रविवार, 23 मार्च 2025

ओटीटी से झांकता बिहार

 



यदि बिहार के आरा से आप परिचित होंगे,तो धरमन चौक से भी परिचित होंगे।ये नामकरण आज भी यथावत ससम्मान स्वीकार्य हैं,जो ऐसी तवायफ के नाम पर रखे गए थे,जिनके उल्लेख के बगैर 1857 का इतिहास पूरा नहीं हो सकता।कहते हैं धरमन बाई हर युद्ध में कुंवर सिंह के साथ रहीं।वे तोप चलाने में पारंगत थी। अंग्रेजों के साथ युद्ध करते हुए ही वे वीरगति को प्राप्त हुईं। लेकिन ओटीटी के लिए संजय लीला भंसाली जैसे फिल्मकार जब आजादी के संघर्ष में तवायफों के योगदान की कहानियां ढूंढते हैं तो उन्हें सीमापार लाहौर के किस्से सुनाई दे जाते हैं,बिहार का इतिहास नहीं दिखता। यह कोई नई बात नहीं, बिहार का नहीं दिखना हिंदी सिनेमा के स्वभाव में रहा है,जिसका विस्तार अब ओटीटी में भी दिखने लगा है। देश के लिए धरमन बाई का संघर्ष और बलिदान चाहे जितना भी महत्वपूर्ण रहा हो,इन्हें संतोष लाहौर की हीरामंडी में ही मिलता है,जहां मल्लिकाजान और बिब्बोजान की नकली कहानियां सजायी जा सकें।शायद इन्हें लगता बिहार पहुंच कर इनकी भव्य कहानियां डी क्लास हो जायेंगी।

हाल ही में अपनी सहज ग्रामीण कथ्य को लेकर लोकप्रिय वेबसीरिज दुपहिया बिहार के एक कल्पित गांव धडकपुर की कहानी कहती है।यह ऐसा बिहार है जहां लडकियां आत्मनिर्भर बनने की होड कर रही है।वह गांव के लोगों को वैश्विक चुनौती के लिए तैयार कर रही है।किंचित शायद बडे छोटे किसी भी तरह के परदे पर बिहार का कोई ऐसा गांव पहली बार फिल्माया गया होगा,जो बोते अपराध मुक्त होने के पचीस वर्ष पूरे कर चुका हो,जहां थाना हो,लेकिन एफआईआर खबर बनती हो।यह ऐसा बिहार है जहां लडकी को छेडने वाला नहीं,उसके साथ खडा होने वाला दोस्त हो।यहां प्रेम है,रिश्ते हैं,रिश्तों की खटाश है,रिश्तों का सम्मान है।यह वह बिहार है जहां बेटी की शादी के लिए पूरा गांव खडा हो जाता है।यह अलग बात है कि यहां बिहार होते हुए भी बिहार नहीं दिखता,लेकिन यह भी सच है कि अच्छाइयों की यह कथा बिहार में डीक्लास नहीं होती,बल्कि कथा को एक स्वभाविक जमीन देती है। बाद में क्या हो,पता नहीं,लेकिन दूपहिया के पहले परदे पर बिहार का मतलब मारदेब गोली कपार में,आइए न हमरा बिहार…” में ही होता था।  

यह भी आश्चर्य कि दूपहिया के निर्माण से लेकर अभिनय तक में कोई भी महत्वूर्ण नाम बिहार से नहीं होता,और आश्चर्य यह भी कि ओटीटी की दशा और दिशा दोनों बदल देने वाली वेबसीरिज पंचायत के लेखक से लेकर अधिकांश अभिनेता तक बिहार से होते हैं,लेकिन कहानी फुलेरा चली जाती है,जिसे उत्तर प्रदेश के बलिया जिले में बताया जाता है।यह बिहार का बक्सर होता तो क्या फर्क पडता? वास्तव में दृश्य माध्यमों में कई दशकों से बिहार की जो छवि गढी जाती रही है,उसमें फुलेरा जैसे अविकसित गांव की तो कल्पना की जा सकती है,लेकिन एक ऐसे समाज को परिकल्पित नहीं किया जा सकता,जहां प्रह्लाद चा जैसे निस्वार्थ नेक दिल लोग रहते हैं,जो 50 लाख रुपए हथेली पर लिए घूम रहे कि कोई इसे नेक काम में लगा दो।जहां अपनी बूढी दादी को नजरों से दूर नहीं होने देने वाला जगमोहन रहता हो,जहां अपने पालतू कबूतर के लिए विधायक से भी लड जाने वाला बम बहादुर हो। यह अजीब विडंबना है कि बिहार में एक सहज सरल ईमानदार प्रेमिल समाज की परिकल्पना पहले सिनेमा नहीं कर पा रही थी, दूपहिया जैसे अपवाद को छोड दें तो अब ओटीटी भी नहीं कर पा रही है।यहां ऐसे प्रधान के बारे में सोचा ही नहीं जा सकता जो अपने अधबने घर की दीवारों पर खुद से पानी सींच रहा हो,जिसके दरवाजे पर एक कार तक नहीं हो। हां, भीमा भारती,चंदन महतो या साहेब हारुन शाह अली बेग को दिखाना हो तो बिहार की पृष्ठभूमि परफेक्ट है।

महारानी के तीन सीरीज आ चुके हैं।कह सकते हैं बिहार पर केंद्रित सबसे लोकप्रिय सीरीज रही है यह।महारानी बिहार की राजनीति के उस कालखंड को चित्रित करती है,जिसे बिहार का सबसे बुरा दौर माना जा सकता है, आज भी बिहार जिसकी प्रेतछाया से मुक्त नहीं हो सका है।भीमा भारती,रानी भारती,नवीन कुमार,गौरी शंकर पांडेय और राज्यपाल गोवर्धन दास के आस पास कहानी घूमती है। भ्रष्टाचार,हत्या,बलात्कार,जातीय संघर्ष,सत्ता की राजनीति विभत्स रुप में यहां दिखती है।बिहार को ओटीटी किस तरह से देखती है,यह इससे भी समझ सकते हैं कि तीन सीजन में पसरे इस सीरीज में एक भी ऐसा जनप्रतिनिधि दिखाने की जरुरत नहीं समझी जाती,जिसे देख लोकतंत्र के प्रति,बिहार की राजनीतिक चेतना के प्रति सम्मान हो,सब के सब बेईमान अपराधी,कोई नकली शराब की फेक्ट्री चला रहा तो,कोई औरतों का शौकीन। कभी होगा बिहार में जंगल राज,लेकिन बिहार का यह आखिरी सत्य नहीं,बिहार इसके अलावे भी है।लेकिन सिनेमा ने उसे बिहार की पहचान के साथ चस्पां कर देने की कोशिश की,यही कोशिश अब ओटीटी पर भी हो रही है।

शायद इसीलिए 20 साल से अधिक बीत जाने के बावजूद ओटीटी बिहार के उसी दौर में कहानियां खंगाल रही है।रंगबाज-डर की राजनीति में एक एक पात्र,एक एक घटना को आप पहचान सकते हैं। मुख्यपात्र कहने को साहेब हारुन शाह अली बेग हैं,लेकिन सीरीज यह समझाने में कहीं कोई कसर नहीं छोडती कि वह किसकी कहानी कह रही है।होगा कोई शहर जहां किसी अपराधी की तूती बोलती होगी,जिसने सरेआम तेजाब से नहला कर दो भाइयों की हत्या कर दी हो।एक पत्रकार को मार डाला हो।लेकिन यह भी सच है कि बिहार ही नहीं,किसी शहर की पहचान इतने भर ही तो नहीं होती।लेकिन ओटीटी इसी पर फोकस कर रही कि बाहर को जंगल राज के पीरिएड से निकलने ही नहीं दिया जाय।

खाकी-द बिहार चैप्टर भी उसी दौर की कहानी कहती है। हालांकि इन्हें कहानी कहा भी नहीं जा सकता क्योंकि सभी सत्य घटनाओं पर आधारित हैं।मतलब ओटीटी ऐसा कोई भ्रम नहीं छोडती कि आप इन कहानियों को बिहार का सच मान कर नहीं देखें।खाकी पुलिस अधिकारी अमित लोढा की किताब पर आधारित है,अमित अभी भी पुलिस सेवा में हैं।एक ड्राइवर से कुख्यात अपराधी और कई नरसंहारों के साथ जेलब्रेक जैसी घटना के सूत्रधार चंदन महतो यहां मुख्य पात्र के रुप में दिखता है।लेकिन आश्चर्य होता कि जब अमित अपनी पहचान नहीं छुपाते फिर चंदन की पहचान क्यों छुपा रहे,जबकि सभी दर्शक उसे पहचान रहे।यह सिर्फ अपराधी और पुलिस के टकराव की कहानी होती तो उतनी चिंता नहीं होती,जिस तरह एक अपराधी के लिए पूरी सत्ता,पूरा पुलिस महकमा लगा होता है,यह बिहार को अपनी पहचान से उबरने नहीं देता।

 आश्चर्य नहीं कि कोई ओटीटी गुल्लक लेकर बिहार नहीं आती। दूपहिया आती भी है,तो बगैर बिहार आए, बिहार की कथा सुना जाती।लोगों को गलत नहीं लगता कि सामान्य लोग यहां रहते ही नहीं,जो रहते हैं,या तो बाहुबली अपराधी,उनके सहयोगी या फिर उनके सताए।अपहरण,गंगाजल जैसी फिल्मों ने बिहार की जो छवि निर्मित की थी,आज ओटीटी  उसे थोडी और जीवंतता के साथ,थोडी और विश्वसनीयता के साथ मजबूत कर रही है।बिहार की पृष्ठभूमि पर निर्मित खाकी,रंगबाज या महारानी जैसे वेब सीरिज के माध्यम से किसी स्थान,किसी शहर को जानने समझने की कोशिश करे तो उसकी मूल पहचान की जगह कोई और ही सूरत दिखाई देती है। सीवान हो या शेखपुरा एक सामान्य शहर ही है,जहां कामकाजी मेहनतकश लोग भी रहते हैं,लडकियां कालेज भी जाती हैं,महिलाएं बाजार भी जाते हैं,बच्चे पार्कों में खेलने भी जाते हैं।लेकिन अधिकांश वेबसीरिज में जो बिहार इंगित कर दिखाए जाते हैं,लगता है वहां कोई सामान्य जनजीवन ही नहीं।

वास्तव में बिहार ने एक लंबा सफर तय किया है।राजनीति बदली है,शहर बदला है,गांव बदले हैं,तो लोग समाज भी बदला है।मुश्किल कि बिहार से गए फिल्मकार और लेखक भी इस बदलाव को रेखांकित करने की जरुरत नहीं महसूस कर रहे।

शुक्रवार, 12 जुलाई 2024

नई न्याय संहिता की उलझनों में घिरा ओटीटी और सिनेमा





 माकांत पंडित को आप भले ही नहीं जानते हों,उनके बेटे गुड्डू भैया को तो जानते ही होंगे,वही मिर्जापुर वाले। गुड्डू भैया को फर्जी एनकाउंटर से बचाने की कोशिश में वे एक पुलिस अधिकारी को गोली मार देते हैं,और अपराध भी कबूल कर लेते हैं।अब कोर्ट में मुकदमा शुरु होता है,सरकारी वकील और रमाकंत पंडित के बीच जिरह शुरु होती है कि आइ पी सी की धारा 302 के तहत उन्हें कडी से कडी दी जा सकी है,या नहीं।अब इसके लेखकों को क्या पता था कि इसके रिलीज होने के दो दिन पहले देश में आई पी सी और उसकी धाराएं ही खत्म हो जाएंगी और उसके स्थान पर नई धाराओं के साथ भारतीय न्याय संहिता की शुरुआत हो जाएगी।  वैसे यह तय तो काफी पहले हो गया था,लेकिन लेखकों को शायद लगा होगा,अभी दर्शकों को नई धाराओं से रिलेट करने में कठिनाई होगी,इसीलिए 302 ही सही होगा। वास्तव में आइ पी सी 302 क स्थानापन्न बी एन एस 103 को स्वीकार करने में अभी जितनी असुविधा होगी,उससे कहीं अधिक असुविधा तब होगी जब कुछ अंतराल के बाद हम आइ पी सी को पूरी तरह भूल चुके होंगें।कुछेक सालों के बाद जब नए दर्शक यही सीरिज देखेंगे,तो उन्हें वाकई समझने में कठिनाई होगी कि वकील साहब हत्या के लिए 302 का मुकदमा क्यों चला रहे हैं।

वाकई मिर्जापुर कोई एक तो नहीं,हिंदी सिनेमा ने तो अपने जन्म के साथ ही आइ पी सी की धाराएं ही पढी,और जरुरत पडने पर अपने दर्शकों को उन्हें अच्छी तरह रटवा भी दिया।यदि 302 और 420 जैसी धाराएं मुहावरे की तरह आमलोगों की जबान पर चढी हैं तो उसमें सिनेमा का योगदान कम नहीं माना जा सकता। कोर्टरुम ड्रामा हिंदी सिनेमा का प्रिय जोनर रहा है,1960 में बनी बी आर चोपडा की कानून से लेकर पिंक और फिर ओएमजी2 तक। ताजिरात ए हिंद के दफा... का मतलब भले ही हम नहीं समझते हों,लेकिन हिंदी सिनेमा का शायद ही कोई दर्शको हो,जिसे धारा और सजा सहित पूरा वाक्य याद न हो।कानून जैसी फिल्मों के तो केन्द्र में ही धारा 302 है,अब जब नए दर्शक इस फिल्म को देखेंगे,तो किस तरह सारी बहस को समझ पाएंगे।आज महसूस न भी करें,आने वाले समय में जैसे जैसे आई पी सी धाराएं विस्मृति में चली जांएगी,सैकडों नहीं,हजारों फिल्मों को अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने की चुनौती का सामना करना होगा।

चार सौ बीसी हमारे स्वभाव में हो न हो,हिंदी मुहावरे में तो शामिल है।मामूली झूठा बहाने बनाने वाले को भी हम कहते है,चारसौबीसी नहीं करो,और वह समझ जाता है।अब कहना पडेगा 318 नहीं करो।भारतीय न्याय संहिता में धोखाधडी के लिए अब यही धारा निर्धारित की गई है।अब हिंदी में तो कम से कम दर्जन भर फिल्में होंगी जिसके टाइटिल में ही 420 है,राजकपूर की श्री420 से लेकर कमल हासन की चाची 420 और फिर अक्षय कुमार की खिलाडी 420 तक।यह कोई स्लेट पर लिखी ईबारत तो नहीं कि मिटा कर बदल दिया जाय। लेकिन यह तो तय है कि अब जिस तरह नई पीढी चेन्नई और मुंबई के साथ ही अधिक सहज हो गई है,420 सुनना उसके लिए किसी अजूबे से कम नहीं होगा,शायद तब तक 318 उसके मुहावरे में शामिल हो चुका होगा।ऐसे में इस तरह की कई कालजयी फिल्मों का अप्रासंगिक होना वाकई चिंतित कर सकता है। टाइटिल की ही बात करें तो 2019 में बनी अक्षय खन्ना और हुमा कुरेशी अभिनीत सेक्शन 375 को सेक्शन 63 के रुप में आना होगा,क्योंकि बलात्कार के लिए भारतीय न्याय संहिता में धारा 63 निर्धारित की गई है।

आई पी सी में 511 धाराएं थी,अब बी एन एस में 356 बच रही हैं,कुछ बदल दी गई,कुछ हटा दी गई,कुछ जोडी भी गई।जाहिर है अपराध और कानून के आस पास विचरते हिंदी सिनेमा को अब अपने को भारतीय न्याय संहिता की जानकारियों से लैस होना होगा।आप मुल्क,थप्पड या पिंक जैसी गंभीर फिल्म बना रहे हों,या सामान्य अपराध कथा,अब दर्शक उम्मीद करेंगे कि सिनेमा उन्हें अपने नए कानूनों से ही जोडने की कोशिश करेगी।लेकिन यह सवाल वहीं है कि कानून और श्री 420 जैसी फिल्मों का क्या? क्या इन्हें भारतीय न्याय संहिता की धाराओं के साथ संशोधित किया जाएगा? वास्तव में कोई भी कला अपने समय के साथ संवाद करती है।पथेर पंचाली या गोदान की वास्तविकता हम आज के भारत में नहीं ढूंढ सकते,बावजूद इसके उन्हें हम कालजयी कृतियां मानते हैं,इसलिए कि हम उन कृतियों से उस समय के भारत को जानने की कोशिश करते हैं। इस तरह की फिल्मों को भी पीरिएड फिल्म की तरह देखा जाएगा तो शायद नए दर्शक रिलेट कर पाएंगे।सेक्शन 375 या पिंक जैसी अपेक्षाकृत नई फिल्मों में सीन के साथ डिस्क्लेमर का भी सहारा लिया जा सकता है।

बदलाव कैसा भी हो,छोटा या बडा,उसे स्वीकार करना आसान तो होता नहीं।किसे उम्मीद थी कि मोगलसराय को हम पं. दीनदयाल उपाध्याय नगर कहने लगेंग,लेकिन कहने लगे।सिनेमा को भी बदलाव के लिए कोशिश तो करनी होगी,तभी उनकी कालजीयता कायम रह सकेगी। 

शुक्रवार, 7 जून 2024

एक जो है कंगना

 


हिंदी सिनेमा के अभिनेता या अभिनेत्रियों में कंगना ऐसी अकेली होगी,जिसके चुनाव नहीं लडने पर लोग आश्चर्य करते।आमतौर पर चुनावों में सितारों के नाम की घोषणा अचानक ही होती है।आश्चर्य नहीं कि चुनाव में उतरने के पहले और बाद भी उनकी राजनीतिक सक्रियता आमतौर पर नहीं देखी जाती।कंगना की राजनीतिक सक्रियता हमेशा सुर्खियों में है,चाहे वह इंडस्ट्री का मामला हो,या फिर देश समाज का।कंगना चुप नहीं रहती। कुछेक साल पहले करण जौहर के एक इंटरव्यू से शुरु हुए नेपोटिज्म के विवाद ने इंडस्ट्री को कठघरे में खडा कर दिया,और अपनी झेंप मिटाने इंडस्ट्री कंगना पर फूहड आक्रमण में एकजुट हो गई,जिसका पुरजोर मुकाबला कंगना लगातार करती रही। 

जब पूरी इंडस्ट्री सुशांत सिंह राजपूत की मौत पर गुम साधे पडी थी, कंगना ने एक बार फिर कमान संभाली और उसकी मौत को नेपोटिज्म से जोडते हुए मुंबई पुलिस के इन्वीटिगेशन पर सवाल उठाए। मामला राममंदिर का हो,या कश्मीरी ब्राह्मणों का कंगना अपनी ईमानदार राय देने से कभी नहीं चूकती। व्यवसायिक चुप्पी उसके स्वभाव में ही नहीं थी।  हिमाचल प्रदेश के ठंढे वातावरण में जन्मी कंगना की पढाई पहले चंडीगढ और फिर दिल्ली में हुई।दिल्ली में ही अरविंद गौड के साथ उसने थिएटर सीखा,और थिएटर की छोटी सी लेकिन मजबूत विरासत लेकर अपने दृढ इरादे के साथ मुबई आ गई।पहली फिल्म मिली गैंगस्टर, और यहीं साथ मिला महेश भट्ट् का। इस फिल्म में कई ऐसे दृश्य थे जिसे निभाना सहज नहीं हो सकता था,लेकिन कंगना ने बेहिचक उन दृश्यों को अभिनीत किया। कहते हैं पहले ‘गैंगस्टर’ के आडीशन में कम उम्र कह कर इसे मना कर दिया गया था,बाद में बुला कर एक अपराधी की प्रेमिका की भूमिका इसे मिली।2006 में इस फिल्म को अबू सलेम की जिंदगी से प्रेरित के रुप में प्रचारित किया गया था।इसी साल कंगना को ‘वो लम्हें’ मिली,जो परवीन बाबी और महेश भट्ट् के जीवन से प्रेरित बताई जा रही थी।कंगना अपने काम के प्रति कितनी ईमानदार थी,और किस साहस और जीवट के साथ  अपनी भूमिका को उतारने की कोशिश की इसकी गवाह आज भी ये फिल्में हैं। आश्चर्य नहीं कि ‘वंस अपान ए टाइम’ इन मुंबई से लेकर ‘फैशन’ और ‘लाइफ इन ए मेट्रो’ तक कंगना एक खास तरह की फिल्मों की पसंद बनी रही।

‘तनु वेड्स मनु’ के बाद हिंदी सिनेमा को एक नई कंगना मिली, ‘गैंगस्टर’ और ‘फैशन’ के डार्क कैरेक्टर से मुक्त। यह वो चरित्र था, जो जीने का संदेश लेकर आ रहा था।जिसके पास जीने की जिद थी,और लडने का आत्मविश्वास। शायद ‘तनु वेड्स मनु’ में कंगना को अपने को जीने का अहसास हुआ होगा,फिर उसने पलट कर नहीं देखा,हाल ही में आयी ‘तेजस’,या फिर ‘पंगा’ ,जिसमें उसने एक ऐसे कबड्डी खिलाडी की भूमिका निभाई जो अपने बटे की जिद पर ग्राउंड पर दोबारा उतरती है और अपनी पहचान कायम करती है।‘क्वीन’ तो महिला सशक्तीकरण की प्रतीक फिल्म के रुप में हिंदी में देखी जाती रहेगी। यहां कंगना अपने अकेलेपन के साथ नहीं,परिवार,दोस्त और समाज के साथ दिखती थी। 

‘क्वीन’ के बाद जब हिंदी सिनेमा की अभिनेत्रियो की नई पहचान बन कर कंगना उभर रही थी, उसने अभिनय से ब्रेक लेकर पटकथा लेखन की पढाई करने न्यूयार्क फिल्म एकेडमी ज्वाइन करने का निर्णय ले लिया। जो लोग आज कंगना की शिक्षा पर सवाल उठा रहे हैं, उन्हें अहसास नहीं कि सिनेमा में लोकप्रियता के शिखर पर रहते हुए पढाई के लिए ब्रेक लेने का निर्णय कोई सामान्य अभिनेता नहीं ले सकता,उसके लिए कंगना होना चाहिए।14 वर्षों में 3 नेशनल अवार्ड और पद्मश्री पाने के लिए किसी अभिनेता को कितने जन्मों से गुजरना पडता है,यह समझने की जरुरत है।

कंगना के साथ मुश्किल यह है कि वह जितनी ईमानदार अपने चरित्र के प्रति रहती है,उतनी ही वास्तविक जीवन में भी। आप सहमत हों,असहमत हों,इससे इन्कार नही कर सकते कि कंगना परदे पर भी निर्भीक दिखती है, और परदे के बाहर भी। निर्भीकता कंगना के स्वभाव में है,आज के समय में यह दुर्लभ निर्भीकता सीखने की चीज है। 

 

रविवार, 21 अप्रैल 2024

हिंदी सिनेमा की लोकतंत्र की कच्ची समझ

 


दो किस्म के नेता होते हैं

इक देता है इक पाता है

एक देश को लूट के खाता है

इक देश पे जान लुटाता है

राम न करे मेरे देश को

कभी भी ऐसा नेता मिले

जो आप भी डूबे देश भी डूबे

जनता को भी ले डूबे...

 

अंतरा भले ही याद न हो,1970 में रिलीज मनोज कुमार की फिल्म यादगार के इस गाने के बोल अवश्य आपको याद होंगे,एकतारा बोले तुन तुन तुन...। 50 साल से अधिक हो गए,समय के साथ हिंदी सिनेमा ने देश पर जान लुटाने वाले नेताओं की चर्चा ही बंद कर दी,और अपनी सारी तवज्जो एक ही किस्म के नेता पर केंद्रित कर दिया,जो देश को लूट के खाता है बंटी और बबली जैसी हास्य फिल्म हो,या फिर इन्क्लाब और इंडियन जैसी एक्शन फिल्म या फिर सत्याग्रह और राजनीति जैसी गंभीरता से मुद्दे रखने की कोशिश करती फिल्में,ये और इस तरह की तमाम फिल्में सिरे से जनप्रतिनिधियों को भ्रष्ट और अपराधी चित्रित करने में कोई संकोच नहीं करती। यदि हर वर्ष बनने वाली भारतीय फिल्मों के आधार पर कोई अध्ययन हो तो सहज ही इस निष्कर्ष पर पहुंचेगा कि भारत के सभी राजनीतिज्ञ भ्रष्ट हैं,अपराधी हैं,वहां जनतंत्र की कोई संभावना नहीं।सारा समाधान हथियारों से ही संभव है।

क्या आश्चर्य कि प्रकाश झा जैसे जवाबदेह फिल्मकार अन्ना आंदोलन को केंद्र में रख कर सत्याग्रह बनाते हैं। सत्याग्रह दर्शकों को यह लगातार मनवाने की कोशिश में दिखती है कि कोई भी जन आंदोलन अब स्वतः खडा नहीं हो सकता। उसे आधुनिक गिमिकस के सहारे ही खडा किया जा सकता है।भ्रष्टाचार के विरोध में आमरण अनशन पर बैठे द्वारिका आनंद की हालत नाजुक हो रही है,सरकार झुकने के लिए तैयार नही।एक व्यक्ति समर्थन में आत्मदाह कर लेता है, किसी भी जन आंदोलन की इससे गलीज भूमिका नहीं दिखाई जा सकती, कि आंदोलन का नेतृत्व मौत से संवेदनहीन उस लाश के राजनीतिक उपयोग पर विमर्श में लगा दिखता है।नायक कहता है सरकार पर दवाब बनाने के लिए अब लोगों का सडकों पर निकलना जरुरी है।और देखते देखते आंदोलनकारी हाथों में ए के 47 और तलवारों के साथ दौडते दिखाई देने लगते है। प्रकाश झा अलग क्यों दिखें,जब हिन्दी सिनेमा की प्रजातंत्र के प्रति यही समझ है।

अपने समय की सबसे चर्चित फिल्म रंग दे बसंती भी इससे अलग कहां हो पाती। पांच खिलंदड़े युवक, समाज और समझ से बेपरवाह। भगत सिंह और उनके साथियों को एक फिल्म के लिए अभिनित करते उनकी समझ गंभीर होती है। यह गंभीरता और घनी हो जाती जब उनके एक महिला साथी का मंगेतर प्लेन क्रैश में मारा जाता है। सरकार उसकी मौत को उसकी लापरवाही से जोड़ती है, जबकि सच्चाई यह है कि प्लेन की खरीद में भ्रष्टाचार हुआ था और गड़बड़ी प्लेन में थी। सरकार के इस स्टैंड के खिलाफ वे लोग एक व्यापक शांति पूर्ण आंदोलन की शुरूआत करते हैं ताकि मृतक पायॅलट को कम से कम वाजिब सम्मान मिल सके। लेकिन सत्ता इस विरोध का दमन करती है। अब उन पांचों मित्रों को कोई दूसरा रास्ता नहीं दिखाई देता। वे रक्षा मंत्री की हत्या कर देते हैं और एक रेडियो स्टेशन पर कब्जा कर जनता तक अपनी बात पहुंचाने की कोशिश करते हैं। अंततः कमांडो कारवाई होती है और वे मारे जाते हैं।युवाओं से संवाद करती यह फिल्म सीधे सीधे बैलेट नहीं,बुलेट के विकल्प को प्रेरित करती है।

हाल ही में आयी फिल्म ‘बस्तर में एक पुलिस अधिकारी अपने दम पर नक्सलियों से युद्ध लड रही है,और अपने आरामदेह कमरे में बैठ मंत्री भरसक उसकी लडाई को कमजोर करने में लगा है।मीटिंग में गृहमंत्री पूछता है,हमारे 76 जवान मारे गए,इसके लिए कौन जवाबदेह है? अधिकारी एक शब्द में उत्तर देता है,आप। और उसके बाद गृहमंत्री किसी सडकछाप शोहदे की तरह गाली गलौच पर उतर जाते हैं।कैसे भरोसा करे कोई अपने राजनीतिक नेतृत्व पर जो नक्सलवाद जैसे गंभीर मुद्दे पर भी अपने लाभ के गुणा भाग में लगा है।

वर्षो पहले आयी अमिताभ बच्चन के ‘इन्कलाब’ को यदि भूल भी गये हों तो उसके अंतिम दृश्य को भुलाना शायद ही संभव है, जब अमिताभ बच्चन स्टेनगन से पूरे कैबिनेट को भून डालते हैं,क्योंकि सभी के सभी भ्रष्ट थे। ऐसा ही कुछ ‘शूल’ में भी देखा गया था जब अपराधियों को मिल रहे राजनीतिक संरक्षण से निराश होकर एक पुलिस अधिकारी हथियार उठा लेता है। हिन्दी सिनेमा में लगातार खून का बदला खून की कहानियां को देखते हुए हम इतने कंडीशंड हो चुके हैं कि ऐसी कहानियां हमें बेचैन नहीं करती। हम इसे सहजता से स्वीकार करते हैं। हम थोड़ी देर के लिए भूल जाते हैं कि ये सामान्य बदले की कहानियां नहीं हैं, ये ऐसी कहानी है जो हमारे प्रजातांत्रिक व्यवस्था पर सवाल खड़े करती है। जिसका प्रभाव तुरंत ही हमारे मन पर भले ही नहीं पड़ता हो, लेकिन कहीं न कहीं एक अविश्वास की गांठ जरूर मन में बना जाती है, और आश्चर्य नहीं कि हमारी सामान्य बात-चीत में लोकतंत्र के प्रति अविश्वास दिखने लगता है और तदन्तर हम आम चुनावों जैसे महत्वपूर्ण अवसर के प्रति भी निरपेक्ष हो जाते हैं।यही समय होता है जब डर्टी पालटिक्स जैसी फिल्में बनने लगती है।

मतलब उस दौर में सिनेम की भरसक कोशिश रही कि राजनीति से हम दूर रहें।सिनेमा किस तरह आम चुनावों से हमारा मोह भंग करते रही वह इससे भी समझ सकते हैं कि 2004 में 50 प्रतिशत से भी कम वोट डाले गए थे,जबकि 2014 में सबसे अधिक 66 प्रतिशत वोट डाले गए,और 2019 में 68 प्रतिशत।यह वही समय है जब राजनीति के प्रति देश भर में एक सकारात्मक वातावरण बनने की शुरुआत हुई थी।लोगों का अपने जनप्रतिनिधियों पर विश्वास बढ रहा था,जिससे सिनेमा भी अछूता नहीं रहा। उरी-द सर्जिकल स्ट्राइक,आर्टिकल 370 जैसी फिल्म ने भरोसा दिलाया कि हमारे जनप्रतिनिधि देशहित में किस तरह आगे बढ कर निर्णय लेने में समर्थ हैं।क्या आश्चर्य कि आम चुनाव के महत्व को रेखांकित करती कोई फिल्म भी शायद पहली बार आती है 2017 में,न्यूटन।आमतौर पर याद करना मुश्किल है कि किसी फिल्म में आम चुनाव जैसे अवसर को उसकी पूरी गरिमा के साथ चित्रित किया गया हो।

वास्तव में जब कोई चीज हमें मिल जाती है तो उसके महत्व से हम निरपेक्ष हो जाते हैं। मतदान की कीमत जाननी हो तो हमें उन मुल्कों के लोगों से रू-ब-रू होने की जरूरत है, जिन्होंने मतदान का स्वाद ही नहीं चखा।यह हमारी मानस, हमारी समझ का सम्मान है इसका विकल्प संभव नहीं। जरुरत है कि आर्टिकल 370 और न्यूटन जैसी फिल्में लगातार बने ताकि मतदान में भागीदारी के लिए आमजन को प्रोत्साहित करने में सिनेमा भी अपनी भूमिका का सार्थक निर्वहन कर सके।

रविवार, 31 मार्च 2024

नकली छवि पर भारी असली चेहरा




 बांग्ला देश के पहले राष्ट्रपति शेख मुजीबुर्र रहमान पर बांगलादेश फिल्म डेवलेपमेंट कारपोरेशन 83 करोड में फिल्म बनाती है,मुजीब-द मेकिंग आफ ए नेशन,जिसमें आधा बजट यानी लगभग 40 करोड रुपए भारत सरकार देती है।फिल्म का निर्देशन अपनी खास शैली के लिए के लिए प्रतिष्ठित श्याम बेनेगल करते हैं।हालीवुड की तो बात ही छोड दें, इसी के बरक्स देखें तो देश के सबसे सम्मानित राजनेता भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी पर केंद्रित फिल्म मैं अटल हूं 10 करोड में और देश के सबसे लोकप्रिय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की बायोपिक पीएम नरेन्द्र मोदी लगभग 8 करोड में बनती है।...और हम कहते हैं कि भारत के राजनेताओं पर अच्छी बायोपिक क्यों नहीं बनती है..भारतीय नेताओं पर बनी बायोपिक को दर्शक क्यों अस्वीकार कर देते हैं।

रिचर्ड एटनबरो की गांधी अभी भी स्मृतियों में है,आज से 42 साल पहले वह फिल्म 2.2 करोड डालर के बजट से बनायी गई थी,जितने में दसियों शोले बनायी जा सकती थी।गांधी ने 8 आस्कर ही नहीं जीते,आज भी यह फिल्म टेलीविजन पर आने लगती है तो दर्शक ठहर जाते हैं।30 साल पहले 1993 में सरदार वल्लभ भाई पटेल पर बायोपिक सरदार लगभग 2 करोड के बजट में बनती है, और 2000 में डा.बाबा साहेब अम्बेदकर पर जब्बार पटेल 9 करोड में फिल्म बनाते हैं। यह सही है कि सिर्फ बजट से ही अच्छी फिल्म नहीं बनती,लेकिन यह भी सच है कि अच्छी फिल्म बनाने के लिए बजट की भी आश्यकता होती है।

किसी व्यक्ति पर जब कोई बोयोपिक बनाना आप तय करते हैं तो सबसे पहली चीज होती है,रिसर्च और फिर पटकथा।और कमाल यह कि सबसे कम खर्च हम इसी दोनों पक्ष पर करते हैं,बस अखबारी कतरनों के सहारे कोई कालजयी फिल्म की कल्पना भी कैसे की जा सकती है।आप फिल्म उतना भर ही दिखा कर नहीं बना सकते जो पब्लिक डोमेन पर वर्षों से घूम रही है।खास कर आज के सूचनाओं के इस दौर में जब लोगों के पास जानकारियों का अंबार है,आखिर कुछ तो ऐसा हो जो दर्शकों को सिनेमा घर तक आने के लिए उत्साहित कर सके।पौराणिक और ऐतिहासिक कथानक को हम बार बार देख सकते हैं,लेकिन समकालीन खबरों से हम इतने विज्ञ होते हैं कि उसके प्रति रुचि बनाने के लिए कुछ खास करना जरुरी होता है,जहां हिंदी फिल्में कमजोर पड जाती हैं। बायोपिक में भी उसका जोर कथा से अधिक सूचनाओं पर होता है,किसी के जीवन को कथा में ढालने के लिए श्रम और समय की आवश्यकता होती है,हिंदी सिनेमा जिसकी जरुरत ही नहीं समझ पाती।

अटल बिहारी वाजपेयी देश के सर्वमान्य नेताओं में रहे हैं।वे सत्ता में रहे,नहीं रहे,उनकी लोकप्रियता अप्रभावित रही।एक सर्वे के अनुसार देश के सबसे लोकप्रिय प्रधानमंत्री के रुप में नरेन्द्र मोदी पहले नंबर पर हैं,तो वाजपेयी जी अभी तक तीसरे नंबर पर अपनी जगह सुरक्षित रखी है।एक राजनेता के साथ उनकी पहचान एक संवेदनशील कवि की भी रही है।जमीन से उठकर दुनिया भर में अपने विचारों के साथ अपनी पहचान बनाने वाले इस विराट व्यक्तित्व को बायोपिक के नाम पर निबटाने की कोशिश की जाती है तो भला दर्शक क्यों स्वीकार करे।ठीक है,पंकज त्रिपाठी जैसे सिद्धहस्त अभिनेता उनके व्यक्तित्व को साकार करने में जी जान लगा देते हैं,लेकिन कहने के लिए बात ही नहीं हो तो अभिनेता क्या कर सकता।

ऐसा ही कुछ पीएम नरेन्द्र मोदी के साथ दिखा।क्या आश्चर्य नहीं कि नरेन्द्र मोदी जैसे जादुई व्यक्तित्व को साकार करने की जवाबदेही दी जाती है,हिंदी सिनेमा में हाशिए पर पडे अभिनेता विवेक ओबेराय को। यहां तक कि पटकथा और संवाद लिखने में भी विवेक हाथ आजमाते हैं।  जिस व्यक्ति को देखने और सुनने दुनिया के किसी भी कोने में लाखों की संख्या में लोग टूट पडते हैं,उस पर इतने अनमने तरीके कोई कैसे फिल्म परिकल्पित कर सकता है।फिल्म 2019 के चुनाव के पहले रिलीज की कोशिश की जाती है ,लेकिन होती चुनाव के बाद है।नरेन्द्र मोदी तो अपार बहुमत के साथ प्रधानमंत्री बनते हैं,लेकिन पीएम नरेन्द्र मोदी पूरी तरह खारिज कर दी जाती है।वाकई जब वास्तविक नरेन्द्र मोदी का जादुई आकर्षण सामने है ,तो कोई एक कमजोर सी नकल क्यों देखे।

वास्तव में बायोपिक के साथ फिल्मकार को अक्सर यह भ्रम होता है कि फिल्म तो उनके नाम पर चलेगी,जिन पर फिल्म बनी है।इसीलिए फिल्मकार का सारा जोर बस चरित्र के लुक की नकल उतारने पर रहता है।वे यह भूल जाते हैं कि धोनी और सुशांत सिंह के लुक में कोई समानता नहीं थी,मैरी काम और प्रियंका चोपडा एकदम अलग दिखते थे,बावजूद पटकथा और परिदृश्य जिसे निर्देशक ने रचा था,का कमाल यह था कि फिल्म शुरु होने के बाद कहीं अहसास ही नहीं होता कि परदे पर धोनी या मैरी काम नहीं है।शायद फिल्मकार यह समझ नहीं पाते कि दर्शक चेहरा देखने नहीं,कहानी देखने आ रहा है।दर्शक को सिनेमा में सिनेमा दिखाने की जवाबदेही तो सर्वप्रथम है,राजनेताओं पर बने बायोपिक में अक्सर यह चूक होती है।

बाल ठाकरे पर केंद्रित दो फिल्म बनती है,एक रामगोपाल वर्मा बनाते हैं सरकार,दूसरी उनकी बायोपिक के रुप में बनती है ठाकरेसरकार पसंद की जाती है और ठाकरे नकार दी जाती है।शायद इसलिए कि सरकार; एक औपान्यसिक कृति की तरह तैयार होती है,जबकि ठाकरे शुष्क जीवनी की तरह।अमिताभ बच्च्न ठाकरे नहीं लगते हुए भी ठाकरे की भूमिका में स्वाकीर्य होते हैं,नवाजुद्दीन ठाकरे लगते हुए भी अस्वीकर्य। कंगना काफी शिद्दत से जयललिता का बायोपिक थलाइवी बनाती है,लेकिन जयललिता की अपार लोकप्रियता भी फिल्म को नहीं बचा पाती।आश्चर्य नहीं नितीन गडकरी की बायोपिक गडकरी सिर्फ महाराष्ट्र के सिनेमाघरों में रिलीज की जाती है।

भारत में समकालीन राजनेताओं पर बन रही बायोपिक की असफलता की सबसे बडी वजह ईमानदारी का अभाव दिखता।हम इसलिए नरेन्द्र मोदी या अटल बिहारी वाजपेयी पर फिल्म नहीं बनाते कि उनके प्रति हमारी श्रद्धा है,या उनके विचारों के प्रति विश्वास।इसलिए बनाते हैं कि हमें उम्मीद होती है कि जैसे तैसे भी फिल्म बन जाएगी तो उनकी लोकप्रियता फिल्म को संभाल लेगी।

रविवार, 21 जनवरी 2024

सिनेमा से अनुपस्थित रहे हैं, हमारे मंदिर

 



मंदाकिनी नदी के किनारे हिमालय की पहाडियों से घिरे केदारनाथ मंदिर अपने स्थापत्य के कारण ईश्वरीय सत्ता को मानने को बाध्य करता है,इसलिए भी कि 2013 में केदार नाथ में आए भीषण सैलाब में जब सब कुछ बह गया था,मंदिर की रक्षा के लिए उसके सामने एक चट्टान आ गया और सैलाब की धारा बदल गई,मंदिर पर खरोंच तक नहीं आई। इसके पहले के वैज्ञानिक शोध भी बताते हैं कि लगभग 400 वर्षों तक यह मंदिर ग्लेशियर में दबा रहा।अंदाजा भी नहीं लगा सकते इस विलक्ष्ण मंदिर का निर्माण कब हुआ होगा,क्या वे मानव ही रहे होंगे जिन्होंने हजारों वर्षों पहले जब वहां तक पहुंचने की कोई सुविधा नहीं होगी,उस समय हिमालय की गोद में इसका निर्माण किया होगा। संतोष कर सकते हैं कि करोडों लोगों के आस्था के इस अद्भुत निर्माण को केन्द्र में रख कर केदारनाथ फिल्म भी बनी,गौरतलब है सिर्फ एक।इसके अतिरिक्त शायद ही किसी फिल्मकार ने इसके प्राकृतिक सौंदर्य या विलक्ष्ण स्थापत्य को दिखाने की आवश्यकता समझी।

इसके बरक्स हूमायूं का मकबरा याद करें तो बजरंगी भाईजान,कुरबान,वीरजारा,फना,झूम बराबर झूम,मेरे ब्रदर की दुल्हन और पी के जैसी 100 से भी अधिक फिल्मों में यह पूरी भव्यता के साथ दिखाया गया।पचासों गाने फिल्माए गए।इसका निर्माण 1570 में हुमायूं की विधवा हमीदा बेगम ने करवाया था।लाल बलुआ पत्थर से निर्मित इस मकबरे को 1993 में यूनेस्को ने वर्ल्ड हेरिटेज में भी शामिल किया। कहा जाता है,इसी मकबरे से प्रेरित होकर शाहजहां ने अपनी बेगम मुमताज महल की याद में ताजमहल का निर्माण करवाया,जिसे दुनिया के आश्चर्य में गिना जाता है,क्यों गिना जाता,यह अलग विमर्श का विषय है।सच यह है कि हिंदी सिनेमा भी खूबसूरत स्थापत्य के नाम पर ताजमहल से आगे कभी नहीं सोच सका।1941 में नानू भाई,1963 में एम सादिक और 2005 में अकबर खान के ताजमहल के कथानक पर बनी फिल्म के साथ लगभग 500 से भी अधिक फिल्मों में ताजमहल की भव्यता को किसी न किसी रुप में दिखाने की बात कही जा सकती है,बंटी और बबली जैसी कुछेक फिल्मों में सोद्देश्य तो अधिकांश में निरुद्देश्य ही,बस इसलिए कि एक खूबसूरत लोकेशन उन्हें दिखाने की जरुरत होती है।

किंचित आश्चर्य कि हिंदी सिनेमा को जब भी खूबसूरत लोकेशन की आवश्यकता होती है,उसके जेहन में आमतौर पर मकबरों का ही ख्याल आता है।कभी सिनेमा में मुंबई की पहचान ही हाजी अली से होती थी।सुभाष घई की फिल्म परदेस आई लव माई इंडिया... के लिए ही याद नहीं किया जाता,दो दिल मिल रहे हैं...के लिए भी याद किया जाता है।जिस गाने में पूरे विस्तार से फतेहपुर सिकरी के मस्जिद की भव्यता दिखाई गई है।जिसका निर्माण अकबर ने सलीम चिश्ती के लिए करवाया था,जिसने उसके पिता बनने की भविष्य की थी।सलीम चिश्ती के नाम पर ही अकबर ने अपनी पहली संतान का नाम भी सलीम रखा था।मस्जिद के उत्तर में सलीम चिश्ती की दरगाह भी है। कहते हैं इसका निर्माण मक्का की मस्जिद के नकल पर किया गया था। कोई शक नहीं कि न हिंदू बनेगा,न मुसलमान बनेगा की बात करने वाला हिंदी सिनेमा मस्जिदों, दरगाहों पर तो सहज रहता, मंदिरों को दिखाने के नाम पर असहज हो जाता।

जबकि सौंदर्य की दृष्टि से हों,धरोहर की दृष्टि से हों,पौराणिक महत्व की दृष्टि हों या फिर आस्था की दृष्टि से भारत में सौ से अधिक ऐसे मंदिर होंगे,जिनका सौंदर्य और स्थापत्य अतुलनीय माना जा सकता है।दुनिया भले ही नजरें चुरा रही हो,अपनी कारीगरी से वे हजारों साल बाद भी देखने वालों को विस्मित कर रही हैं।50 रुपए के नोट पर छपे हम्पी के मंदिर की ही बात करें,विजयनगर साम्राज्य के समृदधि और स्थापत्य के प्रतीक के रुप में इस मंदिर को देखा जा सकता है।यूनेस्को ने भी इसे वर्ल्ड हेरिटेज में शामल किया है।द्रविड स्थापत्य शैली में बना भगवान शिव का यह मंदिर अपनी भव्यता और महीन कारीगरी के लिए आज भी चकित करता है। कर्नाटक में ही होयसलेश्वर मंदिर के अद्भुत स्थापत्य की कल्पना बगैर देखे नहीं की जा सकती। सोपस्टोन से बना यह मंदिर अपनी मूर्तियों, महीन नक्काशी, विस्तृत चित्र श्रंखला के साथ-साथ अपने इतिहास, प्रतिमा विज्ञान, उत्तर भारतीय और दक्षिण भारतीय लिपियों में शिलालेखों के लिए विश्व भर के पुरातत्व प्रेमियों को आकर्षित करता है।

हिंदी सिनेमा का मंदिरों से एक हद तक परहेज इसी अर्थ में समझा जा सकता है कि किसी मकबरे की शूटिंग के लिए वे पूरे क्रू के साथ हजार किलोमीटर की यात्रा कर सकते,लेकिन नजदीक के मंदिर को वे महत्व देना नहीं चाहते।क्या कमाल है मंदिर के लिए फिल्मिस्तान के मंदिर से काम से चल जाता,मस्जिद तो अजमेर शरीफ का ही जाहिए। वास्तव में हिंदी फिल्मकारों के कई पूर्वाग्रहों में एक यह भी है कि सूफी, कव्वाली, मकबरा, दरगाह जैसे इस्लाम से जुडी चीजें तो आम दर्शकों को स्वीकार्य होंगी,लेकिन हिंदू धर्म से जुडे पहचान उनकी छवि खराब कर देंगे। वे भूल जाते हैं कि यही दर्शक हैं जिसने शोले के साथ जय संतोषी मां को भी सरमाथे पर बिठाया था।

इस पूर्वाग्रह में निश्चित रुप से अहम भूमिका वामपंथी इतिहासकारों और स्वतंत्रता के बाद की सरकारों की भी मानी जा सकती है,जिन्होंने मात्र ताजमहल,कुतुब मीनार जैसे कथित इस्लामिक स्थापत्य को भारतीय पहचान के रुप में स्थापित किया,जबकि मंदिरों के स्थापत्य को भरसक छिपाए रखने की कोशिश की। खजुराहो मंदिर, कोणार्क मंदिर, कांची मंदिर, दिलवाडे का मंदिर, एलोरा का कैलाश मंदिर, मीनाक्षी मंदिर, तंजावुर मंदिर, रामेश्वरम, सोमनाथ देश के हर क्षेत्र में अपने अप्रतिम सौंदर्य और हजारों वर्षों के भारतीय स्थापत्य और ज्ञान की विरासत अपने में समेटे मंदिर उपस्थित हैं।हिंदी सिनेमा की सीमा वह नहीं देख पाती,या देखना नहीं चाहती।

ऐसे में अभिषेक वर्मन की फिल्म 2 स्टेट्स की याद आना स्वभाविक है,जिसके अंतिम दृश्यों में महाबलीपुरम का आठवीं शताब्दी में निर्मित तटीय मंदिर कहानी को पूर्णता देता है,जहां नायक कृष(अर्जुन कपूर) और नायिका अनन्या(आलिया भट्ट) का विवाह हो रहा होता है।एक सामान्य से विवाह के दृश्य को एक प्राचीन ऐतिहासिक मंदिर की उपस्थिति कितना भव्य बना देती है,आने वाले दिनों में हिंदी सिनेमा शायद यह समझने को तैयार हो सके।