रविवार, 14 दिसंबर 2025

सिनेमा के कामर्स का नया ककहरा

 


हमलोग पढते सुनते रहे हैं कि सिनेमा में सभी कला और सभी विज्ञान किसी न किसी रुप में समाहित हैं।एफटीआईआई से फिल्म पढकर निकले एक मित्र ने कुछ ही दिन पहले बातचीत में कहा यह आप लोगों का भ्रम है,सिनेमा यदि कुछ है,तो वह है बस कामर्स,सिनेमा कामर्स से ही शुरु होती है,और कामर्स पर ही खत्म होती है। परिकल्पना से लोकर दर्शकों के देखने तक के सफर में सिनेमा को हर कदम पर कामर्स की सीढियां चाहिए। यह बात सुनने में भले ही हमें थोडी असुविधा में डालती हो,लेकिन इस सच से इन्कार नहीं किया जा सकता कि सिनेमा का इतिहास इसके व्यापार के चर्चा के बगैर पूरा नहीं होता।दादा साहब फालके ने देश में पहली फीचर फिल्म राजा हरिश्चंद्र अपने घर जेवर बेच कर बना तो ली,चुनौती थी फिल्म को दर्शकों तक पहुंचाने की,या कहें सिनेमाघर तक दर्शकों को लाने की।3 मई 1913 को मुंबई के कोरोनेशन थिएटर में फिल्म रिलीज हुई।उन्होंने अखबारों में विज्ञापन दिए,उन्हें उम्मीद थी कि राजा हरिश्चंद्र की कहानी,और फिर देश में बनी पहली फीचर फिल्म, दर्शक तो कोरोनेशन की टिकट खिडकी पर टूट पडेंगें।लेकिन कहते हैं पहले शो में दर्शकों से अधिक फिल्म के कलाकारों की संख्या थी।शुरुआती पांच शो में कुल 75 टिकट बिके।तब दादा साहब को फिल्म की प्रमोशन प्लान करने पडे,जिसमें लाइव ट्रेलर भी एक था,मतलब फिल्म के कलाकार खास जगहों पर फिल्म के छोटे छोटे सीन रिक्रिएट करते थे।बाद में जब दर्शक फिल्म देखने पहुंचने लगे और फिल्म हिट हो गई तो कहते हैं  टिकट के कलेक्शन बैलगाडी पर बैंक भेजे जाते थे।1913 और आज 2025 सिनेमा के सामने दर्शकों तक पहुंचने की वह जद्दोजहद अभी भी जारी है।

इसी जद्दोजहद में सिंगल थिएटर,टूरिंग थिएटर,मल्टीप्लेक्स,ओटीटी और अब यूट्यूब जैसे विकल्प समय-समय पर सिनेमा के लिए उम्मीद बन कर आते रहे हैं।इसी विकल्प की तलाश में कभी सिनेमा जरुरत से ज्यादा बडी होकर 70 एमएम में फैल जाती है तो कभी मोबाईल के 7 एमएम में सिमट जाती है। कोरोना के बाद से ही ओटीटी ने भारतीय दर्शकों का सिनेमाघरों से मोहभंग कर दिया था, शुरुआती दौर में ओटीटी ने भले ही हिंसा और अश्लीलता के साथ अपनी पहचान बनायी,बाद में उसे अहसास होने लगा कि भारतीय दर्शकों से जुडना है तो संवेदनशील कहानियां ही कहनी पडेगी।आश्चर्य नहीं कि बंदिश बैंडिट्स जैसी फिल्में खासतौर पर ओटीटी के लिए बनने लगी। वास्तव में डिस्ट्रीब्यूशन ने सिनेमा को दर्शकों तक पहुंचाने की सहुलियत दी तो सिनेमा को नियंत्रित करने की भी कोशिश की।सिनेमा के लिए मुश्किल यह होती रही फिल्मकारों का दर्शकों से सीधा सरोकार ही नहीं बन पाता। फिल्मकारों को पता ही नहीं कि दर्शक क्या पसंद कर रहे,क्या नापसंद।बीच में डिस्ट्रीब्यूटर होते जो अपनी इच्छा अनिच्छा दर्शकों के नाम पर फिल्मकारों तक पहुंचाते।सिनेमाघरों के लिए जो काम डिस्ट्रीब्यूटर कर रहे थे, वही काम अब ओटीटी के प्रबंधक करने लगे,वे फिल्मकारों को डिक्टेट करते कि कैसी और क्या फिल्म चाहिए।फिल्म बनाना किसी और को,देखना किसी और को,और तय करता कोई तीसरा,जिसे न देखना था,न बनाना।ऐसे में परफेक्ट फेमिली ने यूट्यब को एक नए विकल्प के रुप में स्वीकार किया,जहां फिल्मकार और दर्शक के बीच सीधा कनेक्ट था।

परफेक्ट फेमिली के साथ फिल्म निर्माण में कदम रख रहे अभिनेता पंकज त्रिपाठी कहते हैं, परफेक्ट फैमिली’ मेरे दिल के बेहद करीब है, सिर्फ इसकी कहानी की वजह से नहीं, बल्कि इसलिए भी कि हम इसके लिए जो साहसी वितरण मॉडल अपना रहे हैं, वह बिल्कुल अलग है वे कहते हैं, आज दर्शक कहानियों को सीधे खोजते हैं, और यूट्यूब जैसे प्लेटफ़ॉर्म लंबे फ़ॉर्मेट वाले कंटेंट के लिए एक बेहतर जगह बन चुके हैं। अपने पहले प्रोडक्शन को पारंपरिक फ़ॉर्मेट्स से हटकर एक नए मॉडल में बनाना मेरे लिए ताज़गी भरा भी था और ज़रूरी भी। पंकज त्रिपाठी जैसे जमीन से जुडे और संवेदनशील अभिनेता जब यह कहते हैं तो नहीं मानने का कोई कारण नहीं,क्योंकि हिंदी सिनेमा के पास एक पंकज ही हैं जिसने अपने दर्शकों से आज भी सीधा संबंध बना रखा है,वह ऐसा कलाकार है जिसे उसके दर्शक हाथ पकड कर आज भी बता पाते हैं कि उन्हें क्या देखना पसंद है। पंकज जब अपने प्रोडक्शन के लिए यूट्यूब का विकल्प चुनते हैं तो यह विकल्प 70 एमएम बरक्स 7 एमएम का भी होता है। वास्तव में यह सिर्फ कामर्स का मामला नहीं,सिनेमा का अपने तमाम तय व्याकरणों से मुक्त होने की कोशिश के रुप में भी इसे देखा जाना चाहिए।

पंकज त्रिपाठी की परफेक्ट फेमिली हिंदी की पहली फिल्म मानी जा सकती है जो सीधे यूट्यूब पर रिलीज की गई।8 एपीसोड में बनी इस फिल्म के पहले 3 एपीसोड यूट्यूब पर निशुल्क हैं,जबकि आगे के 5 एपीसोड के लिए 59 रुपए में सदस्यता लेने की जरुरत पडेगी। सिनेमाघरों में टिकट दर जबकि न्यूनतम 200 हो गए हैं,ऐसे में पूरे परिवार केलिए 59 रुपए में फिल्म देखना वाकई बेहतर विकल्प हो सकता है।पंकज के इस निर्माण और वितरण में उनके पुराने मित्र फिल्म निर्माता अजय राय की कंपनी जार पिक्चर्स सहयोगी बनी है।अजय राय कहते हैं, जार पिक्चर्स में हम हमेशा कहानी कहने की संभावनाओं का विस्तार करने में विश्वास रखते हैं, सिर्फ रूप में नहीं, बल्कि इस बात में भी कि कहानियाँ लोगों तक कैसे पहुँचती हैं। यूट्यूब का पे मॉडल भारतीय क्रिएटर्स के लिए एक बिल्कुल नया क्षितिज खोलता है। इतनी मजबूत कास्ट और पंकज के पहली बार प्रोडक्शन में कदम रखने के साथ, ‘परफेक्ट फैमिली’ इस नए क्षेत्र को परिभाषित करने के लिए सही प्रोजेक्ट लगा। कितना बेहतर है कि बगैर किसी इंतजार के दुनिया भर के दर्शक इसे एक साथ देख सकते हैं।

हालांकि यह भी सच है कि वितरण के इस ट्रांजेक्शनल वीडियो ऑन डिमांड (टीवीओडी) माडल पर लंबे समय से प्रयोग हो रहे हैं। बिहार में नीतिन चंद्रा और नीतू चंद्रा भाई बहन की क्रिएटिव जोडी ने भोजपुरी,मैथिली में अलग नजरिए से फिल्म बनाने की शुरुआत की,तो राष्ट्रीय पुरस्कार और अंतरराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल में भागीदारी अवश्य मिली,थिएटर नहीं मिले तो उन्होंने बेजोड के नाम से एक प्लेटफार्म लांच कर पे पर व्यू के माडल पर अपनी देसवा,मिथिला मखान,जैक्शन हाल्ट जैसी फिल्मों के साथ भोजपुरी मैथिली में शंकर महादेवन,शारदा सिन्हा जैसे कलाकारों के साथ खासतौर पर तैयार गीत भी डाले।लगभग पांच साल पहले इस माडल से उन्होंने क्या हासिल किया यह तो पता नहीं,लेकिन आज टीवीओडी इंटरटेनमेंट इंडस्ट्री में छोटा  ही सही लेकिन महत्वपूर्ण भागीदारी के लिए तैयार है। यह निश्चित रूप से एक बढ़ता हुआ सेगमेंट है,जो फिल्मकारों को आकर्षित कर रहा है। भारत में 600 मिलियन से अधिक उपयोगकर्ताओं के साथ यूट्यूब एक विशाल समुदाय के साथ जुडने का सीधा अवसर प्रदान कर रहा है,खास बात यह कि उपयोगकर्ता और निर्माता के बीच यहां कोई संपादक नहीं। कह सकते हैं यूट्यूब ने कंटेंट निर्माण और वितरण दोनों को लोकतांत्रिक बना दिया है। यदि इन उपयोगकर्ताओं का एक छोटा प्रतिशत भी भुगतान के लिए उत्साहित होता है, तो भुगतान की राशि के बडी होने के प्रति आश्वस्त हुआ जा सकता है।

हाल ही में आमिर खान ने भी अपनी चर्चित फिल्म सितारे जमीन पर को सिनेमा घरों के बाद सीधे यूट्यूब पर डाल कर इस प्लेटफार्म की संभावनाओं को रेखांकित किया।आमिर खान समय से आगे चलने वाले कैलकुलेटेड व्यक्ति माने जाते हैं।20 जून को उनकी फिल्म बेहतर कलेक्शन के साथ सिनेमाघरों मे रिलीज हुई,लेकिन किसी ओटीटी पर देने के बजाय उन्होंने 1 अगस्त को 100 रुपए पे पर व्यू माडल पर इसे यूट्यूब पर डाल दिया,मतलब जब भी आप यह फिल्म देखना चाहेंगे 100 रुपए खर्च कर देख सकते हैं।मतलब आमिर खान को अपनी फिल्म पर भरोसा था कि उसे दर्शकों के लिए किसी ओटीटी के बंधे बंधाए सब्सक्राइबर की जरुरत नहीं,दर्शक सीधे उनकी फिल्म के लिए भुगतान कर फिल्म देखना चाहेंगे।आमिर खान ने कहा भी, मुझे ओटीटी से 125 करोड़ नहीं चाहिए, मुझे अपने दर्शकों से 100 रुपये चाहिए। वास्तव में आमिर खान को यह हौसला 2025 की एक मीडिया रिपोर्ट से मिली होगी जिसके अनुसार, भारतीय दर्शक अब एकमुश्त कंटेंट के लिए भुगतान करने के प्रति अधिक इच्छुक हो रहे हैं, और 2024 में टीवीओडी राजस्व 1300 करोड़ रुपये तक पहुंच गया। जिसके अगले कुछ वर्षों में कई गुणा बढने का अनुमान किया जा रहा है।

उम्मीद की जा सकती है टीवीओडी का बढता बाजार परफेक्ट फेमिली की तरह भारतीय दर्शकों की पारिवारिक संवेदना से जुडें और भी कंटेंट के लिए इंडस्ट्री की हौसला आफजाई करेगा। निर्देशक सचिन पाठक की परफेक्ट फैमिली में एक आम पारिवारिक कथा प्रस्तुत करने की ईमानदारी दिखती है।आमतौर पर परिवार में या तो षडयंत्र दिखते हैं,या फिर अतिशय त्याग और टूटे रिश्ते और अनकहे मनमुटाव की कथा कहती है,ये ऐसे लोग हैं जिन्हें परिवार चाहिए भी,नहीं भी।इस बीच पिसती अति संवेदनशील छोटी बच्ची दानी इस परिवार के साथ हमें अपने रिश्तों को भी समझने केलिए तैयार करती है। फिल्म मेंटलहेल्थ जैसी संवेदनशील मुद्दों पर भी बातचीत के लिए तैयार करती है।उल्लेखनीय है कि यूट्यूब के लिए बनने के बावजूद परफेक्ट फेमिली के निर्माण में कहीं समझौता नहीं किया गया है,चाहे लोकप्रिय बेहतर अभिनेताओं के उपस्थिति की बात हो या तकनीक की।

वास्तव में यूट्यूब  ने कंटेंट में एक अद्भुत जनतंत्र लाया है।जनता की पसंद यूट्यूब के कंटेंट की पहली और एकमात्र शर्त है। आमतौर पर इंटरटेनमेंट प्रोडक्शन ऊपर से तैयार होकर नीचे दर्शकों तक आता है,यूट्यूब ने निर्माण और उपभोग ऊपर से नीचे के बजाय नीचे से ऊपर की दिशा में शिफ्ट हो रहा है।जाहिर है आनेवाले दिनों में दर्शकों की रुचि सक्रीन पर और भी मुखर होकर दिखेगी।पंकज त्रिपाठी की इंटरटेनमेंट इंडस्ट्री को विषय ही नहीं,कामर्स के स्तर पर भी जडता से मुक्त करने की पहल के लिए सराहना की जानी चाहिए। 


रविवार, 1 जून 2025

दुश्मन के साथ कैसा दोस्ताना


 

एक देश के रुप में पाकिस्तान से भारत के रिश्ते कभी दोस्ताना नहीं रहे।लेकिन यह भी सच है कि इसी तनाव के बीच पडोसी होने के नाते औपचारिक रिश्ते भी बने रहे। चाहे क्रिकेट का हो या कला का। चूंकि दोनों देश की सांस्कृतिक जमीन एक ही रही है इसीलिए तमाम तनावों के बीच सांस्कृतिक आवाजाही बनी रही, सांस्कृतिक ‘सामग्रियों’ के रुप में ही नहीं,सांस्कृतिक व्यक्तियों के रुप में भी। यहां तक कि पाकिस्तान के कंटेट पर केंद्रित स्वतंत्र टेलीविजन चैनल तक की शुरुआत हुई।यह भारत की ओर से पाकिस्तान के तमाम दुर्भावनाओं को नजरअंदाज कर सांस्कृतिक रिश्ते बनाए रखने की कोशिश ही थी कि ‘हीना’ ही नहीं,‘वीर जारा’ और फिर ‘बजरंगी भाईजान’ जैसी फिल्में भी बनी। और फिर पाकिस्तानी कलाकारों के लिए हिन्दी सिनेमा के दरवाजे भी खोल ही नहीं दिए गए,दर्शकों ने उन्हें सर माथे पर बिठाया भी।

वास्तव में यह कला की खासियत भी है जब हम उससे रु ब रु होते हैं,तो उसे पसंद ना पसंद करने का कोई दूसरा आधार नहीं होता।सिनेमा को भी सिनेमा के व्याकरण के आधार पर ही हम पसंद ना पसंद करते हैं।सिनेमा देखते हुए कलाकार की राष्ट्रीयता या उसके चरित्र या अन्य दीगर जुडी चीजों पर हम ध्यान दे ही नहीं सकते।गुलाम अली व्यक्ति को याद करें तो उनके बयान,उनकी राष्ट्रीयता याद आती है,लेकिन उनके गजल सुन रहे हों तो आप सिर्फ और सिर्फ उनके गायन से जुडते हैं। क्या आश्चर्य कि कंगना रनौत भी अपने रील में पाकिस्तानी गाने का प्रयोग करती हैं। कला और कलाकार में फर्क होता है.कला तमाम सीमाओं से परे होती है,व्यक्ति चाहे वह कलाकार ही क्यों न हो,सीमाएं होती हैं।आश्चर्य नहीं कि कला को पासपोर्ट की जरुरत नहीं होती,कलाकार को होती है।

कला को स्वीकार करते हुए अक्सर हम भूल जाते हैं कि कलाकार कोई एलियन नहीं होता। उनका भी देश होता है,समाज होता है,जाति होती है,धर्म होता है। दिलीप कुमार की फिल्में वैश्विक अपील रख सकती हैं,लेकिन वे हिन्दुस्तानी की पहचान से कैसे मुक्त हो सकते हैं।सलमान खान कलाकार हैं तो क्यों अदालत में पेशी के समय उन्हें जालीदार टोपी पहनने की जरुरत पड जाती है।अक्षय कुमार क्यों नमस्कार और शाहरुख क्यों आदाब और इंशा अल्लाह करते हैं। किसी कलाकार की कला इस सबसे ऊपर होती है,लेकिन व्यक्ति के रुप में यह कैसे माना जा सकता है कि उसमें सामान्य कमजोरियां नहीं होंगी। कलाकार होने की यह कोई गारंटी नहीं हो सकती कि वह कोई गलत काम नहीं करेगा।

वास्तव में जब कलाकार और आतंकवादी की बात होती है तो बरबस आमिर खान अभिनीत ‘सरफरोश’ की याद आती है।जॉन मैथ्यू की यह फिल्म इतने वर्ष बात जाने के बाद भी शायद ही किसी भारतीय की स्मृति से निकल सकी है।यह फिल्म एक जांबाज पुलिस अधिकारी की कहानी थी,जो पडोसी मुल्क द्वारा देश में चलाए जा रहे आपराधिक षडयंत्रों का खुलासा करता है।इस फिल्म में आतंकवादियों के एक सरगना के रुप में एक विश्व प्रसिद्ध गजल गायक को चिन्हित किया गया था।वह गायक अपनी कला के बल पर देश की शीर्ष हस्तियों के बीच अपनी पकड मजबूत बनाता है,और उसका उपयोग आपराधिक षडयंत्रों के लिए करता है।सार्वजनिक जीवन में उसके सौम्य व्यक्तित्व और कलाकार के आवरण से उस पर किसी को शक भी नहीं होता।

निश्चित रुप से ‘सरफरोश’ एक फिल्म थी,एक कहानी कहती थी,और हम हमेशा चाहेंगे कि वह कहानी ही बनी रहे।लेकिन यह फिल्म यह तो इशारा करती ही थी कि किसी को कलाकार कह कर हम उसे देश दुनिया से ऊपर होने का दर्जा नहीं दे सकते। जो तमाम कमजोरियां गडबडियां एक सामान्य मनुष्य में होती हैं,उससे वंचित किसी कलाकार को भी नहीं समझा जा सकता।कलाकारों के बारे में भी यही कहा सुना जाता रहा है,वे तो कलाकार हैं,उन्हें देशों की राजनीति से क्या लेना देना,पलक झपकते फवाद खान और माहिरा खान जैसे कलाकार हमारी गलतफहमी साफ कर देते हैं,कि वे पाकिस्तान के हर सही गलत के साथ हैं,और बाकी हिन्दुस्तान दुश्मन है तो उसके लिए भी है। वास्तव में हम अपने स्वार्थ या कथित उदारता में यह समझ कर भी नहीं समझना चाहते।

यह तीसरी बार है जब पाकिस्तान के कलाकारों पर भारत में रोक लगाने की बात की जा रही है।इसके पहले 2016 में उरी हमले के समय,फिर 2019 में पुलवामा हमले और अब 2025 पहलगाम।कहा जाता है ये कलाकार तो आतंकवादी नही,फिर इन्हें सजा क्यों। ये सही है कि वे आतंकवादी नहीं, लेकिन यह कैसे भूला जा सकता है कि वे पाकिस्तानी नागरिक हैं।ये उस देश के नागरिक हैं, आतंकवादी घटनाओं में जिसकी स्पष्ट भागीदारी देखी जा रही है। भारत के प्रति जिस तरह की घृणा ये सोशल मीडिया पर जाहिर कर रहे, स्पष्ट लगता है किसी भी सामान्य नागरिक की तरह उनके लिए भी वह नागरिकता प्रथम थी। इसमें कुछ गलत भी नहीं,फवाद को एक पाकिस्तानी नागरिक के रुप में यह जाहिर करना भी चाहिए था।क्या जब हिन्दुस्तान के कलाकार अमेरिका या अन्य किसी देश में काम करते हैं तो यह स्वीकार हम कर सकते है कि कथित कलाकार होने के नाते वे हिन्दुस्तान के हित की बात नहीं करें। फिर फवाद या अली जफर या माहिरा जैसे पाकिस्तानी नागरिकों से अपने देश के खिलाफ बोले जाने की उम्मीद क्यों। सही या गलत,बात जब देश के फैसले की हो तो देश के साथ कैसै खडा हुआ जाता है यह भारतीय कलाकारों को भी उनसे सीखना चाहिए।

वास्तव में जब पाकिस्तानी कलाकार पर रोक की बात कही जाती है तो,यह किसी कलाकार पर रोक की बात नहीं होती,यह उस देश के नागरिक के प्रति हमारी सामान्य प्रतिक्रिया होती है,जिस देश ने हमें बीते 77 वर्षों से बेचैन रखने में कोई कसर नहीं छोडी है।हमारे पास यह जांचने का कोई उपकरण नहीं है कि कोई अपने देश के हित में किस हद तक जा सकता है,ऐसे में यह सहज प्रतिक्रिया है कि या तो आप अदनान सामी तरह अपने देश के मोह से मुक्त हो जाओ या फिर खुल कर अपने देश के साथ दिखो,जो तुम्हारा हक है।

पाकिस्तानी कलाकारों पर रोक की बात जितनी भावनात्मक है,उससे कहीं ज्यादा व्यवहारिक। यह सही है कि आज उदारीकरण के दौर में हर व्यक्ति को किसी देश में काम करने और अपने देश को मजबूत बनाने का हक है,लेकिन यह तब तक ही जायज मान जा सकता है जबतक उस मजबूती से किसी दूसरे देश की संप्रभुता अखंडता को खतरा न हो। आज जब पाकिस्तानी कलाकार अपनी हिन्दुस्तानी कमाई का एक बडा हिस्सा टैक्स के रुप में पाकिस्तान को दे रहे होते हैं,और पाकिस्तान उसका इस्तेमाल भारत के खिलाफ आतंकवादियों के नेटवर्क मजबूत करने में लगा रहा होता है तो क्यों नहीं कमाई के इस स्त्रोत का विरोध होना चाहिए।हम यह क्यों नहीं याद करें कि अपने पेट काटकर जिस पैसे से हम पाकिस्तानी कलाकारों को अमीर बना रहे होते हैं,उसका इस्तेमाल हमारे ही खिलाफ होता है।

मुश्किल यह है कि हमारी उदारता ने हमारी यादयाश्त को कुंद कर रखा है,नहीं तो रोक का यह तीसरा अवसर नहीं होता।क्या उरी के बाद पाकिस्तान बदल गया था,क्या पुलवामा के बाद पाकिस्तान बदल गया,फिर हमने क्यों फवाद जैसे पाकिस्तानी कलाकारों के लिए पलक पांवडे बिछाए।क्यों अबीर गुलाल के लिए फवाद ही जरुरी था।

हम उदार हैं,हमारे लिए यह मानना मुश्किल है लेकिन सच यही है कि पाकिस्तानी कलाकारों का विरोध न तो कला का विरोध है,न ही भाईचारे का,यह विरोध है पाकिस्तान का और उसकी नीयत का।

रविवार, 23 मार्च 2025

ओटीटी से झांकता बिहार

 



यदि बिहार के आरा से आप परिचित होंगे,तो धरमन चौक से भी परिचित होंगे।ये नामकरण आज भी यथावत ससम्मान स्वीकार्य हैं,जो ऐसी तवायफ के नाम पर रखे गए थे,जिनके उल्लेख के बगैर 1857 का इतिहास पूरा नहीं हो सकता।कहते हैं धरमन बाई हर युद्ध में कुंवर सिंह के साथ रहीं।वे तोप चलाने में पारंगत थी। अंग्रेजों के साथ युद्ध करते हुए ही वे वीरगति को प्राप्त हुईं। लेकिन ओटीटी के लिए संजय लीला भंसाली जैसे फिल्मकार जब आजादी के संघर्ष में तवायफों के योगदान की कहानियां ढूंढते हैं तो उन्हें सीमापार लाहौर के किस्से सुनाई दे जाते हैं,बिहार का इतिहास नहीं दिखता। यह कोई नई बात नहीं, बिहार का नहीं दिखना हिंदी सिनेमा के स्वभाव में रहा है,जिसका विस्तार अब ओटीटी में भी दिखने लगा है। देश के लिए धरमन बाई का संघर्ष और बलिदान चाहे जितना भी महत्वपूर्ण रहा हो,इन्हें संतोष लाहौर की हीरामंडी में ही मिलता है,जहां मल्लिकाजान और बिब्बोजान की नकली कहानियां सजायी जा सकें।शायद इन्हें लगता बिहार पहुंच कर इनकी भव्य कहानियां डी क्लास हो जायेंगी।

हाल ही में अपनी सहज ग्रामीण कथ्य को लेकर लोकप्रिय वेबसीरिज दुपहिया बिहार के एक कल्पित गांव धडकपुर की कहानी कहती है।यह ऐसा बिहार है जहां लडकियां आत्मनिर्भर बनने की होड कर रही है।वह गांव के लोगों को वैश्विक चुनौती के लिए तैयार कर रही है।किंचित शायद बडे छोटे किसी भी तरह के परदे पर बिहार का कोई ऐसा गांव पहली बार फिल्माया गया होगा,जो बोते अपराध मुक्त होने के पचीस वर्ष पूरे कर चुका हो,जहां थाना हो,लेकिन एफआईआर खबर बनती हो।यह ऐसा बिहार है जहां लडकी को छेडने वाला नहीं,उसके साथ खडा होने वाला दोस्त हो।यहां प्रेम है,रिश्ते हैं,रिश्तों की खटाश है,रिश्तों का सम्मान है।यह वह बिहार है जहां बेटी की शादी के लिए पूरा गांव खडा हो जाता है।यह अलग बात है कि यहां बिहार होते हुए भी बिहार नहीं दिखता,लेकिन यह भी सच है कि अच्छाइयों की यह कथा बिहार में डीक्लास नहीं होती,बल्कि कथा को एक स्वभाविक जमीन देती है। बाद में क्या हो,पता नहीं,लेकिन दूपहिया के पहले परदे पर बिहार का मतलब मारदेब गोली कपार में,आइए न हमरा बिहार…” में ही होता था।  

यह भी आश्चर्य कि दूपहिया के निर्माण से लेकर अभिनय तक में कोई भी महत्वूर्ण नाम बिहार से नहीं होता,और आश्चर्य यह भी कि ओटीटी की दशा और दिशा दोनों बदल देने वाली वेबसीरिज पंचायत के लेखक से लेकर अधिकांश अभिनेता तक बिहार से होते हैं,लेकिन कहानी फुलेरा चली जाती है,जिसे उत्तर प्रदेश के बलिया जिले में बताया जाता है।यह बिहार का बक्सर होता तो क्या फर्क पडता? वास्तव में दृश्य माध्यमों में कई दशकों से बिहार की जो छवि गढी जाती रही है,उसमें फुलेरा जैसे अविकसित गांव की तो कल्पना की जा सकती है,लेकिन एक ऐसे समाज को परिकल्पित नहीं किया जा सकता,जहां प्रह्लाद चा जैसे निस्वार्थ नेक दिल लोग रहते हैं,जो 50 लाख रुपए हथेली पर लिए घूम रहे कि कोई इसे नेक काम में लगा दो।जहां अपनी बूढी दादी को नजरों से दूर नहीं होने देने वाला जगमोहन रहता हो,जहां अपने पालतू कबूतर के लिए विधायक से भी लड जाने वाला बम बहादुर हो। यह अजीब विडंबना है कि बिहार में एक सहज सरल ईमानदार प्रेमिल समाज की परिकल्पना पहले सिनेमा नहीं कर पा रही थी, दूपहिया जैसे अपवाद को छोड दें तो अब ओटीटी भी नहीं कर पा रही है।यहां ऐसे प्रधान के बारे में सोचा ही नहीं जा सकता जो अपने अधबने घर की दीवारों पर खुद से पानी सींच रहा हो,जिसके दरवाजे पर एक कार तक नहीं हो। हां, भीमा भारती,चंदन महतो या साहेब हारुन शाह अली बेग को दिखाना हो तो बिहार की पृष्ठभूमि परफेक्ट है।

महारानी के तीन सीरीज आ चुके हैं।कह सकते हैं बिहार पर केंद्रित सबसे लोकप्रिय सीरीज रही है यह।महारानी बिहार की राजनीति के उस कालखंड को चित्रित करती है,जिसे बिहार का सबसे बुरा दौर माना जा सकता है, आज भी बिहार जिसकी प्रेतछाया से मुक्त नहीं हो सका है।भीमा भारती,रानी भारती,नवीन कुमार,गौरी शंकर पांडेय और राज्यपाल गोवर्धन दास के आस पास कहानी घूमती है। भ्रष्टाचार,हत्या,बलात्कार,जातीय संघर्ष,सत्ता की राजनीति विभत्स रुप में यहां दिखती है।बिहार को ओटीटी किस तरह से देखती है,यह इससे भी समझ सकते हैं कि तीन सीजन में पसरे इस सीरीज में एक भी ऐसा जनप्रतिनिधि दिखाने की जरुरत नहीं समझी जाती,जिसे देख लोकतंत्र के प्रति,बिहार की राजनीतिक चेतना के प्रति सम्मान हो,सब के सब बेईमान अपराधी,कोई नकली शराब की फेक्ट्री चला रहा तो,कोई औरतों का शौकीन। कभी होगा बिहार में जंगल राज,लेकिन बिहार का यह आखिरी सत्य नहीं,बिहार इसके अलावे भी है।लेकिन सिनेमा ने उसे बिहार की पहचान के साथ चस्पां कर देने की कोशिश की,यही कोशिश अब ओटीटी पर भी हो रही है।

शायद इसीलिए 20 साल से अधिक बीत जाने के बावजूद ओटीटी बिहार के उसी दौर में कहानियां खंगाल रही है।रंगबाज-डर की राजनीति में एक एक पात्र,एक एक घटना को आप पहचान सकते हैं। मुख्यपात्र कहने को साहेब हारुन शाह अली बेग हैं,लेकिन सीरीज यह समझाने में कहीं कोई कसर नहीं छोडती कि वह किसकी कहानी कह रही है।होगा कोई शहर जहां किसी अपराधी की तूती बोलती होगी,जिसने सरेआम तेजाब से नहला कर दो भाइयों की हत्या कर दी हो।एक पत्रकार को मार डाला हो।लेकिन यह भी सच है कि बिहार ही नहीं,किसी शहर की पहचान इतने भर ही तो नहीं होती।लेकिन ओटीटी इसी पर फोकस कर रही कि बाहर को जंगल राज के पीरिएड से निकलने ही नहीं दिया जाय।

खाकी-द बिहार चैप्टर भी उसी दौर की कहानी कहती है। हालांकि इन्हें कहानी कहा भी नहीं जा सकता क्योंकि सभी सत्य घटनाओं पर आधारित हैं।मतलब ओटीटी ऐसा कोई भ्रम नहीं छोडती कि आप इन कहानियों को बिहार का सच मान कर नहीं देखें।खाकी पुलिस अधिकारी अमित लोढा की किताब पर आधारित है,अमित अभी भी पुलिस सेवा में हैं।एक ड्राइवर से कुख्यात अपराधी और कई नरसंहारों के साथ जेलब्रेक जैसी घटना के सूत्रधार चंदन महतो यहां मुख्य पात्र के रुप में दिखता है।लेकिन आश्चर्य होता कि जब अमित अपनी पहचान नहीं छुपाते फिर चंदन की पहचान क्यों छुपा रहे,जबकि सभी दर्शक उसे पहचान रहे।यह सिर्फ अपराधी और पुलिस के टकराव की कहानी होती तो उतनी चिंता नहीं होती,जिस तरह एक अपराधी के लिए पूरी सत्ता,पूरा पुलिस महकमा लगा होता है,यह बिहार को अपनी पहचान से उबरने नहीं देता।

 आश्चर्य नहीं कि कोई ओटीटी गुल्लक लेकर बिहार नहीं आती। दूपहिया आती भी है,तो बगैर बिहार आए, बिहार की कथा सुना जाती।लोगों को गलत नहीं लगता कि सामान्य लोग यहां रहते ही नहीं,जो रहते हैं,या तो बाहुबली अपराधी,उनके सहयोगी या फिर उनके सताए।अपहरण,गंगाजल जैसी फिल्मों ने बिहार की जो छवि निर्मित की थी,आज ओटीटी  उसे थोडी और जीवंतता के साथ,थोडी और विश्वसनीयता के साथ मजबूत कर रही है।बिहार की पृष्ठभूमि पर निर्मित खाकी,रंगबाज या महारानी जैसे वेब सीरिज के माध्यम से किसी स्थान,किसी शहर को जानने समझने की कोशिश करे तो उसकी मूल पहचान की जगह कोई और ही सूरत दिखाई देती है। सीवान हो या शेखपुरा एक सामान्य शहर ही है,जहां कामकाजी मेहनतकश लोग भी रहते हैं,लडकियां कालेज भी जाती हैं,महिलाएं बाजार भी जाते हैं,बच्चे पार्कों में खेलने भी जाते हैं।लेकिन अधिकांश वेबसीरिज में जो बिहार इंगित कर दिखाए जाते हैं,लगता है वहां कोई सामान्य जनजीवन ही नहीं।

वास्तव में बिहार ने एक लंबा सफर तय किया है।राजनीति बदली है,शहर बदला है,गांव बदले हैं,तो लोग समाज भी बदला है।मुश्किल कि बिहार से गए फिल्मकार और लेखक भी इस बदलाव को रेखांकित करने की जरुरत नहीं महसूस कर रहे।