यदि बिहार के आरा से आप परिचित होंगे,तो धरमन चौक से भी परिचित होंगे।ये नामकरण आज भी यथावत ससम्मान स्वीकार्य हैं,जो ऐसी तवायफ के नाम पर रखे गए थे,जिनके उल्लेख के बगैर 1857 का इतिहास पूरा नहीं हो सकता।कहते हैं धरमन बाई हर युद्ध में कुंवर सिंह के साथ रहीं।वे तोप चलाने में पारंगत थी। अंग्रेजों के साथ युद्ध करते हुए ही वे वीरगति को प्राप्त हुईं। लेकिन ओटीटी के लिए संजय लीला भंसाली जैसे फिल्मकार जब आजादी के संघर्ष में तवायफों के योगदान की कहानियां ढूंढते हैं तो उन्हें सीमापार लाहौर के किस्से सुनाई दे जाते हैं,बिहार का इतिहास नहीं दिखता। यह कोई नई बात नहीं, बिहार का नहीं दिखना हिंदी सिनेमा के स्वभाव में रहा है,जिसका विस्तार अब ओटीटी में भी दिखने लगा है। देश के लिए धरमन बाई का संघर्ष और बलिदान चाहे जितना भी महत्वपूर्ण रहा हो,इन्हें संतोष लाहौर की ‘हीरामंडी’ में ही मिलता है,जहां मल्लिकाजान और बिब्बोजान की नकली कहानियां सजायी जा सकें।शायद इन्हें लगता बिहार पहुंच कर इनकी भव्य कहानियां डी क्लास हो जायेंगी।
हाल ही
में अपनी सहज ग्रामीण कथ्य को लेकर लोकप्रिय वेबसीरिज ‘दुपहिया’ बिहार के एक कल्पित गांव धडकपुर की कहानी कहती है।यह ऐसा बिहार है जहां
लडकियां आत्मनिर्भर बनने की होड कर रही है।वह गांव के लोगों को वैश्विक चुनौती के
लिए तैयार कर रही है।किंचित शायद बडे छोटे किसी भी तरह के परदे पर बिहार का कोई
ऐसा गांव पहली बार फिल्माया गया होगा,जो बोते अपराध मुक्त होने के पचीस वर्ष पूरे
कर चुका हो,जहां थाना हो,लेकिन एफआईआर खबर बनती हो।यह ऐसा बिहार है जहां लडकी को
छेडने वाला नहीं,उसके साथ खडा होने वाला दोस्त हो।यहां प्रेम है,रिश्ते
हैं,रिश्तों की खटाश है,रिश्तों का सम्मान है।यह वह बिहार है जहां बेटी की शादी के
लिए पूरा गांव खडा हो जाता है।यह अलग बात है कि यहां बिहार होते हुए भी बिहार नहीं
दिखता,लेकिन यह भी सच है कि अच्छाइयों की यह कथा बिहार में डीक्लास नहीं
होती,बल्कि कथा को एक स्वभाविक जमीन देती है। बाद में क्या हो,पता नहीं,लेकिन
दूपहिया के पहले परदे पर बिहार का मतलब “मारदेब गोली कपार
में,आइए न हमरा बिहार…” में ही होता था।
यह भी आश्चर्य कि ‘दूपहिया’ के निर्माण से
लेकर अभिनय तक में कोई भी महत्वूर्ण नाम बिहार से नहीं होता,और आश्चर्य यह भी कि ओटीटी की दशा और दिशा
दोनों बदल देने वाली वेबसीरिज ‘पंचायत’ के लेखक से लेकर अधिकांश
अभिनेता तक बिहार से होते हैं,लेकिन कहानी फुलेरा चली जाती है,जिसे उत्तर प्रदेश
के बलिया जिले में बताया जाता है।यह बिहार का बक्सर होता तो क्या फर्क पडता?
वास्तव में दृश्य माध्यमों में कई दशकों से बिहार की जो
छवि गढी जाती रही है,उसमें फुलेरा जैसे अविकसित गांव की तो कल्पना की जा सकती
है,लेकिन एक ऐसे समाज को परिकल्पित नहीं किया जा सकता,जहां प्रह्लाद चा जैसे
निस्वार्थ नेक दिल लोग रहते हैं,जो 50 लाख रुपए हथेली पर लिए घूम रहे कि कोई इसे
नेक काम में लगा दो।जहां अपनी बूढी दादी को नजरों से दूर नहीं होने देने वाला
जगमोहन रहता हो,जहां अपने पालतू कबूतर के लिए विधायक से भी लड जाने वाला बम बहादुर
हो। यह अजीब विडंबना है कि बिहार में एक सहज सरल ईमानदार प्रेमिल समाज की
परिकल्पना पहले सिनेमा नहीं कर पा रही थी, ‘दूपहिया’ जैसे अपवाद को छोड दें तो अब ओटीटी भी नहीं
कर पा रही है।यहां ऐसे प्रधान के बारे में सोचा ही नहीं जा सकता जो अपने अधबने घर
की दीवारों पर खुद से पानी सींच रहा हो,जिसके दरवाजे पर एक कार तक नहीं हो। हां,
भीमा भारती,चंदन महतो या साहेब हारुन शाह अली बेग को दिखाना हो तो बिहार की
पृष्ठभूमि परफेक्ट है।
‘महारानी’ के तीन सीरीज आ
चुके हैं।कह सकते हैं बिहार पर केंद्रित सबसे लोकप्रिय सीरीज रही है यह।‘महारानी’ बिहार की
राजनीति के उस कालखंड को चित्रित करती है,जिसे बिहार का सबसे बुरा दौर माना जा
सकता है, आज भी बिहार जिसकी प्रेतछाया से मुक्त नहीं हो सका है।भीमा भारती,रानी
भारती,नवीन कुमार,गौरी शंकर पांडेय और राज्यपाल गोवर्धन दास के आस पास कहानी घूमती
है। भ्रष्टाचार,हत्या,बलात्कार,जातीय संघर्ष,सत्ता की राजनीति विभत्स रुप में यहां
दिखती है।बिहार को ओटीटी किस तरह से देखती है,यह इससे भी समझ सकते हैं कि तीन सीजन
में पसरे इस सीरीज में एक भी ऐसा जनप्रतिनिधि दिखाने की जरुरत नहीं समझी जाती,जिसे
देख लोकतंत्र के प्रति,बिहार की राजनीतिक चेतना के प्रति सम्मान हो,सब के सब बेईमान
अपराधी,कोई नकली शराब की फेक्ट्री चला रहा तो,कोई औरतों का शौकीन। कभी होगा बिहार
में जंगल राज,लेकिन बिहार का यह आखिरी सत्य नहीं,बिहार इसके अलावे भी है।लेकिन
सिनेमा ने उसे बिहार की पहचान के साथ चस्पां कर देने की कोशिश की,यही कोशिश अब
ओटीटी पर भी हो रही है।
शायद इसीलिए 20 साल से अधिक बीत जाने के बावजूद ओटीटी बिहार
के उसी दौर में कहानियां खंगाल रही है।‘रंगबाज-डर की राजनीति’ में एक एक
पात्र,एक एक घटना को आप पहचान सकते हैं। मुख्यपात्र कहने को साहेब हारुन शाह अली बेग
हैं,लेकिन सीरीज यह समझाने में कहीं कोई कसर नहीं छोडती कि वह किसकी कहानी कह रही
है।होगा कोई शहर जहां किसी अपराधी की तूती बोलती होगी,जिसने सरेआम तेजाब से नहला
कर दो भाइयों की हत्या कर दी हो।एक पत्रकार को मार डाला हो।लेकिन यह भी सच है कि
बिहार ही नहीं,किसी शहर की पहचान इतने भर ही तो नहीं होती।लेकिन ओटीटी इसी पर फोकस
कर रही कि बाहर को जंगल राज के पीरिएड से निकलने ही नहीं दिया जाय।
‘खाकी-द बिहार चैप्टर’ भी उसी दौर की कहानी कहती है। हालांकि इन्हें कहानी कहा भी नहीं जा सकता
क्योंकि सभी सत्य घटनाओं पर आधारित हैं।मतलब ओटीटी ऐसा कोई भ्रम नहीं छोडती कि आप
इन कहानियों को बिहार का सच मान कर नहीं देखें।‘खाकी’ पुलिस अधिकारी अमित लोढा की किताब पर आधारित
है,अमित अभी भी पुलिस सेवा में हैं।एक ड्राइवर से कुख्यात अपराधी और कई नरसंहारों
के साथ जेलब्रेक जैसी घटना के सूत्रधार चंदन महतो यहां मुख्य पात्र के रुप में
दिखता है।लेकिन आश्चर्य होता कि जब अमित अपनी पहचान नहीं छुपाते फिर चंदन की पहचान
क्यों छुपा रहे,जबकि सभी दर्शक उसे पहचान रहे।यह सिर्फ अपराधी और पुलिस के टकराव
की कहानी होती तो उतनी चिंता नहीं होती,जिस तरह एक अपराधी के लिए पूरी सत्ता,पूरा
पुलिस महकमा लगा होता है,यह बिहार को अपनी पहचान से उबरने नहीं देता।
आश्चर्य नहीं कि कोई ओटीटी ‘गुल्लक’ लेकर बिहार नहीं
आती। ‘दूपहिया’ आती भी है,तो
बगैर बिहार आए, बिहार की कथा सुना जाती।लोगों को गलत नहीं
लगता कि सामान्य लोग यहां रहते ही नहीं,जो रहते हैं,या तो बाहुबली अपराधी,उनके
सहयोगी या फिर उनके सताए।‘अपहरण’,’गंगाजल’ जैसी फिल्मों ने
बिहार की जो छवि निर्मित की थी,आज ओटीटी
उसे थोडी और जीवंतता के साथ,थोडी और विश्वसनीयता के साथ मजबूत कर रही
है।बिहार की पृष्ठभूमि पर निर्मित खाकी,रंगबाज या महारानी जैसे वेब सीरिज के माध्यम से किसी स्थान,किसी शहर को जानने समझने
की कोशिश करे तो उसकी मूल पहचान की जगह कोई और ही सूरत दिखाई देती है। सीवान हो या
शेखपुरा एक सामान्य शहर ही है,जहां कामकाजी मेहनतकश लोग भी
रहते हैं,लडकियां कालेज भी जाती हैं,महिलाएं
बाजार भी जाते हैं,बच्चे पार्कों में खेलने भी जाते
हैं।लेकिन अधिकांश वेबसीरिज में जो बिहार इंगित कर दिखाए जाते हैं,लगता है वहां कोई सामान्य जनजीवन ही नहीं।
वास्तव
में बिहार ने एक लंबा सफर तय किया है।राजनीति बदली है,शहर बदला है,गांव बदले
हैं,तो लोग समाज भी बदला है।मुश्किल कि बिहार से गए फिल्मकार और लेखक भी इस बदलाव
को रेखांकित करने की जरुरत नहीं महसूस कर रहे।