शुक्रवार, 7 जून 2024

एक जो है कंगना

 


हिंदी सिनेमा के अभिनेता या अभिनेत्रियों में कंगना ऐसी अकेली होगी,जिसके चुनाव नहीं लडने पर लोग आश्चर्य करते।आमतौर पर चुनावों में सितारों के नाम की घोषणा अचानक ही होती है।आश्चर्य नहीं कि चुनाव में उतरने के पहले और बाद भी उनकी राजनीतिक सक्रियता आमतौर पर नहीं देखी जाती।कंगना की राजनीतिक सक्रियता हमेशा सुर्खियों में है,चाहे वह इंडस्ट्री का मामला हो,या फिर देश समाज का।कंगना चुप नहीं रहती। कुछेक साल पहले करण जौहर के एक इंटरव्यू से शुरु हुए नेपोटिज्म के विवाद ने इंडस्ट्री को कठघरे में खडा कर दिया,और अपनी झेंप मिटाने इंडस्ट्री कंगना पर फूहड आक्रमण में एकजुट हो गई,जिसका पुरजोर मुकाबला कंगना लगातार करती रही। 

जब पूरी इंडस्ट्री सुशांत सिंह राजपूत की मौत पर गुम साधे पडी थी, कंगना ने एक बार फिर कमान संभाली और उसकी मौत को नेपोटिज्म से जोडते हुए मुंबई पुलिस के इन्वीटिगेशन पर सवाल उठाए। मामला राममंदिर का हो,या कश्मीरी ब्राह्मणों का कंगना अपनी ईमानदार राय देने से कभी नहीं चूकती। व्यवसायिक चुप्पी उसके स्वभाव में ही नहीं थी।  हिमाचल प्रदेश के ठंढे वातावरण में जन्मी कंगना की पढाई पहले चंडीगढ और फिर दिल्ली में हुई।दिल्ली में ही अरविंद गौड के साथ उसने थिएटर सीखा,और थिएटर की छोटी सी लेकिन मजबूत विरासत लेकर अपने दृढ इरादे के साथ मुबई आ गई।पहली फिल्म मिली गैंगस्टर, और यहीं साथ मिला महेश भट्ट् का। इस फिल्म में कई ऐसे दृश्य थे जिसे निभाना सहज नहीं हो सकता था,लेकिन कंगना ने बेहिचक उन दृश्यों को अभिनीत किया। कहते हैं पहले ‘गैंगस्टर’ के आडीशन में कम उम्र कह कर इसे मना कर दिया गया था,बाद में बुला कर एक अपराधी की प्रेमिका की भूमिका इसे मिली।2006 में इस फिल्म को अबू सलेम की जिंदगी से प्रेरित के रुप में प्रचारित किया गया था।इसी साल कंगना को ‘वो लम्हें’ मिली,जो परवीन बाबी और महेश भट्ट् के जीवन से प्रेरित बताई जा रही थी।कंगना अपने काम के प्रति कितनी ईमानदार थी,और किस साहस और जीवट के साथ  अपनी भूमिका को उतारने की कोशिश की इसकी गवाह आज भी ये फिल्में हैं। आश्चर्य नहीं कि ‘वंस अपान ए टाइम’ इन मुंबई से लेकर ‘फैशन’ और ‘लाइफ इन ए मेट्रो’ तक कंगना एक खास तरह की फिल्मों की पसंद बनी रही।

‘तनु वेड्स मनु’ के बाद हिंदी सिनेमा को एक नई कंगना मिली, ‘गैंगस्टर’ और ‘फैशन’ के डार्क कैरेक्टर से मुक्त। यह वो चरित्र था, जो जीने का संदेश लेकर आ रहा था।जिसके पास जीने की जिद थी,और लडने का आत्मविश्वास। शायद ‘तनु वेड्स मनु’ में कंगना को अपने को जीने का अहसास हुआ होगा,फिर उसने पलट कर नहीं देखा,हाल ही में आयी ‘तेजस’,या फिर ‘पंगा’ ,जिसमें उसने एक ऐसे कबड्डी खिलाडी की भूमिका निभाई जो अपने बटे की जिद पर ग्राउंड पर दोबारा उतरती है और अपनी पहचान कायम करती है।‘क्वीन’ तो महिला सशक्तीकरण की प्रतीक फिल्म के रुप में हिंदी में देखी जाती रहेगी। यहां कंगना अपने अकेलेपन के साथ नहीं,परिवार,दोस्त और समाज के साथ दिखती थी। 

‘क्वीन’ के बाद जब हिंदी सिनेमा की अभिनेत्रियो की नई पहचान बन कर कंगना उभर रही थी, उसने अभिनय से ब्रेक लेकर पटकथा लेखन की पढाई करने न्यूयार्क फिल्म एकेडमी ज्वाइन करने का निर्णय ले लिया। जो लोग आज कंगना की शिक्षा पर सवाल उठा रहे हैं, उन्हें अहसास नहीं कि सिनेमा में लोकप्रियता के शिखर पर रहते हुए पढाई के लिए ब्रेक लेने का निर्णय कोई सामान्य अभिनेता नहीं ले सकता,उसके लिए कंगना होना चाहिए।14 वर्षों में 3 नेशनल अवार्ड और पद्मश्री पाने के लिए किसी अभिनेता को कितने जन्मों से गुजरना पडता है,यह समझने की जरुरत है।

कंगना के साथ मुश्किल यह है कि वह जितनी ईमानदार अपने चरित्र के प्रति रहती है,उतनी ही वास्तविक जीवन में भी। आप सहमत हों,असहमत हों,इससे इन्कार नही कर सकते कि कंगना परदे पर भी निर्भीक दिखती है, और परदे के बाहर भी। निर्भीकता कंगना के स्वभाव में है,आज के समय में यह दुर्लभ निर्भीकता सीखने की चीज है। 

 

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