शुक्रवार, 20 जुलाई 2012

समय की चुनौतियों के सामने असहाय

अपने समय में सफलता के पर्याय के रुप में जुबली कुमार के नाम से चर्चित राजेन्द्र कुमार का बंगला ‘आशिर्वाद राजेश’ खन्ना खरीद रहे होंगे, तो उन्हें शायद ही अहसास होगा कि सफलता का यही क्रम होता है, एक हाथ से निकलती है दूसरे में पहुच जाती है। कुछ वर्ष पहले आइफा के अवार्ड समारोह में अमिताभ बच्चन से लाइफ टाइम एचीवमेंट आवार्ड ग्रहण करते हुए उन्होने अपनी ही फिल्म‘दाग’के संवाद दुहराते हुए कहा था,जहां मैं हू,कल कोई और था,कल कोई और होगा।लेकिन अद्भुत संयोग की राजेश खन्ना वास्तविक जीवन में इस सच्चाई को कभी स्वीकार नहीं कर पाए। यदि वे यह स्वीकार कर पाते तो निश्चित रुप से आज उन्हें हम एक सुपर स्टार के साथ ,एक हिम्मती व्यक्ति के रुप में भी याद कर पाते। कह सकते हैं राजेश खन्ना ने जो चाहा सो पाया था, ऐसा संयोग वाकई काफी कम लोगों को नसीब हो पाता है। सिनेमा में लोकप्रियता के शिखर पर वे रहे,राजनीति में आए तो सांसद बने,अपने समय की सबसे चर्चित नायिका डिम्पल कापडिया से अपनी शर्तों पर शादी की। काबिल बेटियों के पिता बने और अक्षय कुमार जैसे दामाद का साथ मिला। बावजूद राजेश खन्ना अपने अंतिम दौर में हताश दिखते थे, तो यही कहा जा सकता है कि अपने आपको कभी भी वे रील लाइफ से अलग कर नहीं देख पाए। काफी कम लोग होते हैं जो अपने वास्तविक जीवन में भी एक्टिंग करते रह पाते हैं, राजेश खन्ना ये कर पाए थे। शायद इसीलिए उनकी मौत भी किसी सिनेमा के दृश्य की तरह ही हुई,एक लम्बे क्लाइमेक्स के साथ। ‘आनन्द’ फिल्म में अमिताभ बच्चन का बाबू मोशाय का कैरेक्टर यदि आज भी मुहावरे के रुप में याद किया जाता है तो उसकी श्रेय जाता है राजेश खन्ना को ,जिन्होंने अपनी अभिनय शैली और संवाद अदाय़गी से बाबू मोशाय को कालजयी पहचान दी। ‘आनंद’ उनके सशक्त अभिनय का एक प्रतीक भर नहीं है। यह व्यक्ति को जिंदगी से जूझने का एक सबक देती थी। निश्चित रुप से जिसे मानव यभ्यता के अंत तक याद रखना चाहेगा। लाइलाज बीमारी से पीडि़त,मौत को सामने देख कर भी जीवन से हार नहीं मानने वाले किरदार को राजेश खन्ना ने परदे पर जिस खूबी से साकार कर दिया था,किसी के लिए भी प्रेरक था वह, अफसोस राजेश खन्ना के लिए वह भूमिका प्रेरणा नहीं बन सकी। अच्छा लगता वास्तविक जिंदगी में भी उन्हे उसी रुप में याद कर पाते। लेकिन शायद जीवन और फिल्म कभी एक नहीं हो सकती। ऋतिक रोशन की सफलता पर बात करते हुए उनके चाचा राजेश रोशन ने कहा था, यह पागलपन राजेश खन्ना के लिए थोडा ज्यादा ही था। यह जीवन की वास्तविकता है कि शिखर पर कोई भी व्यक्ति अधिक समय तक नहीं टिका रह सकता, एवरेस्ट पर आप ठहर नहीं सकते। जिंदगी का यह व्यवहारिक सच है राजेश खन्ना जिसके प्रतीक थे। सफलता का जो शिखर राजेश खन्ना ने हासिल किया था वह भी अकल्पनीय था, और जितने कम समय तक वे शिखर पर रहे वह भी अकल्पनीय लगता है। 1969 में ‘आराधना’के साथ हिन्दी सिनेमा के इस ध्रुवतारे का उदय होता है ,लेकिन मात्र 4 वर्षों के बाद 1973 में‘नमक हराम’के साथ ही इसकी चमक धूमिल पडने लगती है। और अमिताभ के उदय के साथ ही पलक झपकते हिन्दी सिनेमा इन्हें हाशिए पर कर देती है। 70 के दशक में फिल्म फेयर हरेक वर्ष य़ूनाईटेड प्रोड्यूसर्स के साथ मिलकर नए कलाकारों की खोज के लिए प्रतियोगिता का आयोजन करती थी।हिन्दी सिनेमा के केन्द्र तत्कालीन बम्बई से दूर अमृतसर में 29 दिसंबर 1942 को जन्में जतिन खन्ना ने परदे पर उतरने के सपने के साथ 1965 में इस प्रतियोगिता में आवेदन दिया, और चयन प्रक्रिया की यह ईमानदारी का ही प्रतीक था कि बगैर किसी फिल्मी बैकग्राउंड के वे चुन लिए गए। कहा जाता है फाइनल में दस हजार युवाओं के बीच इनका चयन हुआ था। आज परिवारों के बीच फंसी इंडस्ट्री को देख वाकई आश्चर्य होता है, क्या वाकई इतना लोकतांत्रिक था हिन्दी सिनेमा।प्रतियोगिता की घोषणा के अनुरुप इन्हें दो फिल्में भी मिल गई। पहली फिल्म ‘राज’ मिली , लेकिन प्रदर्शित हुई `आखिरी खत` । चेतन आनंद के निर्देशन में बनी यह फिल्म हिट भले ही नहीं हुई,आस्कर में जरुर पहुंच गई। परिवार वालों की मर्जी के खिलाफ अभिनय को बतौर करियर चुनने वाले 24 वर्षीय राजेश खन्ना की शुरुआत दमदार रही।1966 में ‘राज’, ‘बहारों के सपने’ और ‘औरत’ के रूप में उनकी कई फिल्में आई। अपने समय की बडी नायिकाओं का साथ भी मिला । उन्हें बॉक्स ऑफिस पर कामयाबी भले नहीं मिल सकी, लेकिन फिल्मकारों को उनके विलक्षण लुक संभावनाएं जरुर दिखने लगी। शायद समय को प्रतीक्षा वर्ष 1969 की थी,राजेश खन्ना की दोहरी भूमिका वाली संवेदनशील फिल्म `आराधना` आयी और एयर फोर्स पायलट की भूमिका निभा रहे राजेश खन्ना के कैरियर ने जब उडान भरी तो इतिहास बन गया। बॉलीवुड के पहले सुपरस्टार मान लिए गए राजेश खन्ना। अब समय राजेश खन्ना का था। फिल्मों से उनका जुडना सफलता की गारंटी माना जाने लगा था। जी.पीं सिप्पी जैसे फिल्मकार की फिल्म ‘अंदाज’ शम्मी कपूर हेमा मालिनी के बावजूद राजेश खन्ना की अतिथी भूमिका के लिए हिट मानी जाती थी । कहा जाता है राजेश खन्ना के मरने के दृश्य में लडकियां बेहोश होकर गिर जाया करती थी। 1970 से 1973 तक तक हरेक वर्ष राजेश खन्ना ने तकरीबन आधी दर्जन हिट फिल्में दी। यह हिट, आज के हिट से किस कदर अलग था यह इसी से समझा जा सकता है कि आज फिल्में ढाई दिन में हिट हो जाती जबकि उस समय हिट होने का मतलब कम से कम फिल्मों का 25 हफ्ते चलना जरुरी माना जाता था। कोई प्रमोशन गिमिक्स नहीं, फिल्में फिल्मकार के बताने से नहीं ,दर्शकों के पसंद करने पर हिट होती थी। जाहिर है राजेश खन्ना की फिल्में हिट हो रहीं थी तो उसका अर्थ था कि राजेश खन्ना को दर्शक पसंद कर रहे थे। राजेश खन्ना से शायद सबसे भूल यहीं हुई, दर्शक राजेश खन्ना को नहीं उनके अभीनीत पात्र को पसंद कर रहे हैं,राजेश खन्ना के लिए यह स्वीकार करना मुश्किल था। लेकिन सच यही था। राजेश की सफलता का सबसे बडा कारण था कि हिन्दी सिनेमा में पहली बार उन्होंने मध्य वर्ग को साकार किया था । दो रास्ते, दुश्मन ,सफर, अमर प्रेम जैसी उस दैर की उनकी सभी फिल्मों में वे एक ऐसे मध्यवर्ग युवा की भूमिका में दिखते थे,जो समाज को बेहतर बनाने की कोशिश में जुटा है,बगैर समाज के नियमों को चुनौती देते हुए। महिलाएं उनमें नेक्स्ट डोर व्वाय को देखा करती थी। वे उनमें अपने प्रेमी,अपने भाई,अपने बेटे को देखा करती थी। मुझे याद है पहली बार मेरे चाचा खासतौर पर मुझे लेकर अपना देश देखने गए थे, कारण बस इतना था कि उस फिल्म में चाचा भचीजे पर एक गाना फिल्माया गया था, रोना कभी नहीं रोना....यह एक व्यक्ति या एक फिल्म की बात नहीं ,राजेश खन्ना की फिल्मों में दिखता पारिवारिक सरोकार दर्शकों को आमंत्रित करता था।याद कर सकते हैं अपने ढलान के दिनों में राजेश खन्ना ने भले ही ‘वफा’ और ‘रेड रोज’ जैसी फिल्मों में काम किया हो, उनके फिल्मोग्राफ में व्यस्क फिल्में ढूंढनी मुश्किल है। वे परदे पर पारिवारिक दिखते थे, गौरतलब है कि उस दौर में सितारों के निजी जीवन में घुसपैठ करने वाला टेलीविजन नहीं था,जाहिर था दर्शक अपने सितारों से सिर्फ उनकी फिल्मों से ही रु ब रु हो पाते थे।देखते देखते परदे का स्नेहिल,सामाजिक चरित्र राजेश खन्ना के रुप में दर्शकों के दिलोदिमाग पर काबिज होता चला गया। राजेश की सफलता कभी अवार्डों की मोहताज नहीं रहा। राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार उस समय भी थे,लेकिन शायद न तो कभी राजेश खन्ना ने उसके लिए चिन्ता की और न ही जूरी कभी राजेश की लोकप्रियता के दवाब में आई। अपने पूरे कैरियर में उन्हें मात्र तीन बार फिल्म फेयर अवार्ड से सम्मानित किया जा सका। 1970 में बनी फिल्म `सच्चा झूठा` के लिए उन्हें पहली बार सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का फिल्मफेयर अवॉर्ड दिया गया। लेकिन सफलता का यही आत्म विश्वास राजेश खन्ना को तब भारी पडने लगा जब नई चुनौतियों के सामने वे लाचार से दिखने लगे।न तो बदलते समय के साथ वे नई भूमिकाओं के लिए तैयार हो रहे थे, नही अपने अभिनय को विस्तार देने के लिए ।उनके लगता था दर्शक उनकी मजबूरी नहीं, वे दर्शकों की मजबूरी हैँ। राजेश खन्ना समय को रोक लेना चाहते थे,जो असंभव था। जाहिर है न तो वे अपनी गुमनामी झेल सके, नही उससे उबरने की कोशिश कर सके। ये सब याद करने का शायद यह अवसर न हो, लेकिन याद करना इसलिए जरुरी है कि कलाकारों को सितारों का दर्जा देते हुए हम याद रख सकें कि वे भी हमारी तरह इन्सान हैं,वे भी उन्हीं अहसासों से गुजरते हैं,जिससे कोई भी आम इन्सान गुजरता है।लेकिन इससे इन्कार नहीं किया जा सकता कि जाते जाते भी आनंद हमारे लिए एक सबक छोड गया।

शुक्रवार, 13 जुलाई 2012

> नायक जो लडना जानता था
कहने को हिन्दी सिनेमा में 1962 भले ही 'साहब बीबी और गुलाम' के लिए याद की जाती है, लेकिन वास्तव में 1962 में आयी किसी फिल्म ने यदि हिन्दी सिनेमा का स्वभाव बदल दिया तो वह फिल्म थी, दारा सिंह की 'किंग कांग'। 'किंग कांग' 50 के दशक में विश्व चैंपियन पहलवान थे जिन्हे दारा सिंह ने अखाडे में पटकनी देकर फ्री स्टाइल कुश्ती में भारतीय वर्चस्व को स्थापित किया था। फिल्म की पूर्वपीठिका भी यही थी, जाहिर है दारा सिंह नायक की भूमिका में थे। 'गजनी' को लेकर जब आज हम अति उत्साहित होते हैं तो किंग कांग की याद स्वाभाविक है कि उस समय भी किसी नायक ने अपनी पहली बडी भूमिका नकारात्मक टाइटिल के साथ भी निभाने में संकोच नहीं किया था। दारा सिंह 1952 में जब फिल्मों में आए तो वह 'आन', 'बैजू बावरा', 'दाग' जैसी सामाजिक फिल्मों का दौर था, देश तुरंत आजाद हुआ था, पंचवर्षीय योजनाओं में देशवासियों को सुनहरे भविष्य की झलक दिखने लगी थी ,ऐसे में 'संगदिल' में अवसर मिला दारा सिंह को,एक छोटी सी भूमिका के लिए। साथ में थे दिलीप कुमार। बावजूद इसके दारा सिंह पहचान लिए गए, लेकिन अभिनेता के रुप में नहीं अपनी निजी पहचान से जो उन्होंने वर्षों की मशकक्त से हासिल की थी। आश्चर्य नहीं कि दारा सिंह अपने सक्रिय जीवन में ही किंवन्दति बन गए। दारा सिंह भारतीय ताकत के पर्याय के रुप में स्वाकार कर लिए गए। शायद इसीलिए 60 वर्ष से उपर की उम्र में टेलीविजन धारावाहिक रामायण में हनुमान की भूमिका उन्होंने इस तरह निभाई कि कालान्तर में हनुमान के प्रतीक रुप में वे स्वीकार कर लिये गए। 2003-2009 तक वे सांसद भी रहे। लेकिन इन तमाम पहचानों के बावजूद दारा सिंह हिन्दी सिनेमा के एकमात्र अभिनेता रहे जिन्होंने अपनी मूल पहचान कभी नहीं खोयी। उनकी सार्वजनिक पहचान पहलवान की थी और आजीवन उन्होंने उस पहचान का सम्मान किया। खेलों की लोकप्रियता को लेकर चिंतित आज की पीढी शायद चकित भी हो सकती है कि क्रिकेटर के अलावे भी किसी खिलाडी को कैसे इस कदर लोकप्रियता मिल सकती है। कहा जाता है दारा सिंह की कुश्तियों का आयोजित होना किसी भी शहर के लिए एक महत्वपूर्ण परिघटना होती। कुश्ती के पहले और बाद वर्षों तक उसके अनुभव लोग एक दूसरे से बांटने का सुख उठाते रहते। अमृतसर के पास धरमूचक में जन्म लिया था दारा सिंह ने।उनके भाई थे रन्धावा । दोनों भाइयों को बचपन से ही कसरत का शौक था। अखाड़े में जाकर वे रोज दण्ड पेलते थे और कहा जाता है कि 100 बादाम, दूध-मक्खन के साथ रोज खाते थे। लेकिन पिता नहीं चाहते थे कि उनका बेटा पहलवान बने। पिता का मानना था कि पहलवानों के अंतिम दिन बेहद परेशानी में गुजरते हैं और उसे काफी परेशानियों का सामना करना पड़ता है। दारा सिंह के चाचा ने बढ़ावा दिया और दोनों भाइयों को पहलवान बनाया। दोनों ने छोटी उम्र से ही पहलवानी की शुरूआत कर दी और गाँव के दंगलों से लेकर शहरों तक में ताबड़तोड़ कुश्तियाँ जीतकर अपने गाँव का नाम रोशन किया। लेकिन दारा की बात अलग थी। कुश्ती के प्रति इनकी दीवानगी का यह आलम था कि नवम्बर19 1928को जन्मे दारा सिंह लगभग 20 वर्ष की उम्र में गांव से आगे विश्वविजय के लिए निकल पडे। 1947 में दारा सिंह सिंगापुर आ गये। वहाँ रहते हुए उन्होंने भारतीय स्टाइल की कुश्ती में मलेशियाई चैम्पियन तरलोक सिंह को पराजित कर कुआलालंपुर में मलेशियाई कुश्ती चैम्पियनशिप जीती। एक पेशेवर पहलवान के रूप में सभी देशों में अपनी धाक जमाकर वे में भारत1952 लौट आये। उनकी लोकप्रियता को भुनाने के उद्देश्य से शीघ्र ही हिन्दी सिनेमा उनके आगे रोल की झोली फैला कर हाजिर हो गया। फिल्मों में काम की शुरुआत तो उन्होंने कर दी लेकिन कुश्ती की ललक नहीं छूटी। 1954 में वे भारतीय कुश्ती चैम्पियन बने। उसके बाद उन्होंने कामनवेल्थ देशों का दौरा किया और विश्व चैम्पियन किंगकांग को परास्त कर दिया। बाद में उन्हें कनाडा और न्यूजीलैण्ड के पहलवानों से खुली चुनौती मिली। जिसका जवाब उन्होंने 1959 में.कलकत्ता में हुई कामनवेल्थ कुश्ती चैम्पियनशिप में कनाडा के चैम्पियन जार्ज गार्डियान्को एवं न्यूजीलैंड के जान डिसिल्वा को धूल चटाकर दिया। दारा सिंह ने उन सभी देशों का दौरा किया जहाँ फ्रीस्टाइल कुश्तियाँ लड़ी जाती थीं। अंततः29 मई 1968 को अमरीका के विश्व चैम्पियन लाऊ थेज को पराजित कर फ्री स्टाइल कुश्ती के विश्व चैम्पियन बन गये। 1983 में उन्होंने अपराजेय पहलवान के रूप में कुश्ती से सन्यास ले लिया। दारा सिंह ने कुश्ती से भले ही संन्यास ले लिया लेकिन कुश्ती के प्रति उनका लगाव कभी कम नहीं हो सका। कुश्ती के छोटे बडे किसी आयोजन के आमंत्रण को शायद वे कभी नहीं टाल सके। जिस किसी अखाडे ने उनसे सहयोग की गुजारिश की, उसके सहयोग को वे तत्पर रहे। हालांकि उनके प्रशंशकों को उम्मीद थी कि दारा कुश्ती से संन्यास लेने के बाद अपना पूरा समय फिल्मों को दे सकेंगे,और उनका शारिरिक सौष्ठव वास्तविक जीवन में न सही परदे पर दिखता रहेगा, लेकिन निश्चय ही यदि सार्वजनिक जीवन में सक्रिय रहने की गुंजाइश होती तो दारा सिंह उसे कुशती में ही लगाना पसंद करते। फिल्मों में काम उन्होंने अवश्य जारी रखा लेकिन शायद अपनी सीमा का अहसास था उन्हें, कभी भी उन्होंने अभिनय में चुनौती लेने की कोशिश नहीं की। उन्होंने वही भूमिका स्वीकार की जो उनके व्यक्तित्व से मेल खाती थी । जब वी मेट में पंजाब के एक परिवार के मुखिया के रुप में वे दिखते हैं परदे पर बडे बडे मेथड एक्टरों को चुनौती दे डालते हैं। जवानी के दिनों में दारासिंह बेहद हैंडसम थे। ऊंचा कद, चौड़ा सीना, मजबूत बांहे और सहज भोली मुस्कान । वह दौर नाजुक नायकों का था,पारिवारिक सज्जन सुंदर। दारा सिंह ने हिन्दी सिनेमा को एक नया नायक दिया जो लडना जानता था। मारधाड़ वाली फिल्म बनाने वालों को ऐसा हीरो चाहिए था जो उनकी फिल्मों में फिट बैठ सके। दारा सिंह के बारे में सबसे अहम बात यह थी कि वे ऐसी भूमिकाओं में विश्वसनीय लगते थे क्योंकि विश्व विजेता पहलवान का तमगा उनके साथ जुडा था। उनको लडते देख दर्शकों को विश्वास हो जाता कि वे वाकइ लड सकते हैँ।आज जब अपनी भूमिका में फिट बैठने के लिए सितारों को सिक्स पैक की तैयारी में खास तौर से जुटा देखते हैं दारा सिंह की अहमियत का अहसास होता है। उस दौर में तलवार बाजी, स्टंट्सम और फाइटिंग वाली फिल्मों का एक अलग ही दर्शक वर्ग था। यह नायक सिनेमा के व्याकरण पर कितना सही था,यह अलग विमर्श का विषय हो सकता है लेकिन इससे इन्कार नहीं किया जा सकता कि आने वाले दिनों में वही हिन्दी सिनेमा का भविष्य बनी। आज यही हिन्दी सिनेमा की मुख्यधारा है। अमिताभ बच्चन से लेकर दबंग सिंघम तक देखते हुए आप दिलीप कुमार को याद नहीं कर सकते ,दारा सिंह को ही याद कर सकते हैं। दारासिंह की शुरुआती फिल्मों के नाम भी उनके व्यक्तित्व के अनुरुप रखे जाते थे, रुस्तम-ए-रोम, रुस्तम-ए-बगदाद, फौलाद क्योंकि जब दर्शक दारा सिंह की फिल्म देखने जाते तो उन्हें सिर्फ दारा सिंह चाहिए था,कहानी तकनीक वगैरह दारा सिंह की लोकप्रियता के सामने बेमानी हो जाते थे । इन फिल्मों की कहानी बड़ी सामान्य होती थी और इनमें अच्छाई बनाम बुराई को दिखाया जाता था। दारा सिंह अच्छाई के साथ होते थे। स्क्रिप्ट इस तरह लिखी जाती थी कि ज्यादा से ज्यादा फाइट सीन की गुंजाइश हो ।जंग और अमन, बेकसूर, जालसाज, थीफ ऑफ बगदाद, किंग ऑफ कार्निवल, शंकर खान, किलर्स जैसी कई फिल्में दारा सिंह ने की और दर्शकों को रोमांचित किया। कहा जा सकता है कि दारा सिंह पहले अभिनेता थे जिन्होंने शर्टलेस होकर उन्होंने अपने शारिरिक सौष्ठव का प्रदर्शन किया। लेकिन जिंदगी है तो जिंदगी का अंत भी। अपार ताकत और अपार लोकप्रियता के प्रतीक दारा सिंह को हमारी लाख सद्भावनाएं भी नहीं रोक पा सकी। लेकिन उनकी स्मृतियां उतनी ही मजबूती के साथ हमारे मन पर कायम रहेगी। लडना सिखाने वाले अभिनेता के रुप में ही नहीं ,देश की ताकत के प्रतीक के रुप में भी।