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गुरुवार, 2 अगस्त 2012

आदर्श नायक के प्रतिरुप रहे राजेश खन्ना




अपनी उम्र 9 साल की रही होगी जब राजेश खन्ना की अपना देश रीलिज हुई थी। इस समय सिनेमा यूं ही नहीं देखा जाता था,सिनेमा देखने के लिए कारणों की तलाश की जाती थी, फिर उसके लिए बकायदा घर से इजाजत लेनी पडती थी। ये अलग बात है कि इजाजत नहीं मिलने पर भी जान जोखिम में डाल कर लोग अपने पसंद की फिल्में देख ही लिया करते थे। सिनेमा देखना आसान उस समय, इसलिए भी नहीं होता था कि मध्यवर्ग के पास इतने पैसे ही नहीं होते थे कि उसे उदारता से खर्च कर सके।ऐसे में याद है मुझे, गांव से आए चाचा ने मां से मुझे साथ लेकर अपना देश दिखाने की इजाजत मांगी थी। चाचा ने न तो उसके पहले कोई फिल्म मुझे साथ लेकर देखी,न ही उसके बाद। अपना देश देखने और भतीजे को दिखाने की वजह थी, फिल्म का गीत ,रोना कभी नहीं रोना,चाहे टूट जाये कोई खिलौना.....।अपना देश में राजेश खन्ना चाचा बने थे जो अपने भतीजे को कंधे पर बिठा ये गीत गाते हैँ।फिल्म में भी भतीजे की उम्र लगभग मेरे बराबर की ही होगी। आज मैं अहसास कर सकता हूं कि परदे पर चाचा भतीजे के आदर्श दिखते संबंधों में शायद मेरे चाचा अपने संबंधों को ढूंढने की कोशिश कर रहे होंगे। आश्चर्य कि आज भी जब अपना देश का वह गीत मेरे सामने आता है चाचा की याद आ जाती है। वास्तव में यही थी राजेश खन्ना की सबसे बडी ताकत जिसने हिन्दी सिनेमा के नायकों की परिभाषा बदल कर रख दी। 1969 मे आयी आराधना से लेकर 1974 में आयी रोटी तक राजेश खन्ना की फिल्मों में जो एक बात कामन रही वह था रिश्ते, परिवार और समाज ,बाकी सारे तत्व बस इसे सपोर्ट करते दिखते थे।
फिल्मफेयर और यूनाइटेड प्रोड्यूसर्स द्वारा आयोजित प्रतियोगिता में शामिल होकर 1965 में राजेश खन्ना ने हिन्दी सिनेमा में दस्तक दी। प्रतियोगिता की शर्तों के अनुरुप राजेश खन्ना को बतौर नायक दो फिल्मों के लिए साइन भी कर लिया गया।पहली फिल्म थी राज, नायिका के रुप में बबिता थी।फिल्म में इनकी दोहरी भूमिका थी,लेकिन जब शुरुआत हुई तो रवीन्द्र दवे के निर्देशन में बनने वाली यह फिल्म पीछे रह गई और पहली फिल्म के रुप में आखिरी खत रीलिज हो गई। चेतन आनंद के निर्देशन में बनने वाली यह फिल्म उनकी प्रतिष्ठा के अनुरुप आस्कर तक पहुंच गई। लेकिन राजेश खन्ना की हैसियत टेलेन्ट हंट जीत कर आए एक प्रतियोगी से आगे नहीं बढ पायी।हालांकि उस समय भी उन्हे आशा पारेख जैसी अभिनेत्री के साथ अपने आपको प्रूव करने के लिए बहारों के सपने जैसी फिल्में मिलीं। लेकिन दर्शकों का कसौटी पर खरा उतरने के लिए उन्हें अभी बहुत कुछ करना था।मुकाबला भी आसान नहीं था,सामने थे जुबली कुमार कहे जाने वाले राजेन्द्र कुमार,राज कपूर भले ही अभिनय से दूर हो गए थे,देवआनंद का आकर्षण बरकरार था, दिलीप कुमार का परदे पर आना उस समय भी चौंकाता था, शम्मी कपूर का अपना अलग दर्शक वर्ग था,राजेश खन्ना के सामने चुनौती कुछ बेहतर देने की नहीं थी, क्यों कि उनके सामने सभी अपनी अपनी विशेषताओं के चरम थे,चुनौती कुछ अलग देने की थी।
अवसर मिला शक्ति सामंत की आराधना से।एक पारिवारिक संवेदनशील कहानी,जिसमें युवतम का उत्साह भी था और परंपरा की गहनता भी।संवेदना का शीर्ष भी था और कथा की रोचकता भी। बाप और बेटे की दोहरी भूमिका में थे राजेश खन्ना। हालांकि परदे पर दोनों कभी साथ नहीं दिखे, लेकिन परदे पर रिश्ते का एक नया अहसास आराधना में दिखा। फिल्म में प्रेमकथा गौण थी, पारिवारिक संवेदना प्रबल थी। दर्शकों ने बार बार यह फिल्म देखी,आश्चर्य नहीं कि आज भी यह फिल्म उतने ही प्यार और सम्मान के साथ देखी जाती है। शायद मानवीय संवेदनाएं कहीं न कहीं हमारे दिलों में इतने गहरे असर बनाए होती हैं कि उन्हे निकाल बाहर करना आसान नहीं होता,जरा सा भी अनुकूलता देख वे उमड पडती हैं।
आराधना में राजेश खन्ना ने एयरफोर्स पायलट का निभाया तो सिर्फ किरदार ही था, लेकिन उनके कैरियर ने उडान वास्तविक भरी।आराधना की सफलता के झोंके पर इत्तेफाक, डोली और बंधन जैसी फिल्में भी एक के बाद सफल होती चली गई, लेकिन दो रास्ते ने सफलता की मिसाल बनायी।गुरुदत्त और देवआनंद के साथ काम कर चुके राज खोसला की यह फिल्म समय के साथ बदलते संयुक्त परिवार के जद्दोजहद को रेखांकित करती थी। तीन भाईयों ,बडे भाई के त्याग, मंझले के स्वार्थ और छोटे भाई के परिवार के प्रति स्नेह और सम्मान को दर्शाती इस फिल्म में बलराज साहनी ने बडे भाई की भूमिका निभाई थी,राजेश खन्ना छोटे भाई की भुमिका में थे। एक ओर कालेज में  ये रेशमी जुल्फें,ये शरबती आंखे... गाने वाला बिंदास नौजवान दूसरी ओर परिवार को संकट के दौर में संभालने वाले जवाबदेह भाई की भूमिका से शायद हर कोई ने रिलेट करने की कोशिश की।दो रास्ते में राजेश खन्ना हल्की दाढियों में दिखे,जो जाहिर है उनके व्यक्तित्व के अनुकूल नहीं था।वास्तव में राजेश खन्ना ने यह दाढी यश चोपडा के सस्पेंश थ्रिलर इत्तेफाक के लिए बढायी थी, कहते हैं जब राज खोसला के सामने राजेश के लुक पर सवाल उठाया गया तो उन्होंने कहा,दर्शकों को दाढियां देखने का समय ही मैं नहीं दूंगा।वाकई फिल्म अपने समय की ही बडी हिट नहीं हुई ,आज भी पारिवारिक फिल्मों का बात आती है तो सबसे पहले याद दो रास्ते की ही आती है।
वास्तव में कोई भी कलाकार मेहनत कर परदे पर अभिनय के अवसर तो पा सकता है, सफलता कभी उसके अकेले की उपलब्धि नहीं होती।इसमें महत्वपूर्ण योगदान समय, समाज और परिस्थितियों का भी रहता है।1975 में एंग्री यंगमैन के रुप में यदि अमिताभ बच्चन का तूफान खडा होता है तो इसलिए नहीं कि अमिताभ ने कोई चमत्कार कर दिया था,इसलिए कि आपात्काल के निराशाजनक माहौल में वह चरित्र सुकून दे रहा था जो सारे नियमों और नियंत्रणों से परे समाज से लडकर जीत हासिल करता है। अमिताभ की फिल्मों में मां जरुर दिखती थी, न तो परिवार दिखता था नही परिवार का अनुशासन। अमिताभ शराब भी पीते दिखते कोठे पर भी जाते, वे समाज को चुनौती देते दिखते थे। राजेश खन्ना ठीक इसके विपरीत सामाजिक पारिवारिक अनुशासन से बद्ध दिखते थे। कटी पतंग में वे विधवा से विवाह भी करते हैं तो सबों को सहमत कर ।सच्चा झूठा, दुश्मन,हाथी मेरे साथी जैसी फिल्मों में भी वे अपने विरोधियों से अपने हाथों बदला नहीं लेते,कानून की मदद लेते हैं। वास्तव में राजेश खन्ना का नायकत्व परिवार, समाज और पारंपरिक नैतिक अनुशासन का प्रतीक था। राजेश खन्ना के कालखंड को स्मरण करने में सहुलियत होगी यदि उसे 1971 के बांग्ला देश के उदय के पूर्व और पश्चात से जोड कर देखें।यह भारतीय राजनीति का वह समय था जब अटल बिहारी वाजपेयी भी इंदिता गांधी को दुर्गा कह रहे थे। आखिर कोई तो कारण होगा कि हिन्दी सिनेमा के इस ध्रुवतारे की चमक 1969 ये 1974 तक ही बरकरार रह पाती है।इसका उत्तर जितना राजेश खन्ना के पास है उतना ही समय के पास भी।
राजेश खन्ना क्या कर सकते थे,यदि उन्हें 74 के बाद रोटी, महाचोर, बंडलबाज, छैला बाबू, चलता पूर्जा जैसी फिल्में मिलने लगी थी ,जिसका चरम बाद में आज का एम एल ए, फिर वही रात, रेड रोज और अंततः वफा जैसी फिल्म में दिखा। राजेश खन्ना इसके लिए बने ही नहीं थे। सच्चा झूठा में भले और बुरे की दोहरी भूमिका निभाते हुए जब राजेश खन्ना अपना ही इलाज कर जाते डाक्टर को गोली मार देने का इशारा करते हैं तो विश्वास ही नहीं होता, राजेश खन्ना ऐसा कर सकते हैं। एक हद तक माना जा सकता है कि राजेश खन्ना की लोकप्रियता में उनका अदाओं की भी बडी भूमिका थी,पलकें झपकाना ,गर्दन को हल्का सा खम देना उनकी विशेषता थी,लेकिन वास्तव मे यदि राजेश खन्ना लोकप्रिय थे तो उसकी वजह थी उनके निभाए चरित्रों की पारिवारिक मूल्यों में आस्था।आराधना,दो रास्ते,बंधन,सच्चा झूठा,सफर,कटी पतंग,आनंद,आन मिलो सजना, हाथी मेरे साथी, बावर्ची,अनुराग आप कोई भी फिल्म याद करें, राजेश खन्ना भारतीय पारिवारिक मूल्यों के प्रतीक के रुप में दिखेंगे। राजेश खन्ना के इस रुप की स्वीकार्यता का यह कमाल था कि वे जब भी दर्शकों के सामने इस रुप में आए दर्शकों ने उन्हें सर आंखों पर बिठाया, चाहे थोडी सी वेवफाई हो या अवतार। वास्तव में परदे पर राजेश खन्ना वे दिखते थे जो वास्तविक जीवन में हम नहीं थे, इसीलिए उनकी उपस्थिती सुकून देती थी,उनमें हमें अपना आदर्श भाई,आदर्श प्रेमी,आदर्श बेटा,आदर्श दोस्त दिखता था। वह इतना सहृदय था कि अपने, अपने परिवार का ही नहीं जानवरों का भी ख्याल रखता था।
दुश्मन राजेश खन्ना की बडी हिट मे शुमार की जाती है। उस फिल्म में राजेश खन्ना ट्रक ड्राइवर बने थे,जिसे एक दुर्घटना के बाद सजा दी जाती है कि वह मृतक के गांव में उनके परिवार के साथ रह कर उसका कर्तव्य पालन करे। राजेश खन्ना गांव जाकर उसके बूढे मां बाप की देखभाल करता है,बहन की शादी करवा देता है, उसकी पत्नी और बच्चों का ख्याल रखता है,और इसके बाद गांव वालों को सूदखोर महाजन से मुक्ति भी दिलाता है।राजेश खन्ना की फिल्मों को याद करें तो उनकी अधिकांश फिल्मों में नायक का संघर्ष व्यक्तिगत हित का नहीं रहता। अपना देश में भले ही बात भाई की हत्या से शुरु होती है लेकिन अंत तक वह समाज का ब्लैक मार्केटियों के खिलाफ सामूहिक आंदोलन में तब्दील हो जाती है।
समय के साथ जैसे जैसे समाज से सामूहिकता की भावना लोप होती गई,राजेश खन्ना की भूमिकाएं हमारे लिए अप्रसींगिक होती गई।राजेश खन्ना के साथ यह मुश्किल जरुर रही कि समय के बदलाव को वे न तो पहचान सके, न ही उससे भिडने की हिम्मत जुटा सके। यह हिम्मत उन्हें जहां से मिल सकती थी,उसे भी उन्होंने गंवा दिया था।अफसोस परदे पर परिवार के आदर्श प्रतीक रहे राजेश खन्ना,अपने ही परिवार को सहेज कर नहीं रख सके।राजेश खन्ना के निभाए पात्र गवाह रहेंगे, यदि परिवार का साथ उन्हें मिल पाता तो शायद काका के और कई रुप हम देख पाते।

शुक्रवार, 20 जुलाई 2012

समय की चुनौतियों के सामने असहाय

अपने समय में सफलता के पर्याय के रुप में जुबली कुमार के नाम से चर्चित राजेन्द्र कुमार का बंगला ‘आशिर्वाद राजेश’ खन्ना खरीद रहे होंगे, तो उन्हें शायद ही अहसास होगा कि सफलता का यही क्रम होता है, एक हाथ से निकलती है दूसरे में पहुच जाती है। कुछ वर्ष पहले आइफा के अवार्ड समारोह में अमिताभ बच्चन से लाइफ टाइम एचीवमेंट आवार्ड ग्रहण करते हुए उन्होने अपनी ही फिल्म‘दाग’के संवाद दुहराते हुए कहा था,जहां मैं हू,कल कोई और था,कल कोई और होगा।लेकिन अद्भुत संयोग की राजेश खन्ना वास्तविक जीवन में इस सच्चाई को कभी स्वीकार नहीं कर पाए। यदि वे यह स्वीकार कर पाते तो निश्चित रुप से आज उन्हें हम एक सुपर स्टार के साथ ,एक हिम्मती व्यक्ति के रुप में भी याद कर पाते। कह सकते हैं राजेश खन्ना ने जो चाहा सो पाया था, ऐसा संयोग वाकई काफी कम लोगों को नसीब हो पाता है। सिनेमा में लोकप्रियता के शिखर पर वे रहे,राजनीति में आए तो सांसद बने,अपने समय की सबसे चर्चित नायिका डिम्पल कापडिया से अपनी शर्तों पर शादी की। काबिल बेटियों के पिता बने और अक्षय कुमार जैसे दामाद का साथ मिला। बावजूद राजेश खन्ना अपने अंतिम दौर में हताश दिखते थे, तो यही कहा जा सकता है कि अपने आपको कभी भी वे रील लाइफ से अलग कर नहीं देख पाए। काफी कम लोग होते हैं जो अपने वास्तविक जीवन में भी एक्टिंग करते रह पाते हैं, राजेश खन्ना ये कर पाए थे। शायद इसीलिए उनकी मौत भी किसी सिनेमा के दृश्य की तरह ही हुई,एक लम्बे क्लाइमेक्स के साथ। ‘आनन्द’ फिल्म में अमिताभ बच्चन का बाबू मोशाय का कैरेक्टर यदि आज भी मुहावरे के रुप में याद किया जाता है तो उसकी श्रेय जाता है राजेश खन्ना को ,जिन्होंने अपनी अभिनय शैली और संवाद अदाय़गी से बाबू मोशाय को कालजयी पहचान दी। ‘आनंद’ उनके सशक्त अभिनय का एक प्रतीक भर नहीं है। यह व्यक्ति को जिंदगी से जूझने का एक सबक देती थी। निश्चित रुप से जिसे मानव यभ्यता के अंत तक याद रखना चाहेगा। लाइलाज बीमारी से पीडि़त,मौत को सामने देख कर भी जीवन से हार नहीं मानने वाले किरदार को राजेश खन्ना ने परदे पर जिस खूबी से साकार कर दिया था,किसी के लिए भी प्रेरक था वह, अफसोस राजेश खन्ना के लिए वह भूमिका प्रेरणा नहीं बन सकी। अच्छा लगता वास्तविक जिंदगी में भी उन्हे उसी रुप में याद कर पाते। लेकिन शायद जीवन और फिल्म कभी एक नहीं हो सकती। ऋतिक रोशन की सफलता पर बात करते हुए उनके चाचा राजेश रोशन ने कहा था, यह पागलपन राजेश खन्ना के लिए थोडा ज्यादा ही था। यह जीवन की वास्तविकता है कि शिखर पर कोई भी व्यक्ति अधिक समय तक नहीं टिका रह सकता, एवरेस्ट पर आप ठहर नहीं सकते। जिंदगी का यह व्यवहारिक सच है राजेश खन्ना जिसके प्रतीक थे। सफलता का जो शिखर राजेश खन्ना ने हासिल किया था वह भी अकल्पनीय था, और जितने कम समय तक वे शिखर पर रहे वह भी अकल्पनीय लगता है। 1969 में ‘आराधना’के साथ हिन्दी सिनेमा के इस ध्रुवतारे का उदय होता है ,लेकिन मात्र 4 वर्षों के बाद 1973 में‘नमक हराम’के साथ ही इसकी चमक धूमिल पडने लगती है। और अमिताभ के उदय के साथ ही पलक झपकते हिन्दी सिनेमा इन्हें हाशिए पर कर देती है। 70 के दशक में फिल्म फेयर हरेक वर्ष य़ूनाईटेड प्रोड्यूसर्स के साथ मिलकर नए कलाकारों की खोज के लिए प्रतियोगिता का आयोजन करती थी।हिन्दी सिनेमा के केन्द्र तत्कालीन बम्बई से दूर अमृतसर में 29 दिसंबर 1942 को जन्में जतिन खन्ना ने परदे पर उतरने के सपने के साथ 1965 में इस प्रतियोगिता में आवेदन दिया, और चयन प्रक्रिया की यह ईमानदारी का ही प्रतीक था कि बगैर किसी फिल्मी बैकग्राउंड के वे चुन लिए गए। कहा जाता है फाइनल में दस हजार युवाओं के बीच इनका चयन हुआ था। आज परिवारों के बीच फंसी इंडस्ट्री को देख वाकई आश्चर्य होता है, क्या वाकई इतना लोकतांत्रिक था हिन्दी सिनेमा।प्रतियोगिता की घोषणा के अनुरुप इन्हें दो फिल्में भी मिल गई। पहली फिल्म ‘राज’ मिली , लेकिन प्रदर्शित हुई `आखिरी खत` । चेतन आनंद के निर्देशन में बनी यह फिल्म हिट भले ही नहीं हुई,आस्कर में जरुर पहुंच गई। परिवार वालों की मर्जी के खिलाफ अभिनय को बतौर करियर चुनने वाले 24 वर्षीय राजेश खन्ना की शुरुआत दमदार रही।1966 में ‘राज’, ‘बहारों के सपने’ और ‘औरत’ के रूप में उनकी कई फिल्में आई। अपने समय की बडी नायिकाओं का साथ भी मिला । उन्हें बॉक्स ऑफिस पर कामयाबी भले नहीं मिल सकी, लेकिन फिल्मकारों को उनके विलक्षण लुक संभावनाएं जरुर दिखने लगी। शायद समय को प्रतीक्षा वर्ष 1969 की थी,राजेश खन्ना की दोहरी भूमिका वाली संवेदनशील फिल्म `आराधना` आयी और एयर फोर्स पायलट की भूमिका निभा रहे राजेश खन्ना के कैरियर ने जब उडान भरी तो इतिहास बन गया। बॉलीवुड के पहले सुपरस्टार मान लिए गए राजेश खन्ना। अब समय राजेश खन्ना का था। फिल्मों से उनका जुडना सफलता की गारंटी माना जाने लगा था। जी.पीं सिप्पी जैसे फिल्मकार की फिल्म ‘अंदाज’ शम्मी कपूर हेमा मालिनी के बावजूद राजेश खन्ना की अतिथी भूमिका के लिए हिट मानी जाती थी । कहा जाता है राजेश खन्ना के मरने के दृश्य में लडकियां बेहोश होकर गिर जाया करती थी। 1970 से 1973 तक तक हरेक वर्ष राजेश खन्ना ने तकरीबन आधी दर्जन हिट फिल्में दी। यह हिट, आज के हिट से किस कदर अलग था यह इसी से समझा जा सकता है कि आज फिल्में ढाई दिन में हिट हो जाती जबकि उस समय हिट होने का मतलब कम से कम फिल्मों का 25 हफ्ते चलना जरुरी माना जाता था। कोई प्रमोशन गिमिक्स नहीं, फिल्में फिल्मकार के बताने से नहीं ,दर्शकों के पसंद करने पर हिट होती थी। जाहिर है राजेश खन्ना की फिल्में हिट हो रहीं थी तो उसका अर्थ था कि राजेश खन्ना को दर्शक पसंद कर रहे थे। राजेश खन्ना से शायद सबसे भूल यहीं हुई, दर्शक राजेश खन्ना को नहीं उनके अभीनीत पात्र को पसंद कर रहे हैं,राजेश खन्ना के लिए यह स्वीकार करना मुश्किल था। लेकिन सच यही था। राजेश की सफलता का सबसे बडा कारण था कि हिन्दी सिनेमा में पहली बार उन्होंने मध्य वर्ग को साकार किया था । दो रास्ते, दुश्मन ,सफर, अमर प्रेम जैसी उस दैर की उनकी सभी फिल्मों में वे एक ऐसे मध्यवर्ग युवा की भूमिका में दिखते थे,जो समाज को बेहतर बनाने की कोशिश में जुटा है,बगैर समाज के नियमों को चुनौती देते हुए। महिलाएं उनमें नेक्स्ट डोर व्वाय को देखा करती थी। वे उनमें अपने प्रेमी,अपने भाई,अपने बेटे को देखा करती थी। मुझे याद है पहली बार मेरे चाचा खासतौर पर मुझे लेकर अपना देश देखने गए थे, कारण बस इतना था कि उस फिल्म में चाचा भचीजे पर एक गाना फिल्माया गया था, रोना कभी नहीं रोना....यह एक व्यक्ति या एक फिल्म की बात नहीं ,राजेश खन्ना की फिल्मों में दिखता पारिवारिक सरोकार दर्शकों को आमंत्रित करता था।याद कर सकते हैं अपने ढलान के दिनों में राजेश खन्ना ने भले ही ‘वफा’ और ‘रेड रोज’ जैसी फिल्मों में काम किया हो, उनके फिल्मोग्राफ में व्यस्क फिल्में ढूंढनी मुश्किल है। वे परदे पर पारिवारिक दिखते थे, गौरतलब है कि उस दौर में सितारों के निजी जीवन में घुसपैठ करने वाला टेलीविजन नहीं था,जाहिर था दर्शक अपने सितारों से सिर्फ उनकी फिल्मों से ही रु ब रु हो पाते थे।देखते देखते परदे का स्नेहिल,सामाजिक चरित्र राजेश खन्ना के रुप में दर्शकों के दिलोदिमाग पर काबिज होता चला गया। राजेश की सफलता कभी अवार्डों की मोहताज नहीं रहा। राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार उस समय भी थे,लेकिन शायद न तो कभी राजेश खन्ना ने उसके लिए चिन्ता की और न ही जूरी कभी राजेश की लोकप्रियता के दवाब में आई। अपने पूरे कैरियर में उन्हें मात्र तीन बार फिल्म फेयर अवार्ड से सम्मानित किया जा सका। 1970 में बनी फिल्म `सच्चा झूठा` के लिए उन्हें पहली बार सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का फिल्मफेयर अवॉर्ड दिया गया। लेकिन सफलता का यही आत्म विश्वास राजेश खन्ना को तब भारी पडने लगा जब नई चुनौतियों के सामने वे लाचार से दिखने लगे।न तो बदलते समय के साथ वे नई भूमिकाओं के लिए तैयार हो रहे थे, नही अपने अभिनय को विस्तार देने के लिए ।उनके लगता था दर्शक उनकी मजबूरी नहीं, वे दर्शकों की मजबूरी हैँ। राजेश खन्ना समय को रोक लेना चाहते थे,जो असंभव था। जाहिर है न तो वे अपनी गुमनामी झेल सके, नही उससे उबरने की कोशिश कर सके। ये सब याद करने का शायद यह अवसर न हो, लेकिन याद करना इसलिए जरुरी है कि कलाकारों को सितारों का दर्जा देते हुए हम याद रख सकें कि वे भी हमारी तरह इन्सान हैं,वे भी उन्हीं अहसासों से गुजरते हैं,जिससे कोई भी आम इन्सान गुजरता है।लेकिन इससे इन्कार नहीं किया जा सकता कि जाते जाते भी आनंद हमारे लिए एक सबक छोड गया।