शुक्रवार, 15 मई 2020

लाकडाउन और हिंदी सिनेमा इंडस्ट्री




हिन्दी सिनेमा के इतिहास में 24 मार्च 2020 रोहित शेट्टी की फिल्म सूर्यवंशी की रिलीज के लिए भी याद की जा सकती थी। सिंघम, सिंघम रिटर्न और सिम्बा की सफलता के क्रम में यह उम्मीद की जा रही थी कि अजय देवगण, रणबीर सिंह और अक्षय कुमार अभिनीत उससे आगे की यह पुलिस कथा 2020 में सुस्त चल रही इंडस्ट्री के लिए संजीवनी होगी। फिल्म के रिलीज की सारी तैयारियां हो चुकी थी, ट्रेलर लांच हो चुके थे, रोहित शेट्टी प्रमोशन में अपने तीनों स्टार के साथ लगे हुए थे। कोई शक नहीं कि यह फिल्म 300 करोड से अधिक का व्यवसाय करने के लिए तैयार थी। लेकिन इंडस्ट्री की सारी उम्मीदें धरी की धरी रह गई, अफसोस की यह 24 मार्च 2020 अब हिंदी सिनेमा इंडस्ट्री के सबसे बडे ल़ाकडाउन की शुरुआत के लिए इतिहास में दर्ज हो गई।  
इसके पहले 21 मार्च को ही जब प्रधानमंत्री ने 14 घंटे के जनता कर्फ्यू के लिए लोगों से, जिसमें सिनेमा इंडस्ट्री भी शामिल थी, आग्रह किया तो उम्मीद की जाने लगी थी, कुछ बडे निर्णय की पूर्वपीठिका हो सकती है यह। लेकिन ऐसा लाकडाउन, जो कभी देखा, न सुना गया हो की उम्मीद तो शायद किसी को नहीं थी, सिनेमा इंडस्ट्री को भी नहीं। लाकडाउन के ठीक पहले बागी जैसी सफल सीरिज की तीसरी फिल्मबागी3 रिलीज हुई थी, इरफान खान की आखिरी फिल्म अंग्रेजी मीडियम, जिसे उन्होंने लंबी जानलेवा बीमारी से रिकवर होने के बाद पूरा किया था, दोनों ही फिल्मों से अच्छे खासे व्यवसाय की उम्मीद थी। बागी सीरिज की पहली दोनों ही फिल्मों ने 100 करोड से अधिक की कमाई की थी, लाकडाउन की अफरा तफरी के बावजूद 5 दिनों में 97 करोड की कमाई इसके बडे बिजनेस का आज भी इशारा करती है।अंग्रेजी मीडियम तो सही से अपना खाता भी शुरु नहीं कर पाई।
पहला लाकडाउन 14 अप्रेल तक घोषित था, जाहिर था इंडस्ट्री को उम्मीद थी कि इसके बाद सब पहले का तरह हो जाएगा। इसी समय कार्तिक आर्यन ने लाकडाउन के प्रति आमलोगों को सचेत करते हुए एक महत्वपूर्ण वीडियो जारी किया था। इसके बाद कई अभिनेताओं ने उत्साह में अपने अपने वीडियो संदेश जारी किए। लेकिन उसके बाद लाकडाउन 2 और फिर 3 ने इंडस्ट्री के सारे उत्साह और उम्मीदों को कमजोर कर दिया। साल के पहले दो महिने में लगभग 40 फिल्में रिलीज हुई थी, इसमें से सिर्फ एक फिल्म अजय देवगण की तान्हा जी लगभग 300 करोड के व्यवसाय के साथ हिट मानी गई,जबकि बीते वर्ष 17 फिल्मों ने 100 करोड से अधिक की कमाई कर इंडस्ट्री की उम्मीदें बढा दी थी। जाहिर है इंडस्ट्री इस वर्ष सफलता के लिए थोडी बेचैन थी। हिन्दी सिनेमा इंडस्ट्री की स्थिति कमोबेश दिहाडी मजदूरों सी है। बातें यहां भले ही सौ करोड से कम की नहीं होती हो, सच यही है कि इस सौ करोड के लिए इसे रोज कमाई करनी पडती है, वह भी सौ पचास कर। देश भर में हरेक दिन हरेक दर्शक से आए पैसे से इसके लाभ हानि का हिसाब तैयार होता है, इसीलिए एक दिन के लिए भी बाक्स आफिस का बंद हो जाना इंडस्ट्री के लिए बडा धक्का होता है।
स्वभाविक है विषम से विषम परिस्थिति में भी इंडस्ट्री इस नियति से बचने की कोशिश करती है। लेकिन यह भी सच है कि इस तरह का भले ही नहीं, सिनेमा घरों का बंद होना और शूटिंग का ठप होना इंडस्ट्री ने पहले भी देखे हैं। 2008 मे अपने पारिश्रमिक बढाने और सेवा शर्तों की मांग को लेकर इंडस्ट्री में काम करने वाले लगभग डेढ लाख वर्कर जिनमें स्पाट व्वाय,लाइटमैन,मेकअपमैन से लेकर एक्स्ट्रा कलाकार तक थे, हडताल पर चले गए थे, तो कई दिनों तक फिल्मों और टेलिविजन धारावाहिकों की शूटिंग बंद हो गई थी। कहते हैं बीते 50 सालों में हिंदी सिनेमा इंडस्ट्री की सबसे बडी हडताल थी वह।
ऐसा ही एक मौका 2009 में आया जब कमीशन की मांग को लेकर मल्टीप्लेक्स मालिकों और प्रोड्यूसरों के बीच ठन गई थी। देश के अधिकांश मल्टीप्लेक्स में नई रिलीज बंद हो गई थी। उस समय भी कल किसने देखा, जश्न और न्यूयार्क जैसी फिल्मों की रिलीज टल गई थी। बंदी का एक स्वाद इंडस्ट्री ने 2018 में चखा, जब देश भर के कई राज्यों में स्थानीय निकायों को इंटरटेनमेंट टैक्स लगाने का अधिकार दे दिया गया था। इसकेविरोध में कई राज्यों में तमाम सिनेमाघरों ने अपने शटर गिरा दिए। इसी बंदी मे ठग्स आफ हिंदुस्तान जैसी कई फिल्मों की रिलीज डेट आगे बढानी पडी थी।लेकिन यह भी सच है यह लाकडाउन इन हडतालों या बंद से अलग है। व्यवसाय दोनों में बाधित हुआ, लेकिन वह बंदी अपने नियंत्रण की थी, अपने अधिकार के लिए थी, अपनी इच्छा से थी, यह बंदी किसी के नियंत्रण में नहीं, यह कब समाप्त होगा, किसी को पता नहीं। समाप्त होगा, उसके बाद भी इंडस्ट्री पहले की तरह अपने ढर्रे पर लौट पाएगी, कुछ भी किसी के भी सामने स्पष्ट नहीं। जाहिर है जैसे जैसे समय बीतता जा रहा,इंडस्ट्री से जुडे लोगों के माथे पर लकीरें गहरी होती जा रही हैं।
इस लाकडाउन का इंडस्ट्री में सबसे सीधा नुक्शान यदि किसी को झेलना पडा तो वे यहां के वर्कर हैं। वही स्पाट ब्वाय, लाइटमैन, कारपेंटर से लेकर मेकअपमैन सहायक और एक्स्ट्रा तक। इनकी संख्या लाखों में हैं जिनके घर के चुल्हे स्टूडियों में लाइट साउंड के बाद जलते हैं। यह जरुर है कि उनकी मदद के लिए सलमान खान जैसे कई सितारे आगे आए, लेकिन मेहनताना की जगह मदद कभी नहीं ले सकती। लाकडाउन के कारण सिनेमा घर भी बंद हैं, देश में सिनेमा घरों की कुल संख्या लगभग 9 हजार है, जिसमें 3 हजार के करीब मल्टी प्लेक्स हैं। अब इन सिनेमा घरों और मल्टीप्लेक्स से जुडे कामगरों को देखें तो माना जाता है इनकी संख्या लगभग 5 लाख होगी, जो आज अपने मालिक के रहम पर हैं। कल इनकी नौकरी रहेगी,या नहीं अपने भविष्य से पीरी तरह अनिश्चित। यदि सिनेमा घरों पर आश्रित पार्किंग, काफी शाप,पापकार्न के व्यवसाय से जुडे लोगों को भी जोड लें तो प्रभावितों की संख्या और भी बडी हो सकती है। लाकडाउन का एक प्रभाव तो यह है,लेकिन इसे उस बडे प्रभाव के एक अंश के रुप में देखा जाना चाहिए, जिससे उबरना इंडस्ट्री के लिए आसान नहीं होगा।
हिंदी सिनेमा की औसत कमाई महिने में 4 से 5 सौ करोड तक की मानी जाती है। यदि ओवर सीज बिजनेस को जोड दें तो यह आंकडा और भी बडा हो सकता है। अभीतक के अनुमान के अनुसार एक छोटी सी अनियोजित इंडस्ट्री के लिए हजार करोड के नुक्शान की भरपाई आसान नहीं मानी जा सकती। रोहित शेट्टी की सूर्यवंशी 100 करोड से अधिक की लागत से बनकर तैयार पडी है, इस तरह पूंजी का जाम होना व्यवसाय ही नहीं, सिनेमा की रचनात्मकता के लिए धक्का होगा। आखिर जब तक पुरानी फिल्म सामने पडी है, नई फिल्म पर कोई कैसे काम कर  सकता, और किस उम्मीद पर काम शुरु कर सकता है, इंडस्ट्री में वैसे भी पूंजी रोटेट होती है। यदि मार्च,अप्रेल,मई की बात करें तो सूर्यवंशी के अतिरिक्त एक और महत्वपूर्ण फिल्म प्रतिक्षित थी कबीर खान की 83, भारत के क्रिकेट विश्व कप में विजय पर एक महत्वपूर्ण फिल्म मानी जा रही यह,जिसमें रणबीर सिंह ने कपिलदेव की भूमिका निभायी है। इसी के साथ यशराज फिल्म्स की संदीप और पिंकी फरार,हाथी मेरे साथी के रिलीज की तारीख भी अप्रेल में तय मानी जा रही थी। इसी लाकडाउन के दौरान अमिताभ बच्चन की गुलाबो सिताबो,अभिषेक बच्चन की लूडो, जाह्न्वी कपूर की गुंजन सक्सेना भी रिलीज होनी थी। इसके अलावे भी कई फिल्में हैं जो अपनी पूरी पूंजी समेट कर लाकडाउन के इंतजार में रुकी है। ऐसे में यह कहना मन को बहलाना ही होगा कि लाकडाउन खत्म होते ही हिंदी सिनेमा अपने पुराने रौ में आ जाएगी।
लाकडाउन के कारण जहां फिल्मों की रिलीज रुकी, वहीं कई फिल्मों की शूटिंग भी कैंसिल करनी पडी। करण जौहर की ऐतिहासिक कथानक पर बन रही तख्त के लिए यूरोप में शिड्यूल तय था, अप्रेल में शूटिंग शुरु होनी थी, जिसके लिए भव्य सेट तक तैयार कर लिए गए थे। इस एक फिल्म की शूटिंग रुकने से इंडस्ट्री को 100 करोड तक के नुक्शान की उम्मीद की जा सकती है।ऐतिहासिक सेट को हटाना और फिर बनाना,दोनों ही बडे खर्च की मांग करते हैं। जयललिता के जीवन पर बन रही फिल्म थलाइवी की शूटिंग तमिलनाडु में शुरु हो गई थी,लेकिन अचानक सब समेट कर कंगना को मुंबई वापस लौटना पडा। इस तरह की कई फिल्मों के प्रोडक्शन और पोस्ट प्रोडक्शन के स्थगित हो जाने से हो सकता है कई फिल्म इस घाटे से ऊबर ही नहीं सके, और प्रोजेक्ट बंद कर देना पडे।
अब चिंता लाकडाउन से अधिक इसके भविष्य को लेकर हो रही। क्या जब कभी भी लाकडाउन खत्म होगा,सिनेमा घर उसी तरह सक्रिय हो सकेंगे,शूटिंग उसी तरह शुरु हो सकेगी। अभी की स्थिति से यह स्पष्ट लग रहा है कि स्थिति को सामान्य होने में एक वर्ष से भी अधिक लग सकते हैं। अभी लाकडाउन के बाद सिनेमाघर खोलने की अनुमति मिलेगी भी तो जाहिर है कई सारी शर्तों के साथ, अब उतनी शर्तों के साथ कितने दर्शक सिनेमाघर तक पहुंचने की जहमत उठाएंगे, यह भी एक बडा सवाल है।सिनेमा कभी आवश्यक आवश्यकता तो रही नहीं कि लोग मास्क,सेनिटाइजर और सोशल डिस्टेंसिंग का अनुपालन करते हुए सिनेमाघर आने को तैयार हों। आश्चर्य नहीं कि सिनेमा ने खतरे को भांपते हुए विकल्प ढूंढने की शुरुआत कर दी है।
ईद का त्योहार जो आमतौर पर सलमान खान के लिए सुरक्षित रहता है, इस साल भी ईद 22 मई को सलमान खान की राधे की रिलीज शिड्यूल थी,और सलमान की फिल्म का व्यवसाय हमेशा ही उम्मीद से अधिक रहता रहा है।राधे के 300 करोड से अधिक के व्यवसाय में कोई शक ही नहीं किया जा सकता था,लेकिन अब बदलते हालात में इसके डिजीटल प्लेटफार्म पर रिलीज की खबरें आ रही हैं। 500 करोड की संभावना भले ही नहीं हो,माना जा रहा है कि राधे के लिए 300 करोड तक दिया जा सकता है, जो निश्चय ही सिनेमा के लिए एक बडे द्वार खोलने की संभावना को मजबूत कर रहा। हो सकता है लाकडाउन के बाद रिलीज की प्रतीक्षा में कई रुकी हुई फिल्में डिजीटल रिलीज के लिए तैयार हो सके।
जो फिल्में तैयार हैं उनके बारे में तो नहीं कहा जा सकता, लेकिन सिनेमा देखने के साधन बदलेंगे तो उसके अनुसार सिनेमा को भी बदलना ही होगा। तख्त जैसी फिल्म जिस भव्यता के साथ 70 एम एम के लिए बन सकती, डिजीटल के छोटे स्क्रीन में वह प्रभावहीन हो जा सकता है, ऐसे में सिनेमा को भी वेबसीरिज की तरह अपने को छोटे स्क्रीन के अनुरुप बदलने की शुरुआत करनी पडेगी। हालांकि सिनेमा के परदे पर जिस लार्जर दैन लाइफ को देखने की दर्शकों को आदत लगी है,वह किस हद तक मोबाइल के 6 इंच के स्क्रीन पर स्वीकार्य होगी, देखना दिलचस्प होगा। जैसा कि देखा जा रहा है यह भी यह सकता है कि सिनेमा का विकल्प वेबसिरीज में ढूंढने की नई सिरे से इंडस्ट्री शुरुआत कर दे। आज यूं भी मनोज वाजपेई, पंकज त्रिपाठी, नवाजुद्दीन सिद्दीकी, सेफ अली खान, इमरान हाशमी, विवेक ओबेराय, राधिका आप्टे जैसे मेनस्ट्रीम कलाकार निःसंकोच वेबसीरिज में काम कर रहे हैं। अनुराग कश्यप तो पहले ही डिजीटल को स्वीकार कर चुके, अब कबीर खान,शिरीष कुंदर,विक्रम भट्ट जैसे सफल निर्देशक भी वेबसीरिज लेकर आ रहे हैं। जाहिर है नए माध्यम के लिए सिनेमा को तैयार होने में अधिक मुश्किल नहीं हो सकती।
जिस तरह की शर्तों के साथ लाकडाउन समाप्त हो भी रहे हैं, उससे यह भी स्पष्ट है कि सितारों को अपने फैंस से मिलने का लोभ पर सब्र रखना पडेगा। अमिताभ बच्चन ने 1982 से जलसा पर हरेक रविवार अपने फैंस के सामने आने की शुरुआत की थी, लेकिन कोरोना की गंभीरता को महसूस करते हुए 15 मार्च से ही आपने फैंस से मिलना बंद कर दिया है। अमिताभ की ही तरह अब कोई भी स्टार अपने फैंस के सामने आने का जोखिम नहीं उठा रहे। जाहिर है इससे फिल्मों के प्रमोशन के तरीके बदल जाएंगे।अब सबकुछ वर्चुअल दुनिया में शिफ्ट हो जा सकता है। ट्वीटर पर ही फैंस से बातें होगी और फेसबुक लाइव पर मुलाकातें। लेकिन इसका एक बडा नुक्शान यह होगा कि सितारों के लाइव शो बंद हो जाएंगे,उनके इंटरनेशनल टूर और विभिन्न कार्यक्रमों में शामिल होने भर से जो बडी फी उन्हें मिलती थी,वह पूरी तरह बंद हो जाएगी,जिससे अंततः इंडस्ट्री ही प्रभावित होगी।
लाइव शो स्थगित होने से निश्चित रुप से सैक़डों की संख्या में अवार्ड शो भी प्रभावित होंगे। लाकडाउन के ठीक पहले एक अवार्ड इवेंट बगैर रियल दर्शकों के सिर्फ टेलीविजन कैमरे के लिए संपन्न हुआ।
एक और परिवर्तन जिसके लिए इंडस्ट्री और फैंस को तैयार रहना चाहिए, फिल्म फेस्टिवल पूरी तरह बंद हो जा सकते हैं। क्योंकि फेस्टिवल की परंपरा ही इंडस्ट्री से जुडे दुनियया भर के लोगों से मिलने के लिए शुरु की गई थी,अब जब सबसे बडा खतरा मुलाकातों में ही हो तो कैसे फेस्टिवल हो सकते हैं।करोना के कारण कांस फिल्म फेस्टिवल के भी रद्द होने की खबरें आ रही हैं।12 से 23 मई को फ्रांस में इस फेस्टिवल का आयोजन प्रस्तित था। कहते हैं 52 साल के इतिहास में यह पहली बार होगा जब कांस फेस्टिवल आयोजित नहीं होगा। 1939 में इस फेस्टिवल की शुरुआत हुई थी,द्वितीय विश्व युद्ध के समय एक स्क्रीनिंग के बाद इसे रद्द करने का निर्णय लिया गया था।1968 में कुछ फिल्मकारों के नेतृत्व में प्रदर्शन के कारण इसे एक लप्ताह पहले समाप्त करना पडा था।
हालांकि यह भी सच है कि ये सारी कल्पना आज की स्थिति की गंभीरता को देखते हुए की जा रही है। यह भी हो सकता है कि जिस तरह प्लेग और विभिन्न महामिरियों पर दुनिया ने विजय पायी है,इस कोरोना पर भी हम विजय हासिल कर लें,और एक सामान्य दुनिया एक बार फिर हमारे सामने हो।जिसमें सिनेमा भी हो, सितारे भी हों, फैंस भी हो, लाइव शो भी, फेस्टिल भी, पापकार्न भी हो, कोल्डड्रिंक भी...।आमीन।

हिंदी सिनेमा में परिवार




यदि परिवार न होता तो भारत में सिनेमा की नींव ही न पडी होती। यह सुनने में थोडा अटपटा अवश्य लगे लेकिन दादा साहब फाल्के के जीवन पर बनी मराठी फिल्म फिल्म हरिश्चंद्रायाची फैक्टरी देखने के बाद इस सच्चाई पर विश्वास करने में कोई शंका नहीं रह जाती। देश को पहला सिनेमा देने के लिए दादा साहब के साथ उनके परिवार का एक एक सदस्य खडा दिखता है।उनकी पत्नी,उनके बच्चे,उनके रिश्तेदार..यहां तक कि जब धन जुटाने के लिए घर का एक एक सामान वे बेच देते हैं तब भी उनका परिवार उनके साथ खडा रहता है।  स्वभाविक है परिवार की नींव पर खडे हुए सिनेमा के लिए विषय के स्तर पर भी परिवार का चयन सबसे सुरक्षित माना जाता रहा। 70 के दशक में जब छोटे कस्बों में रिक्शे पर सिनेमा के प्रचार हुए करते थे,तब भी हरेक फिल्म के साथ महान पारिवारिक फिल्म कहने से नहीं चूका जाता था। दारा सिंह तक की फिल्म के लिए कहा जाता था,मारधाड सीन शिनहरी से भरपूर महान पारिवारिक फिल्म...। परिवार भारतीय समाज में ताकत का प्रतीक रहा है,यह उस विश्वास को प्रदर्शित करता रहा है कि परिवार साथ है तो हर संकट का सामना किया जा सकता है। वक्त जैसी फिल्म में एक भरेपूरे परिवार को भूकंप बर्बाद कर देता,लेकिन यही परिवार फिर एक होकर खडा होता है। 2006 में आयी राजकुमार संतोषी की फेमिली में भी परिवार की इस ताकत का अहसास किया जा सकता है।2018 में वरुण धवन,अनुष्का की सुई धागा में पूरा समाज ही एक परिवार की तरह खडा होता है, और अपने गृह उद्योग की रक्षा करता है।
आश्चर्य नहीं कि दिलीप कुमार,राजेन्द्र कुमार,शशि कपूर,धर्मेन्द्र,जीतेन्द्र से लेकर राजेश खन्ना तक की सफलता की कहानी उनके द्वारा अभिनीत पारिवारिक फिल्मों के साथ पूरी होती है। राजेश खन्ना की लोकप्रियता की सबसे बडी वजह ही यही माना जाती है  वे उस दौर में फिल्मों में परिवार लेकर आ रहे थे, जब भारतीय समाज एकल परिवार की ओर बढ रहा था। आराधना, कटी पतंग, दो रास्ते, शहजादा, दुश्मन,बावर्ची जैसी कई फिल्में थी जिनमें परिवार के बीच ही समस्याएं खडी होती थी, और परिवार के बीच ही रोते गाते सुलझा ली जाती थी। इन फिल्मों में पात्रों के साथ दर्शक रोते भी थे और हंसते भी थे। 80-90 के दशक में खासकर जीतेन्द्र के साथ प्यासा सावन और जुदाई जैसी दक्षिण भारतीय फिल्मों की एक बडी खेप आयी, जिसमें परिवार को पूरे मेलोड्रामेटिक अंदाज में प्रस्तुत किया जा रहा था। ऐसी फिल्मों की महिला दर्शकों ने जमकर सराहना की और फिर उस दौर में परिवार,घर परिवार,स्वर्ग से सुंदर,बडे घर की बेटी,अमृत जैसी कई फिल्में आयीं। यह नहीं भूल सकते कि इसी दौर में सुखी परिवार की तलाश में बेचैन विद्रोही नायक की छवि के साथ अमिताभ बच्चन भी आए।
ये भी आश्चर्य कि जिस अमिताभ के आने से हिंदी सिनेमा में परिवार के बिखरने की शुरुआत हुई, उसी अमिताभ ने बागबान के साथ परिवार को नए सिरे से परिभाषित भी करने की शुरुआत की। बाद में पीकू जैसी फिल्म के साथ परिवार सिकुडता भले ही चला गया,परिवार की बांडिंग किसी न किसी रुप में दिखती रही। वास्तव में आमतौर परदे पर हम अपने सपने को साकार होते देखना चाहते हैं, परिवार हमारे पास न हो, हमारे नास्टेलजिया में परिवार रहा है,शायद इसीलिए हम आपके हैं कौन, विवाह और कभी खुशी कभी गम की तरह परिवार के बीच विचरती लगभग हरेक फिल्म के प्रति दर्शकों की कमजोरी दिखती रही।
अफसोस अब सिनेमा उन हाथों में हैं जिन्होंने परिवार देखा ही नहीं।इनके नास्टेलजिया में भी परिवार नहीं है।जाहिर है सिनेमा में अब व्यक्ति दिखते, व्यक्ति का अहं दिखता,बहाने कुछ भी हो,परिवार नहीं दिखता, परिवार की ताकत नहीं दिखता।

रविवार, 11 अगस्त 2019

ये कश्मीर है,ये कश्मीर है....


कितनी खूबसूरत ये तस्वीर है
मौसम बेमिसाल बेनजीर है
ये कश्मीर है,ये कश्मीर है...
1982 में रिलीज हुई अमिताभ बच्चन और राखी अभिनीत बेमिसाल का यह गीत हिन्दी सिनेमा का कश्मीर के प्रति कायम समझ को शब्द देती लगती है।कश्मीर मतलब खूबसूरती,कश्मीर मतलब डल लेक,कश्मीर मतलब हाउस बोट और शिकारे।आश्चर्य नहीं कि लगभग तीन दशकों तक कश्मीर हिंदी सिनेमा के लिए खूबसूरती का पर्याय बना रहा।प्रेम कहानियां कश्मीर में जाकर ही पूरी होती थी,पूरी फिल्म न सही एकाध गाने तो कश्मीर में होने हीचाहिए। देवदार के जंगल,सेव के बाग,रंगबिरंगे फूलों की बहार,सफेद उंचे बर्फीले पहाड,नीला चमकता आसमान ...प्रेम कहानियों के लिए कश्मीर में बस होना ही काफी होता था।
1964 में बनी कश्मीर की कली तो सबों को याद है,कितनी सहजता से यह टाइटिल स्वीकार किया गया था।फिल्म बडी हिट हुई,इसके गाने आज भी सुने जाते हैं। बात परस्पर विश्वास की है,आज ऐसे टाइटिल सोचे भी नहीं जा सकते खैर,यह याद करना मुश्किल है कि कश्मीर में शूट होने वाली पहली फिल्म कौन सी थी।यह अवश्य है कि 1963 में रामानंद सागर की आरजू में कश्मीर की खूबसूरती को हिंदी दर्शकों ने पहली बार अहसास किया।ए फूलों की रानी, बहारों की मलिका,तेरा मुस्कुराना गजब हो गया... के बैकग्राउंड में झांकती कश्मीर की खूबसूरती गीत के प्रभाव को दूना कर देती है।यह प्रेम कहानियों का दौर था,शम्मी कपूर खिलंदडे नायक के रुप में शीर्ष पर थे,उनकी अठखेलियों के लिए कश्मीर से बेहतर जगह नहीं हो सकती थी।याहू की गूंज के साथ बर्फ की पहाडियों पर जब  फिसलते थे तो कश्मीर जैसे लाइव हो उठता था।जंगली,जानवर,कश्मीर की कली जैसी न जाने कितनी फिल्में कश्मीर की खूबसूरती के दस्तावेज के रुप में देखी जा सकती हैं। यह कश्मीर की खूबसूरती का ही कमाल था कि दर्शक बार बार एक ही दृश्य बार बार देखते लेकिन उनका जी नहीं भरता। लेकिन यह भी सच है कि हिंदी सिनेमा में कश्मीर का उपयोग मात्र दृश्यात्मकता के लिए हो रहा था,न तो कश्मीर कहानी का हिस्सा बन पा रही थी, न ही कश्मीर का जन जीवन संस्कृति को जगह मिल पा रही थी।
ऐसे में शशि कपूर की जब जब फूल खिले प्रेम के मिठास में पगी होने के बावजूद एक अलग आस्वाद की याद दिलाती है।एक अमीर टूरिस्ट और एक शिकारे वाले के बीच पनपती प्रेमकथा के बीच दर्शकों ने वहां के जीवन को भी झांकते देखा था।उनके जीवन के संघर्ष भले ही कहानी के हिस्सा नहीं थे,उनकी गरीबी कश्मीर की खूबसूरती के पीछे की कलई अवश्य एक सीमा तक खोलती लगती थी।टूरिस्ट नायिका को घोडे पर ले जाते नायक का यह गुनगुनाना ...एक था गुल और एक थी बुलबुल...कहीं न कहीं तीसरी कसम की तरह कश्मीर की लोकगाथा से जोडने की एक कोशिश लगती थी।महत्वपूर्ण यह कि शिकारे वाले और अमीर पर्यटक की इस प्रेमकथा में अमीरी गरीबी मुद्दा बनती थी,कश्मीरी होना मुद्दा नहीं था। वह 1964 था, आज कश्मीर का प्रतीक धर्म हो गया है,यह वह समय था जब कश्मीर सिर्फ कश्मीर के रुप में जाना जाता था।
यह वह दौर था जब कश्मीर की पृष्ठभूमि पर फिल्में  सोची जाती थी,लिखी जाती थी और कश्मीर में ही शूट की जाती थी।कहा जाता है कश्मीर की फील पटकथा में लाने के लिए फिल्म के पटकथा लेखक और गीतकारों को खास तौर पर कश्मीर भेजा जाता था। लेकिन यह भी कमाल है कि फिल्मों में कश्मीर तो दिखता था,कशमीरी नहीं दिखते थे।शायद यह हिन्दी सिनेमा की सीमा भी रही है।कश्मीर की पवित्र वादियां पवित्र प्रेम कहानियों के लिए 84-85 तक आकर्षित करती रही।सन्नी देओल की लांचिंग के लिए बेताब की तैयारी शुरु हुई।एक अमीर बिगडैल लडकी और सीधे साधे किसान लडके की प्रेमकथा।राहुल रवेल इस कहानी को पहलगाम लेकर चले गए।बेताब के पिक्चर पोस्टकार्ड जैसे दृश्य आज भी कश्मीर की एक अलग ही छवि बयान करते हैं।आज भी पहलगाम की वह घाटी बेताब वैली के नाम से पर्यटकों को खास तौर पर दिखाई जाती है।
वास्तव में सिनेमा की शूटिंग किसी क्षेत्र का स्वरुप तभी तक नहीं बदलती जब तक शूटिंग  चल रही होती है,वर्षों वर्ष उसका प्रभा कायम रहता है।आखिर कोई तो कारण है कि स्वीटजरलैंड में झील और सडक यश चोपडा के नाम पर कर उन्हें सम्मानित किया जाता है। किसी फिल्म की शूटिंग जब तक चल रही होती है तब तक तो स्थानीय व्यापार को लाभ मिलता ही है।फिल्म बन जाने के बाद ह पर्यटन उद्योग के लिए बगैर कहे ब्रांड एम्बेस्डर का काम करती है।यश चोपडा की मल्टीस्टारर कभी कभी भी मुख्य रुप से कश्मीर में शूट हुई थी। अमिताभ बच्चन राखी या फिर ऋषि कपूर नीतू सिंह के साथ कश्मीर जिस तरह लुभाता था,आंकडे बता सकते हैं कि कभी कभी से कश्मीर के पर्यटन को कितना लाभ हुआ होगा।यहां राजकपूर की अलहदा फिल्म बाबी को भी नहीं भूला जा सकता।पता नहीं कितने किशोर 75-76 में स्कूल बैग में कपडे रख हम तुम एक कमरे में बंद हो...’ वाला काटेज ढूंढने निकल गए थे।यह वह समय था जब सिनेमा के लिए खूबसूरती का पर्याय कश्मीर था।निश्चित रुप से सिनेमा में एक बडा संसाधन इन्वाल्व होता है,किसी फिल्मकार को सिर्फ खूबसूरती आकर्षित नहीं कर सकती।यश चोपडा यदि स्वीटजरलैंडके प्रति आकर्षित थे तो वजह वहां की खूबसूरती को साथ वहां मिलने वाली सहुलियते भी थी।आश्चर्य नहीं कि हिंदी सिनेमा में एक दौर वह भी आया जब कश्मीर कीतरह कोई भी फिल्म स्वीटजरलैंड के बगैर पूरी नहीं होती थी।मतलब स्पष्ट है कि यदि तीन दशकों तक कश्मीर हिंदी सिनेमा का सबसे प्रिय लोकेशन रहा तो इसकी वजह वहां मिलने वाली सहुलियते,सहयोग और सुविधाएं भी रही होंगी।एक बडे क्रू के साथ बेताब जैसी बडी फिल्म की पूरी शूटिंग बगैर स्थानीय सहयोग के संभव हो ही नहीं सकती।किनका सहयोग मिलता था,कश्मीरयों का।क्यों..शायद इसलिए कि तब तक उन्हें अहसास नहीं कराया जाता था कि ये हिन्दुस्तानी हैं और तुम कश्मीरी हो।
तस्वीर बदली 1990 से,जब घाटी में आतंकवाद ने अपनी दखल बढाने की शुरुआत की।घाटी के सीधे शीधे लोग पीछे हटते गए और बंदूक के बल पर आतंकवादी क्मीर की सांसों को अपने नियंत्रण में लेते चले गए।कभी समय था जब कश्मीर में 19 सिनेमाघर थे,अकेले श्रीनगर में  11 सिनेमाघर थे,जहां कालेज की लडकियां ग्रुप बना कर सिनेमा देखने जाया करती थी।ये सिनेमाघर किसी न किसी रुप में शेष भारत की सांस्कृतिक हलचल,संवेदना से भी कश्मीर को जोडे रखने का काम करती थी।जाहिर है धर्म के बहाने आतंकवादियों ने सबसे पहली चोट सिनेमाघरों पर की।एक आदेश से सारे सिनेमाघर बंद करवा दिए गए। नेमा देखना धर्मविरोधी करार दिया गया।1999 में सरकार की कोशिशों से सिनेमाघर फिर से कलने की कोशिश की गयीं तो बयानक हमला कर दर्शकों को निशाना बनाया गया।हालात बिगडे तो सिनेमा भी कश्मीर के विकल्प की तलाश में विदेशों की ओर मुड गई।फिल्मकारों की यह मजबूरी थी और आतंकवादियों की सफलता कि शेष भारत से बने इस सांस्कृतिक पुल को उसने ध्वस्त कर दिया था।
कश्मीर का यह बदला स्वरुप लंबे अंतराल के बाद दिखा 1992 की तमिल फिल्म रोजा में,जो बाद में कई भाषाओं में डब होकर आयीं और बदलते कश्मीर को रेखांकित करने में सफल रही।रोजा की सफलता से उत्साहित मणिरत्नम ने 1998 में फिर हिंदी में शाहरुख खान को लेकर दिल से बनायी।कश्मीर के दहकते आतंकवाद के बीच प्रेम की यह संवेदनशील कहानी चली तो नहीं,लेकिन चल छैयां छैयां..जबान पर चढ कश्मीर की याद आज भी दिलाती है।यह भी अजीब है कि जब परदे पर कश्मीर का दिखना बंद हो गया तो कश्मीर की कहानियां दिखने लगी। मिशन कश्मीर, यहां, एल ओ सी कारगिल, लक्ष्य और फिर हैदर। आतंकवाद की पृष्ठभूमि पर बनी इस तरह की अधिकांश फिल्मों में कश्मीर की कोमलता की जगह बारुद का ढेर दिखता था।इनमें से कितनी झूठ और कितनी सच थी,यह तो समय तय करेगा।लेकिन यह भी सच है कि अपनी संवेदना के अनुरुप इस तरह की विषय पर बनी अधिकांश फिल्मों में आतंकवाद को जस्टिफाई और ग्लोरीफाई करने की कोशिश की गई।यश चोपडा फना जैसी प्रेमकथा में कश्मीर के मामले पर जनमत संग्रह की बात करते हैं,वह भी सिर्फ भारतीय हिस्से में।वे आतंकवाद को कश्मीर की आजादी की लडाई के रुप में स्थापित करते हैं।
अब जब कश्मीर 370 की सीमा से आजाद हो गया है हम विश्वास कर सकते हैं बडे परदे के लिए आतंकवाद की कहानिया इतिहास बन जाएगी और फिर एक बार हम देख सकेंगे,सुन सकेंगे..
साथी ये हमारी तकदीर है
कितनी खूबसूरत ये कश्मीर है


परदे पर लद्दाख
2009 में आयी थ्री इडियट  देश की शिक्षा व्यवस्था को प्रभावित करने में कितना सफल रही यह तो राम जाने लेकिन यह निःसंदेह कहा जा सकता है कि लद्दाख को आम भारतीयों के आकर्षण के केन्द्र में ला दिया।यह है सिनेमा की ताकत जिस झील  के किनारे थ्री इडियट का क्लाइमेक्स फिल्माया गया था,वहां साल में 4 लाख से अधिक पर्यटक पहुंच रहे हैं।करीना कपूर का वह पीला स्कूटर अभी भी वहां है जिस पर बैठ लोग तस्वीरें लेते हैं। थ्री इडियट में दिखती लद्दाख की निश्छल खूबसूरती  नए की तलाश में भटकती हिन्दी सिनेमा के लिए भी आकर्षण का केन्द्र बनी और ट्यूबलाइट जैसी बडी फिल्म के साथ सलमान पहुंचे।इसके पहले पूजा भट्ट को लद्धाख में शूटिंग का श्रेय जाता है जिन्होंने अपनी पहली फिल्म पाप की पूरी शूटिंग लद्दाख को मोनेस्ट्री और पहाडियों में की।शाहरुख खान यश चोपडा की जब तक जान हैं को लेकर लद्दाख पहुंचे थे।उल्लेखनीय है कि आज लद्दाख की पहचान सिर्फ शूटिंग लोकेशन के रुप में नहीं,सिनेमा में सार्थक हस्तक्षेप के लिए भी है।वहां के या फिल्मकार अपने सीमित संसाधनों में अपने लोगों के साथ फिल्म बनाकर राष्ट्रीय पहचान दर्ज कर रहे हैं,यहां बीते वर्ष सर्वश्रेष्ठ फिल्म के रास्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित वाकिंग विद द विंड का स्मरण स्वभाविक है।बीते कई वर्षों से आयोजित होने वाला लद्दाखी फिल्म फेस्टिल में देश और दुनिया के नामचीन फिल्मकार शिरकत कर रहे हैं।इसे दुनिया में सबसे अधिक उंचाई पर होने वाला फिल्म फेस्टिवल माना जा रहा है। अब जबकि लद्दाख को एक अलग केंन्द्र शासित प्रदेश बनाने का निर्णय लिया जा चुका है,निश्चित रुप से सिनेमा में एक प्रभावशाली हस्तक्षेप के लिए हमें ज्यादा प्रतीक्षा नहीं करनी पडेगी।