मंगलवार, 5 जुलाई 2011

पागल हो गये हैं राम गोपाल

         राम गोपाल वर्मा की रंगीला ने हिन्दी सिनेमा को एक नया कलेवर दिया था। कहने को सामान्य सी प्रेम कहानी ही थी वह। एक निम्न ध्यवर्गीय परिवार की महत्वाकांक्षी लड़की और उसी महल्ले के एक लुम्पेन लड़के के पारिवारिक सम्बंध पहले दोस्ती में बदलते हैं फिर प्रेम में। लेकिन लड़की के सामने जब एक बड़े फिल्मी सितारे से प्रेम का अवसर आता है तो वह नहीं चूकती, यहां उसे अपनी महत्वाकांक्षा की राह आसान होते दिखती है। प्रेम तो प्रेम है, अन्तत: नायिका अपने पहले प्रेमी के पास लौट जाती है, सारी महत्वाकांक्षा को छोड़कर। इस परम्परागत कहानी का ट्रीटमेंट इतना जीवन्त और इरोटिक था कि रंगीला हिन्दी सिनेमा के लिए माइलस्टोन बन गयी। बदलते समय के दर्शकों ने भी प्यार के इस नये रूप को उत्साह से स्वीकार्य किया। लेकिन यहीं से राम गोपाल वर्मा के लिए दुविधा भी खड़ी हो गर्इ। वे कायदे से आकलन नहीं कर पाये कि दर्शकों ने उनकी फिल्म में प्यार के परम्परागत रूप को ज्यादा पसंद किया या उनकी प्रस्तुति को। उन्हें शायद लगा उनकी प्रस्तुति ज्यादा महत्वपूर्ण है। और उसके बाद जो हिन्दी सिनेमा में उन्होंने जो दौड़ शुरू की वह भी एक इतिहास ही है। अपनी प्रस्तुति पर उन्हें इस कदर विश्वास हो गया कि हिन्दी सिनेमा के लिए सबसे जरूरी नैरेशन और इमोशन को ही उन्होंने ताखे पर रख दिया। जिसकी इन्तहा राम गोपाल वर्मा की आग से लेकर पूफंक तक देखने को मिलती है। प्रेम कथा से लेकर थ्रिलर और हारर लगभग सभी तरह की फिल्में वर्मा ने बनायी। लेकिन यह भी सच है कि हिन्दी दर्शकों से उनके टूटते सरोकार ने कभी उनकी फिल्मों का उनके दर्शकों से कोइ रिश्ता बनने ही नहीं दिया। मुश्किल यह थी कि दर्शकों के अस्वीकार में भी उन्हें अपनी गलती का अहसास नहीं हो रहा था, बल्कि उन्हें लगता था दर्शक बेवकूफ हैं जो उनकी फिल्म समझ नहीं पा रहे हैं। दर्शकों ने उनकी नाच जैसी इरोटिक फिल्म को भी एकदम नकार दिया और अज्ञात जैसी हारर को भी। कहने को सत्या और कम्पनी में जरूर अंडरवल्ड के प्रति उनकी समझ दिखी, लेकिन गौर तलब है कि यहां हिन्दी समाज दिखने की जरूरत नहीं थी। सरकार या सरकार राज की तरह वर्मा ने व्यक्ति केन्द्रित फिल्म बनाने की कोशिश की। वहां उनका हूनर अपने सर्वश्रेष्ठ रूप में दिखा। यहां नि:शब्द को याद कर सकते हैं। लेकिन जैसे ही व्यक्ति को वे व्यापक बनाने की कोशिश करते हैं उनकी विचार शून्यता फिल्म पर हावी होने लगती है। नि:शब्द मेकिंग की दृष्टि से जितनी भी अच्छी फिल्म हो लेकिन एक सामाजिक नजरिये से देखें तो हिन्दी समाज के प्रति उनकी सोच की दयनियता स्पष्ट दिखायी देने लगती है। राम गोपाल वर्मा कहते भी हैं, उनकी फिल्मों में रिश्ते नहीं दिखायी देते। अपने कथानक में उन्हें इसकी जरूरत ही नहीं पड़ती। वास्तव में जरूरत इसलिए नहीं पड़ती कि उन्हें हिन्दी समाज के व्याकरण का पता ही नहीं। कह सकते हैं जिस फिल्मकार को हिन्दी भाषा की समझ ही नहीं हो, उसे हिन्दी समाज की समझ क्या होगी? लेकिन अपनी वाचालता से अज्ञानता छिपाते हुए वे इस मामले में करण जोहर और यश चोपड़ा की पारिवारिक फिल्मों का मजाक उड़ाने से भी हीं चुकते। निश्चित रूप से करण जोहर और चोपड़ा के यहां जो परिवार दिखता है हिन्दी समाज उससे भी रिलेट नहीं करता। लेकिन उसकी संवेदना जरूर महसूस करता है।
         राम गोपाल वर्मा के लिए इस संवेदना का कोइ अर्थ नहीं। इसीलिए जिस समाज में यह मान्यता आम हो कि मातृत्व के साथ महिलाओं का लावण्य बढ़ जाता है, वहां वे नि:संकोच टिव्ट करते हैं, खुबसूरत महिलाओं का मां बनना उन्हें पसंद नहीं                                                        सारा देश या कहें                                                 
सिनेमा से किसी किसी रूप में जुड़े एक छोटी सी दुनियां अमिताभ बच्चन के दादा बनने की खबर से खुश थी। तब वर्मा का यह कहना उनके मानसिक असंतुलन से बढ़कर और कुछ नहीं दर्शाता। आखिर कोर्इ व्यक्ति इतना निष्ठुर कैसे हो सकता है कि किसी के मां बनने पर वह यह प्रतिक्रिया दे कि उनका मां बनना उसे पसंद नहीं। ऐश्वर्या राय विश्व सुन्दरी रही हैं, खुबसूरत हैं इसमें क्या उनका अपराध माना जा सकता है कि उन्हें मां बनने के सूख से वंचित रखा जाय। यूं भी भारतीय समाज की यह मोटी समझ है कि नारी जीवन की सार्थकता उसके मातृत्व में है। इस परम्परागत मान्यता से आज की क्रांतिकारी नारीवादी समहत भी हों, फिर भी यह स्वीकार करने में तो शायद ही किसी को आपंति हो सकती है कि मातृत्व सौंदर्य की राह में रोड़ा बनती है। बीते वर्ष के सबसे बड़े हिट मुन्नी बदनाम हुर्इ की मलाइका अरोड़ा खान से लेकर बुड्ढ़ा होगा तेरा बाप की चंडीगढ की कुड़ी रविना टंडन तक वर्मा की मानसिक विकृति का अपने आप में मोकम्मल जवाब है। वास्तव में खुबसूरती को यदि हम सिर्फ देखकर सराहना चाहते हैं तो उसके मातृत्व से भला किसे और क्यों आपति हो सकती है। फराह खान  एक साथ तीन बच्चों की मां बनी, क्या फर्क पड़ गया उनकी खुबसूरती पर या उनकी कार्य क्षमता पर।
         वास्तव में वर्मा की यह आपति उनकी इस विकृत समझ का प्रतीक है कि महिलायें सिर्फ और सिर्फ इस्तेमाल के लिए होती हैं। उन्हें सिर्फ पुरूषों के इस्तेमाल के लिए सुरक्षित रहना चाहिए। उन्हें महिलाओं के सौंदर्य से कोइ सरोकार नहीं सरोकार है सुन्दर शरीर से। नायिकाओं के लिए सुन्दरता उनकी प्रतिभा का ही एक हिस्सा है, उनकी सुन्दरता को उनके काम से अलग कर देखा ही नहीं जा सकता। आम दर्शकों के लिए नायिकाओं की सुन्दरता उसके अभिनय के साथ जुड़ी होती है। उसे नायिकाओं के मातृत्व से फर्क नहीं पड़ता।
         हिन्दी सिनेमा की नायिकाओं का भी अपने दर्शकों पर ये विश्वास है इसीलिए रविना टंडन लम्बे गैप और दो बच्चों के मातृत्व के बाद आइटम सॉग के साथ वापसी करती हैं। काजोल मातृत्व की छुट्टियों के बाद जब भी अवसर मिलता है परदे पर आने में संकोच नहीं करती। वास्तव में दर्शकों को परदे पर दिख रहे पात्र की सुन्दरता चाहिए, वह यदि सही है तो फिर उसके लिए मातृत्व कोर्इ सवाल नहीं बनता।
         राम गोपाल वर्मा जब यह कहते हैं कि खुबसूरत लड़कियों का मां बनना उन्हें पसंद नहीं तो सीधा सवाल मन में उठता है वर्मा उन महिलाओं की बदसुरती भी निर्धारित करें जिन्हें मां बनना चाहिए। सवाल यह भी है क्या राम गोपाल वर्मा अपनी मां को भी बदसूरत ही मानते हैं, और बहन को, और बुआ को,..... जाने दें एक विक्षिप्त समझ वाले व्यक्ति से जवाब की उम्मीद ही क्या रखी जा सकती है

1 टिप्पणी:

  1. ये तो जाहिर सी बात है...की रामू जो एक ज़माने में नई पीढ़ी के फिल्मकारों कुछ नया करने वालों का हीरो थे ..लेकिन आज वे खुद क्या हैं उन्हें खुद नहीं पता... कोई माँ बने या ना बने ये उसका व्यक्तिगत फैसला है और इसे कोई रामू या कोई सम्ज्विद नहीं तय करेगा...लेकिन हैरानी होती है और साथ ही निरासा भी गर रामू सत्य और रंगीला वाले रामू अब भी होते तो..कितनी बेहतरीन फ़िल्में हमें देखने को मिल सकती थी...

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