड बा,फिर भी घमंड बा'।बिग बास के फाइनल तक पहुंचे रवि के व्यक्तित्व और एट्टीट्यड ने हिन्दी सिनेमा को उसे एक बार फिर करीब से जानने का मौका दिया। और फिर रवि ने मिल रहे एक एक अवसर का, चाहे वह छोटा हो या बडा, शिद्दत के साथ उपयोग किया।जो भी चुनौती मिली उसे स्वीकार किया,चाहे वह चितकबरे में नंगे खडे होने का हो या,'4084' में अतुल कुलकर्णी,नसीरूद्दीन शाह, के के मेनन जैसे सीजंड अभिनेताओं के सामने उतरने का,या फिर मेरे डैड की मारुति और तनु वेडस मनु जैसी फिल्मों की छोटी भूमिकाओं में अपनी उपस्थिती दर्ज करवाने का। उल्लेखनीय है कि हिन्दी में लगातार सशक्त होती पहचान के बीच भी रवि भोजपुरी से परहेज करते नहीं दिखते। आज भी रवि किशन की भोजपुरी रिलीज हो रही है,और यहां रवि उसी फूहडता का निर्वाह करते दिखाई देते हे,जिसके लिए भोजपुरी फिल्म जानी जाती है। रवि कहते हैं, सिनेमा एक सामूहिक निर्माण प्रक्रिया है।वह किसी एक के बेस्ट देने से बेस्ट नही हो सकती।कलाकार का अभिनय कई बातों पर निर्भर करता है,पटकथा,निर्देशन, साथी कलाकारों का अभिनय...भोजपुरी सिनेमा की जैसी निर्माण प्रक्रिया है,एक अभिनेता उसे बहुत प्रभावित नहीं कर सकता।जाहिर भोजपुरी में भोजपुरी के व्याकरण में ही मुझे भी काम करना होता है।जबकि जब आप श्याम बेनेगल के साथ काम कर रहे होते हैं या सामने नासिर साहब जैसे महान अभिनेता के सामने होते हैं तो आप स्वयं अपने को बेहतर करने के लिए तैयार कर लेते हैं।

     वाकई हिन्दी सिनेमा में रवि किशन की सफलता कहीं न कहीं भोजपुरी सिनेमा को मुंह चिढाती दिखती है। मराठी,बांग्ला,मलयालम,असमिया..जिस भी भाषा में फिल्म बन रही है,उसके पास अपने अभिनेता हैं,तो अपनी कहानी भी,जिसके बल पर वे फिल्में राष्ट्रीय अंतर्राष्ट्रीय सम्मान तक हासिल कर रही हैं। लेकिन भोजपुरी शायद एकमात्र ऐसी भाषा होगी जिसके अभिनेता को अपना श्रेष्ठ दिखाने के लिए दूसरी भाषा के शरण में जाना पडता हो।सवाल रवि किशन नहीं,भोजपुरी के सामने है,क्या उसके पास भी कभी कोई वेलकम टू सज्जनपुर हो सकेगा,जहां कोई भी अभिनेता अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन को उत्साहित हो सके।