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मंगलवार, 25 अक्टूबर 2011

दिपावली का उत्साह बांटने आ रही रा.वन


समय ने त्योहारों के मायने बदल दिये हैं ।दिपावली की पहचान अंधकार पर प्रकाश के विजय के रुप में थी। अमावस्या में दीये की रोशनी सिर्फ रात के अंधेरे ही दूर नहीं करती थी,मन के अंधेरे कोनों को भी रोशन करती थी। लेकिन आज दिपावली का सीधा सा अर्थ बाजार हो गया है। महत्वपूर्ण यह नहीं कि आप कितने दिये रोशन कर रहे हैं,महत्वपूर्ण यह है कि दिपावली पर कितने की खरीदारी कर रहे हैं। जाहिर है खरीदारी के इस महापर्व के अवसर का लाभ उठाने में सिनेमा क्यों चूकता। पहले दिपावली के दृश्यों वाली फिल्म दिवाली के अवसर पर रिलीज होती थी तो उसका एक मतलब समझ में आता था। अपने त्योहार में अपने नायकों या कहे पात्रों को शामिल देख दर्शकों को अच्छा भी लगता था। लेकिन हिन्दी सिनेमा की इस सीधी सी समझ को बदल डाला `दिलवाले दुल्हनिया ले जायेगें` की ऐतिहासिक सफलता ने। दिवाली के अवसर पर     `दिलवाले दुल्हनिया ले जायेगें` का रिलीज होना भले ही संयोग रहा हो ,लेकिन जैसे जैसे यह फिल्म सफलता के नए मानदण्ड रचते गई, फिल्मकारों के मन में यह आस्था मजबूत होते गई कि दिवाली फिल्में की सफलता की राह सुगम बनाती है। उनकी इस आस्था को बाद के दिनों में  दिवाली के अवसर पर रिलीज होने वाली `कुछ कुछ होता है`, `मोहब्बतें`, और `वीर जारा` जैसी फिल्मों की सफलता ने और भी मजबूती दी। इतनी मजबूती कि वे दिवाली के ही अवसर पर रिलीज होने वाली अशोका की असफलता भी भूल गए।
          वास्तव में दिवाली भारत के एक बडा त्योहार अवश्य है। ऐसा त्योहार जिसे लोग धन की देवी से भी जोडकर देखते हैं। लेकिन इससे फिल्मों की सफलता को जोडकर देखा जाना सिवा हिन्दी फिल्मकारों के अंधविश्वास के सिवा और कुछ नहीं, ठीक वैसे ही जैसे कुछ फिल्मकारों केलिए अंग्रेजी का के शुभ होता है तो कोई किंग में दो जी जोडकर सफलता सुरक्षित कर लेना चाहता है।सच यही है कि सफलता न तो दिवाली की मोहताज होती है ,न ही किसी टोटके की। यदि फिल्म अच्छी हुई सफलता हर मौषम में गारंटेड होती है। अब इस अच्छी का मतलब भी समय के अनुसार बदलते रहे हैं। दर्शक को क्या अच्छा लग सकता हा यह अभी तक कोई नहीं तय कर सका है। उसी हिन्दी दर्शक को `मर्डर` भी पसंद आती है और `ब्लैक` भी। `दबंग` भी और `देल्ही बेली`भी। हिन्दी दर्शकों की पसंद को फार्मुले में बांधना संभव ही नहीं।मोटामोटी जो फार्मूला दिखता है सिर्फ यह कि उनहें एक कहानी अवश्य चाहिए,और कहानी कहने के प्रति ईमानदारी। दर्शकों को जब भी चमत्कृत करने या भरमाने की कोशिश हुई दर्शकों ने उसे पूरी तरह नकार दिया है। 2009 में दिवाली पर अब तक की सबसे बडे बजट की हिन्दी फिल्म रिलीज होती है `ब्लू`,इसके साथ ही आती है सलमान खान और करीना कपूर की `मैं और मिसेज खन्ना` ,दोनों ही फिल्में बुरी करह फ्लाप होती है। और हिट होती है एक सामान्य सी कामेडी आल द बेस्ट। इसी तरह 2008 में अक्षय कुमार की `चांदनी चौक टु चाइना` धूमधाम से आती है और बुरी तरह फ्लाप कर जाती है ,इसी के साथ आई `युवराज` को भी दिवाली का लाभ नहीं मिल पाता । दिवाली का लाभ मिलता है `गोलमाल रिटर्नस` को।क्या वाकई `गोलमाल रिटर्नस` की सफलता का दिवाली से कोई सरोकार हो सकता है।
          लेकिन हिन्दी सिनेमा तर्क करना नहीं जानती न तो रील लाइफ में ,न ही रीयल लाइफ में। इसीलिए इस तरह के सवालों पर भा यह असुविधा में आ जाती है। दिवाली पर रिलीज `गोलमाल-3` की सफलता उसे उम्मीद देती है वह सही याद रखती है ,इसीदिन रिलीज `ऐक्शन रिप्ले`  को भुल जाती है।आश्चर्य तब जरुर होता है जब शाहरुख खान जैसे बडे नाम हिन्दुस्तान की सबसे बडी फिल्म बनाते हैं ,उसे अपनी समझ से बेहतर बनाने के लिए हालीवुड के टुकडे पुर्जे भी जोडते हैं ।लेकिन रिलीज के लिए दिवाली ही याद रखते हैं। `रा.वन` का भी दिवाली से कोई सरोकार नहीं ,लेकिन सफलता की चाहत शुक्रवार के रिलीज की परम्परा को तोडते हुए शाहरुख को भी इसे आज ही फिल्म रिलीज करने को उतावला कर देती है कि दिपावली का शुभ सगुन कहीं छूट नहीं जाए। हालांकि इस वर्ष तो इसकी एक व्वहारिक पक्ष भी है। आमतौर पर सिनेमा का वीकएंड तीन दिनों का होता है ,शुक्रवार,शनिवार,रविवार। हाल के वर्षों में सिनेमा का कारोबार इसी तीन दिनों पर आश्रित है।जाहिर है आज याने बुधवार को रीलिज होने से रा.वन का वीकएंड पांच दिनों का हो जाता है। गौरतलब है कि हिन्दुस्तान में अबतक सबसे ज्यादा याने 3500 प्रिंट के साथ रिलीज होने वाली `रा.वन` केलिए इन बढे हुए दो दिनों का व्यवसाय काफी मतलब रख सकता है। हिन्दी सिनेमा के लिए आज एक एक दिन का व्यवसाय कितना महत्वपूर्ण हो गया है यह इससे भी स्पष्ट होता है कि दिवाली में रिलीज की चाहत रखते हुए भी हेमा मालिनी `टेल मी ओ खुदा` और हिमेश रेशमैया `दमादम` के साथ `रा.वन` को पहले दिन चुनौती देने की हिम्मत नहीं जुटा सकते। ये दोनों फिल्में दिवाली के एक दिन बाद याने गुरुवार को रिलीज होंगी। गौरतलब है शुक्रवार की प्रतीक्षा ये दोनों फिल्में भी नहीं करती ,लेकिन पहले दिन रा.वन के सामने खडी भी नहीं होती। सवाल है दिपावली रविवार को पड रही होती क्या तब भी शाहरुख दिपावली के खास दिन की प्रतीक्षा कर पाते ।शायद नहीं क्योंकि तब ईन्हें वीकएंड लंबा होने का लाभ नहीं मिल पाता।
                वास्तव में सिनेमा के लिए महत्व दिपावली का नहीं ,महत्व ईस अवसर पर मिली छुट्टू का होता है।दिपावली से यदि सिनेमा ने सरोकार रखा होता तो दिपावली के दृश्य आज सिनेमा में भूले बिसरे गीत नहीं बन गए होते। दिपावली ही नहीं किसी भी भारतीय त्योहार को सिनेमा मे आज कोई जगह नहीं मिल रही।हां,वेलेन्टाइन डे को जरुर मिल रही है।मुझे याद है दशहरे दिवाली के समय पहले सिनेमा घरों में पुरानी फिल्में चला करती थी। क्योंकि आमतौर पर लोग त्योहारों में स्वयं व्यस्त रहते थे। त्योहारें का मतलब सिनेमा देखना नहीं ,साफ सफाई ,पूजापाठ,  लोगों से मिलना जुलना ,अतिथियों का स्वागत ज्यादा था। लेकिन अब जब खास तौर पर कोई फिल्म दिवाली के दिन का ही इन्तजार करती है तो हमारे लिए खुश होने से ज्यादा सोचने का वक्त है कि क्या वाकइ हमारा अकेलापन इतना बढ गया है कि दिपावली भी सिनेमा घरों में मनाएंगे।
           हम तो चाहेगें रा.वन हिट हो,टेल मी ओ खुदा और दमादम भी। मतलब ये सारी फिल्में अच्छी हो। लेकिन यह भी चाहेंगे ये फिल्में हमारे त्योहारों के उत्साह को हमसे बांटने नहीं लगे।                                        

गुरुवार, 13 अक्टूबर 2011

मंहगी होती फिल्में

80 करोड की ब्लू,70करोड की लव स्टोरी 2050, 60 करोड की जोधा अकबर,और 50 करोड की देवदास अब पुरानी बात हो गई।50 से 60 करोड के बीच बनने वाली दबंग, रेडी, बाडीगार्ड और जिंदगी ना मिलेगी दोबारा भी अब अपने बजट पर शर्मिंदा हो जा सकती है।क्योंकि शाहरुख खान रा.वन लेकर आ रहे हैं।175 करोड ,हिन्दी सिनेमा के लिए अभी तक सिर्फ सुना जाने वाला यह आंकडा साकार होने जा रहा है रा.वन में।आफिसयली फिल्म की लागत की बात हालांकि मजाक में टाल जाते हैं ,लेकिन जानकारों के अनुसार फिल्म की लागत 150 करोड रुपये आंकी जा रही है,इसमें प्रमोशन के 25 करोड जोड दें तो तकरीबन 175 करोड।हालीवुड की अवतार के 237 मिलीयन डालर के मुकाबले 175 करोड रुपये की रकम जरुर छोटी लग सकती है ,लेकिन हिन्दी सिनेमा के यह कितनी बडी है ,यह इसी से समझी जा सकती है कि 2009 के एक आंकडे के अनुसार हिन्दी सिनेमा का कुल वार्षिक टर्नओवर 600 से 800 करोड रुपये आंका गया है।रा.वन का बजट तब और बडा लगने लगता है जब हिन्दी सिनेमा के बाक्स आफिस कलेक्शन पर नजर डालते हैं,जो आमतौर पर 75 करोड पहुचते पहुचते दम तोड देता है।साल भर में बनने वाली 400 हिन्दी फिल्मों में 4 ने यदि 100 करोड का जादुई आंकडा पार कर लिया तो मान लिया जाता है साल सुखद रहा।ऐसे में 175 करोड से फिल्म बनाने की यह नई परंपरा हिन्दी सिनेमा के लिए क्या इत्साह की वजह बन सकती है। सुनने में यह अच्छा लगता है कि बडे बजट पर अब सिर्फ हानीवुड का अधिकार नहीं।हिन्दी सिनेमा ने भी हालीवुड के जूते में पांव डालने की शुरुआत कर दी है। लेकिन चिन्ता इस बात को लेकर जरुर होती है कि क्या हालीवुड की तरह हिन्दी सिनेमा ने भी अपनी वापसी की व्यवस्था कर ली है।हालीवुड यदि एक फिल्म पर 1000 करोड रुपये खर्च करने की हिम्मत जुटा रही है तो इसकी वापसी के वह निश्चिन्त है।इस सुरक्षित वापसी के लिए उसने बडी मेहनत की है। वैश्विक संस्कृति के नाम पर पूरी दुनिया में उसने ऐसी संस्कृति की स्वीकार्यता बनायी है जो हालीवुड तैयार करती है। ईटली,इंग्लैंड और फ्रांस जैसे मुल्कों के सिनेमा ने हालीवुड के सामने पूर्णतया समर्पण कर दिया है। आप किसी भी विदेशी मूवी चैनल पर जाएं वहां सिर्फ और सिर्फ हालीवुड की फिल्में दिखेंगी।आश्चर्य नहीं कि जैसे जैसे हिन्दी सिनेमा में अमेरिकन संस्कृति को स्वीकार करने की प्रवृति बढते जा रही है ,भारत में भी हालीवुड सिनेमा का बाजार बढता जा रहा है।अब तो भारत का शायद ही ऐसा कोई मल्टीप्लेक्स हो जिसके एक दो स्क्रीन पर हालीवुड की नवीनतम फिल्में प्रदर्शित नहीं की जा रही हो। हालीवुड से बच्चों की फिल्म हैरी पाटर आती है और 2000 करोड रुपये का बिजनेस कर जाती है। इसके बरक्स यदि हिन्दी सिनेमा की वापसी की बात करें तो भारत में प्रति 10 लाख लोंगो पर एक स्क्रीन की उपलब्धता कतई संतोष नहीं दे सकती ।जबकि फ्रांस में यही संख्या 77 है और अमेरिका में 117। जब सिनेमाघर ही नहीं तो बाक्स आफिस कलेक्शन आयेगा कहां से।जो सिनेमाघर भारत में हैं भी उनमें से अधिकांस दक्षिण भारत में ही हैं। शाहरुख आश्वस्त हो सकते हैं कि उनकी फिल्में देश के साथ विदेशों से भी कलेक्शन जमा करते रही है।लेकिन वे भूल जाते हैं कि उनकी वही फिल्में विदेशों से भी कलेक्शन ला पायीं जो विशुद्ध भारतीय परिवेश और भारतीय संवेदनाओं पर बनी थी।चाहे वह कभी खुशी कभी गम हो या माई नेम इज खान।रा.वन को शाहरुख भले ही हालीवुड के सुपर मैन की तरह भारत के अपने सुपर मैन को प्रस्तुत करने की कोशिश मान रहे हों ,सच यही है कि यदि शाहरुख अपनी फिल्म की भारतीयता के प्रति इमानदार होते तो पटकथा लिखने के लिए हालीवुड से डेविड बुनुलो को नहीं बुलाते।शाहरुख यहीं नहीं रुके उन्होंने सिनेमेटोग्राफी,संपादन.स्टंट और ड्रेस के लिए भी हालीवुड से ही विशेषज्ञ बुलवाए।छम्मक छल्लो ....जैसे नितान्त चलताउ गाने के लिए भी किसी भारतीय आवाज की अपेक्षा वे हालीवुड के एकोन पर भरोसा करते हैं।जिसे शायद छम्मक छल्लो का अर्थ भी नहीं पता ,उससे भाव लाने की उम्मीद कैसे कर सकते हैं। लेकिन हिन्दी सिनेमा के साथ यही मुशकिल है,बडा बनने के लिए यह अपनी परंपरा की ओर नहीं देखती,हालीवुड की ओर देखती है। रा.वन की पहली झलक और प्रोमोज को देखते हुए सहज ही हालीवुड से इसकी निकटता महसूस की जा सकती है।सवाल है जब हालीवुडी ऐक्शन औरऐनीमेशन देखना हो तो उसके लिए सीधे हालीवुड की फिल्मों को ही क्यों ना प्राथमिकता दी जाए।जो कहीे अधुक बेहतर फिनिशिंग और नयेपन के साथ सामने आ रही है। बात हालीवुड से प्रभावित होने का नहीं,यह तथ्य है कि हालीवुड जब किसी फिल्म पर खर्च करता है तो उसके बजट का एक बडा हिस्सा कथा,पटकथा और परिकल्पना पर करता है।हालीवुड से जब अवतार या जुरीसिक पार्क आती है तो परदे पर कुछ नया दिखता है,ऐसा जो पहले ना देखा गया ,ना सुना गया। हिन्दी सिनेमा के लिए बजट के भारी होते जाने का अर्थ है,विदेशी लोकेशन,बासी तकनीक और सबसे ज्यादा सितारों के कथित मेहनाताने । अमिताब बच्चन भी स्वीकार करते हैं कि हिन्दी सिनेमा में सबसे कम खर्च लेखकों पर किया जाता है,यह कम बजट के एक प्रतिशत तक हो सकता है।जाहिर है बजट के भारी होते जाने से हिन्दी सिनेमा की मौलिकता और प्रयोगसीलता में कुछ नएपन की उम्मीद नहीं की जा सकती।सिवा इसके कि हालीवुड के कुछ बी ग्रेड नमूने यहां भी दिखने लगेंगे। आश्चर्य नहीं कि हिन्दी में मंहगी फिल्मों का भविष्य कभी बेहतर नहीं रहा। रा.वन के पहले तक हिन्दी की सबसे मंहगी फिल्म मानी जाने वाली ब्लू के लिए लागत निकालना भी मुश्किल हो गया था।इसके पहले लव स्टोरी 2050 भी अपनी भारी भरकम लागत के बावजूद दर्शकों को आकर्षित नहीं कर पाय़ी। यदि भारी भरकम बजट वाली कोई फिल्म चली भी तो वह थी जोधा अकबर, जिसमें हुआ खर्च कहानी कहने के लिए जरुरी था। वहां बजट दर्शकों को चमत्कृत करने के लिए नहीं था।लेकिन रा.वन या डान-2 के 100 करोड से ज्यादा के बजट की जब बात आती है तो स्पष्ट लगता है ,यह अपनी फिल्म को जोधा अकबर की तरह और भारतीय बनाने के लिए नहीं ,बल्कि हालीवुड के करीब होने के लिए किया जा रहा है। शाहरुख खान कुशल व्यवसायी हैं,उन्हें पता है हालीवुड में भारतीय तडका एन.आर.आई दर्शकों के लिए एक तोहफा हो सकता है।इसीलिए जहां एक ओर रा.वन में नीली आंखों वाला गोरा चिट्टा सुपरमैन दिखता है,वहीं लाल और हरे रंग में भदेश भारतीय दिखती छम्मक छल्लो भी।हो सकता है फिल्म एक बडी हिट भी हो जाए ,लेकिन जहां आरक्षण 75 करोड की कमाई कर ही मुनाफे में चली जाती है वहीं रा.वन को मुनाफे के लिए कम से कम 200 करोड का व्यवसाय करना होगा।जो हिन्दी सिनेमा के लिए नामुमकिन तो नहीं ,मुस्किल जरुर है।भारत जैसे देश में और हिन्दी सिनेमा जैसे अव्यवस्थित उद्योग में इतना बडा जोखिम वास्तव में हिन्दी सिनेमा की पहचान के लिए खतरा भी हो सकता है। सिर्फ इसलिए नहीं कि इतनी बडी रकम की वापसी अनिश्चत है,इसलिए भी कि इस भारी रकम की वापसी सुनिशचत करने के लिए हिन्दी फिल्मकारों के सामने बाजार की शर्तों पर झुकते चले जाने की बाध्यता हो जायेगी। अनुराग कश्यप अपनी फिल्म के लिए विषय और प्रस्तुती का चुनाव अपनी शर्तों पर इसलिए कर पाते हैं कि उन्हें 2 करोड या 5 करोड में फिल्म बनानी है,जिसकी वाहसी के लिए उन्हें सिर्फ एक लाख दर्शक चाहिए। फिल्में कम बजट की बनती हैं तो इसमें प्रयोग और मौलिकता की गुंजाईश बची रहती है, क्योंकि उस पर दर्शकों का दवाब नहीं रहता।लेकिन जैसे जैसे फिल्म का बजट बढता जाता है इसे दर्शकों की चिन्ता बढते जाती है।सवाल ही नहीं कि तब ये फिल्में तारे जमीं पर और देव डी की तरह दर्शकों की पसंद को चुनौती दे सके। बावजुद इसके हमारी दुआ होगी कि रा.वन 300 करोड का व्यवसाय करने वाली ऐतिहासिक फिल्म बने।लेकिन उम्मीद है सफलता के बावजूद हिन्दी सिनेमा इसे शाहरुख खान के शगल के रुप में ही स्वीकार करेगी।यदि इसे सफलता के फार्मुले के रुप में स्वीकार किया जाता है तो यह हिन्दी सिनेमा के व्यवसाय के लिए ही नहीं ,इसकी मौलिकता पर भी भारी पडेगी।