महेश भट्ट लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
महेश भट्ट लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

गुरुवार, 15 नवंबर 2012

भट्ट जी,सेक्स नहीं,समाज पसंद है दर्शकों को

हिन्दी सिनेमा के स्वनाम धन्य बुद्धिजीवी महेश भट्ट मानते हैं कि भारतीय दर्शक सेक्सुअल फिल्मों को अधिक तरजीह देते हैं इसलिए पारिवारिक फिल्में बॉक्स ऑफिस पर सफल नहीं होती हैं।  भारतीय दर्शकों के मनोविज्ञान का विश्लेषण करते हुए वे यह भी दावा करते हैं कि भारतीय दर्शकों को फिल्मों में अगर सेक्स परोसा जाए तो वे ज़्यादा संतुष्ट होते हैं, हालांकि भारतीय दर्शक कभी भी यह मानने को तैयार नहीं हैं। उनका मानना है कि कामुकता भारत में एक बीमारी की तरह फैल रही है। महेश भट्ट ने हालिया वर्षों में अपने सामाजिक बयानों से चाहे जो छवि बनायी हो, परदे पर मर्डर, ‘राज और जिस्म सीरीज की फिल्मों से सेक्स आधारित फिल्म बनाने वाले फिल्मकार की छवि बनाने से कतई संकोच नहीं किया। जाहिर है अपनी इस तरह के बयानों से समय समय पर वे सेक्स परोसने की अपनी विद्रुप कोशिशों को न्यायोचित ठहराने की कोशिश करते हैं। महेश भट्ट कहते हैं कि भारतीय दर्शक सेक्स के भूखे होते हैं, लेकिन बाहर से दिखाते नहीं है और अगर उन्हें पारिवारिक फिल्में परोसी जाए, तो वे फ्लॉप हो जाती हैं, क्योंकि दर्शकों को जिस्म, मर्डर, राज टू जैसी बोल्ड फिल्में  ही भाती हैं।
महेश भट्ट इतने पर ही बस नहीं करते वे आगे कहते हैं,  इस ज़माने के लोगों का टेस्ट बदल चुका है। वे बात करने से ज़रुर कतराते हैं। पर देखने में बिलकुल नहीं शर्माते। अब लोगों को फिल्म में कहानी के साथ-साथ सेक्स का तड़का चाहिए। पोर्न फिल्मों की अभिनेत्री सनी लियोनी के लिए हिन्दी सिनेमा में जगह बनाने की कोशिशों पर महेश भट्ट कहते हैं कि जब जिस्म 2’ के लिए सन्नी लियोन को लेने की बात हुई थी, तब काफी बवाल हुआ था। लेकिन 6 करोड़ की फिल्म ने 36 करोड़ का बिजनेस किया, जिससे यह साबित होता है कि भारतीयों को क्या पसंद है। महेश भट्ट की मजबूरी पर वारि वारि जाने का मन करता है जब वे मजबूरी जाहिर करते हुए कहते हैं कि आज के लोगों को सेक्स का तड़का चाहिए इसलिए सेक्स वाली फिल्में बनानी पड़ती है। हिन्दी सिनेमा में इस मान्यता को प्रचारित करने वाले महेश भट्ट अकेले नहीं हैं, अभी तक एक भी सफल फिल्म नहीं दे सकने वाली अभिनेत्री नेहा धूपिया ने हाल में एकबार फिर कहा कि हिन्दी सिनेमा में दो ही चीजें बिकती हैं, सेक्स और शाहरुख। इसी तरह बीते तीन वर्षों से ट्वीटर और विभिन्न सोशल साइट्स पर अपनी नग्न तस्वीरें परोस कर पहचान बनाने की कोशिश में जुटी पूनम पांडेय अपनी पहली सी ग्रेड फिल्म नशा को न्यायोचित ठहराते हुए कहती हैं यहां के लोग छुप-छुप कर सेक्स देखते हैं। इसलिए उन्होंने एडल्ट फिल्म साइन की है।
महेश भट्ट अपनी स्थापना का आधार इस बात को मानते हैं कि उनकी 6 करोड में बनी सनी लियोनी अभिनीत जिस्म 2 ने 36 करोड की कमाई की। 36 करोड मतलब 36 लाख दर्शक। यदि महेश भट्ट के ही गणित से चलें और 36 करोड को एक हफ्ते का कमाई मानें, तो 100 रुपये की टिकट दर से देश भर में एक दिन में यह फिल्म मात्र 50 हजार लोगों ने देखी। सवा अरब के मुल्क में 50 हजार दर्शकों के आधार पर क्या किसी निष्कर्ष पर पहुंचा जा सकता है, लेकिन महेश भट्ट जैसे कथित विद्वानों की यही खासियत है वे निर्णय पर पहले पहुच जाते हैं, तर्क बाद में गढ लेते हैं। हिदी सिनेमा के दर्शक फिल्मकारों की यह मनमानी झेलते रहे हैं। मनमोहन देसाई से लेकर सुभाष घई और डेविड धवन तक अपनी हर घटिया फिल्मों को इस तर्क के साथ ही परोसते रहे कि वे वही बनाते हैं जो दर्शक चाहते हैं, अफसोस कि आज तक जब हिन्दी सिनेमा अपनी शताब्दी मना रही है दर्शकों की पसंद जानने का कोई मैकनिज्म विकसित नहीं कर पाई। फिल्म की सफलता को दर्शकों की पसंद से जोड कर देख लिया जाता है अति तो तब हो जाती है जब आम तौर पर इसे भारत की पसंद भी मान ली जाती है। भाई मेरे, जिस मुल्क में दर्शकों की तदाद ही एक प्रतिशत हो, वहां किसी एक फिल्म के कुछ दर्शकों के देख भर लेने से कैसे उस आधार पर आम भारतीय का स्वभाव निर्धारित किया जा सकता है।
 इतना ही नहीं,यदि महेश भट्टों की तरह सिर्फ सिनेमा की सफलता को ही आधार मान कर चलें तब भी हिन्दी सिनेमा की सफलता का इतिहास दर्शकों के कुछ और ही स्वभाव को रेखांकित करता है। इतिहास में न भी जायें और खुली अर्थ व्यवस्था के बाद दर्शकों की बदलती आदतों और स्वभाव को आधार बनाएं, तब भी लगान और गदर- एक प्रेम कथा की अभूतपूर्व सफलता को भुलाया नहीं जा सकता।वास्तव में चाहे और जो कुछ हो सेक्स हिन्दी सिनेमा में कभी लोकप्रियता की वजह नहीं रही। जब भी सेक्स को केन्द्र में रख कर फिल्में बनी निःसंकोच उसे सी ग्रेड का दर्जा दे कर एक खास दर्शक वर्ग के लिए छोड दिया गया। मैंने प्यार किया, हम आपके हैं कौन, कुछ कुछ होता है, दिलवाले दुल्हनियां ले जायेंगे, कभी खुशी कभी गम की सफलता हो सकता है महेश भट्ट के लिए बीते दिनों की बात हो गई हो, सलमान खान की हालिया सफलता को कैसे भूला जा सकता है, जिसमें सेक्स तो क्या नायिका के करीब होने के दृश्य भी मुश्किल से मिलते हैं।दबंग भदेस भले ही मानी जा सकती है, मलायिका के मुन्नी बदनाम के बावजूद उसकी सफलता को सेक्स से जोडकर नहीं देखा जा सकता।
सलमान की फिल्में वांटेड, रेडी, बाडीगार्ड और एक था टाइग की चाहे हम जितनी आलोचना कर लें, लेकिन सेक्स प्रदर्शन के मामले में सलमान के अति सचेत रुख से कतई इन्कार नहीं किया जा सकता। बेडसीन की तो बात ही दूर है, सामान्य माने जाने चुम्बन दृश्य भी सलमान की फिल्मों में नहीं देखे जा सकते, यह सलमान के दर्शकों को भी पता है, तब भी सलमान का मतलब 100 करोड की गारंटी है, जो नग्नता की तमाम सीमाएं पार करने के बाद भी हेट स्टोरी नहीं दे सकती। महेश भट्ट 36 करोड की कमाई कर भले ही सेक्स की अपनी सफलता से खुश हो रहे हों ,सच यही है कि भारत में 100 करोड का व्यवसाय करने की क्षमता उन्हीं फिल्मों में रही हैं जिन्होंने सेक्स से परहेज रखा है।
आश्चर्य कि हिन्दी सिनेमा में एक भरी पूरी जिंदगी गुजार देने के बाद भी महेश भट्ट यह नहीं समझ सके कि भारतीय दर्शकों की पहली पसंद सेक्स नहीं, समाज है, समाज की कहानियां हैं। रोहित शेट्टी और प्रियदर्शन की फिल्मों की सफलता पर गौर किया जाय तो हास्य जरुर दिखता है, लेकिन उसके साथ ही दिखती है पात्रों की भीड भी। ढेर सारे पात्र और उनकी जद्दोजहद के बीच से निकलते हास्य के पल। राजेन्द्र कुमार और राजेश खन्ना की कथित सामाजिक फिल्में भले ही आज नहीं दिखाई दे रही हों, लेकिन दबंग, रेडी, सिंघम, बोलबचन और अग्निपथ में जो दिखता है वह समाज से परे भी नहीं दिखता। महेश भट्ट जैसे लोगों को समझने में सहुलियत होगी यदि बीते वर्षों में 100 करोड का आंकडा पार करने वाली कुछ फिल्मों पर एक उडती नजर भी डाल लेंगे, गजनी, गोलमाल, रा वन, डान2, राउडी राठौड, जोधा अकबर, माइ नेम इज खान, सिंह इज किंग....  आखिर इनमें से किसकी कमाई का श्रेय सेक्स को दिया जा सकता है, इसके बरक्स यदि सेक्स की सफलता की बात करें तो शायद ही कोई फिल्म 20 करोड की भी कमाई कर सकी हो। महेश भट्ट जी 6 करोड से 36 करोड की कमाई कर आप खुश हों,अच्छी बात है, इस कमाई से उत्साहित होकर आप सनी के साथ पोर्न फिल्म के धंधे में लग जाएं और अच्छी बात, लेकिन कृपा कर  उसे दर्शकों के स्वभाव से जोडने की कोशिश न करें, आप मान लें कि आपका विकृत मस्तिस्क अब जख्म और सारांश जैसी फिल्में नहीं सोच सकता, दर्शकों को दोष न दें, वे अभी भी तारे जमीन पर और 3 इडियट्स देखने के लिए पलकें बिछाए है।