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गुरुवार, 15 नवंबर 2012

अमिताभ के दौर में सिनेमा

ख्वाजा अहमद अब्बास को भी शायद अहसास नहीं होगा कि गोवा की आजादी की पृष्ठभूमि पर बनने वाली अपनी फिल्म के लिए सात हिन्दुस्तानियों के समूह में उन्होंने जिस एक हिन्दुस्तानी का चयन किया है, उसमें से सबसे अलग, सबसे लम्बा ,इतना कि कैमरा भी समेटने में संकोच करे, वह हिन्दी सिनेमा के सबसे लम्बे या कहें अंतहीन लगते दौर का केन्द्र बनेगा।सात हिन्दुस्तानी 1969 में आयी,  और यह 2012, इन 43 सालों में अमिताभ की फिल्में आयीं या नहीं, फर्क नहीं पडा, अमिताभ हिन्दी सिनेमा के केन्द्र में रहे। शायद राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार के उस वक्त की जूरी को इस बेडौल से लगते नौजवान में भविष्य के अमिताभ की झलक दिख गई थी। उन्होंने सर्वश्रेष्ठ नवागन्तुक अभिनेता के रुप में सात में से इसी एक हिन्दुस्तानी का चयन किया, पहचान मिली, अमिताभ बच्चन। लेकिन हिन्दी की मुख्य धारा के सिनेमा के लिए इस पहचान का कोई अर्थ नहीं था। राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार और हिन्दी सिनेमा उस समय लगभग एक दूसरे के लिए अप्रसांगिक थे। अमिताभ बच्चन को अपनी दूसरी और घटिया सी भूमिका वाली फिल्म परवाना के लिए दो साल की प्रतीक्षा करनी पडी। कहते हैं उस दौर में अमिताभ फिल्मकारों से मिलने स्टूडियो जाते तो कहा जाता, हो गया गोवा आजाद, अब घर जाओ। लेकिन हिन्दी सिनेमा को अमिताभ बच्चन मिलना था, बगैर किसी चयन के जो भी भूमिकायें मिली, कैमरे के सामने वे पूरी शिद्दत से उतरे। चाहे संजोग में कलक्टर माला सिन्हा के क्लर्क पति की दब्बू भूमिका हो या बाम्बे टू गोवा में महमूद का साथ भर देने की। अधिकांश फिल्मों में नायक होने के बावजूद नायिका या सहनायक से उनकी भूमिका कमतर ही रखी जा रही थी,चाहे वह शत्रुघ्न सिन्हा के साथ रास्ते का पत्थर हो या मुमताज के साथ बंधे हाथ। वास्तव में राजेश खन्ना की चमक में जब देव आनंद, राजेन्द्र कुमार,धर्मेन्द्र, जीतेन्द्र जैसे सारे बडे और पुराने सितारे गुम हो चुके थे, अमिताभ के लिए यही बडी उपलब्धि थी कि आनंद के बाबू मोशाय को दर्शक याद कर ले रहे थे। हृषिकेश मुखर्जी (अभिमान) और शुभेन्दु राय (सौदागर) जैसी फिल्म परिकल्पित कर रहे थे, तो अमिताभ को केन्द्र में रखने लगे थे। लेकिन यह अमिताभ के दौर की शुरुआत नहीं थी। उसकी पूर्व पीठिका भर थी।
वाकई यह प्रकाश मेहरा की विलक्षणता ही थी कि इन्हीं दब्बू भूमिकाओं में छिपे आक्रामक युवा की उन्होंने पहचान कर ली, और जंजीर में परिवार की हत्या का बदला लेने वाले युवा की भूमिका उन्हें सौंपी। कहा जाता है कानून के दायरे से बाहर जाकर अपराध से मुकाबला करने वाले इस पुलिस इंस्पेक्टर के प्रकाश मेहरा की पहली पसंद देव आनंद थे। देव आनंद के प्रति पूरे सम्मान के बावजूद जंजीर में अमिताभ बच्चन की जगह देव आनंद की कल्पना से ही हंसी आती है। देव आनंद ही नहीं किसी भी दूसरे अभिनेता को उस स्थान पर रख कर देखना संभव नहीं, अपने अभिनय से अमिताभ ने ऐसे नए नायक की नींव रखी,जो सिर्फ प्रस्तुती में ही नहीं,शील, स्वभाव में भी हिन्दी सिनेमा के परंपरागत नायकों से नितान्त अलग था।
वास्तव में मौके तो मेहनत ही दिला सकती है, लेकिन सिनेमा में सफलता समय और समाज के साथ फिल्मकार की परिकल्पना पर ही मिलती है। 1973 में जंजीर की सफलता कहीं न कहीं इस बात का संकेत थी कि मौजूदा व्यवस्था से लोगों का विश्वास डगमगा रहा है। वे ऐसे नायक पसंद करने लगे हैं जो व्यवस्था से बाहर जाकर समस्या का निदान ढूंढने के लिए तैयार हो। याद करें तो एक ओर 1971 भारत की जयगाथा के लिए याद की जाती है, दूसरी ओर नक्सलवाद की शुरुआत के लिए भी। कतई आश्चर्य ही था कि एक ओर जहां देश आत्म गौरव में झूम रहा था, वहीं देश के एक कोने में असंतोष के हिंसक निदान की राह तलाश की जा रही थी, यह कोना छोटा भले ही था, लेकिन इसकी धमक ने देश के बडे बुद्धिजीवी तबके को आत्मगौरव से दमकते चेहरे के पीछे छिपे झुर्रियों को देखने के लिए बाध्य कर दिया। विचारों के इस प्रभाव से सिनेमा भी अपने आपको बचाए नहीं रख सका। आश्चर्य नहीं कि समस्या के निदान की एक राह अमिताभ सुझा रहे थे, प्रकाश मेहरा के साथ तो दूसरी ओर श्याम बेनेगल अपने तरीके से उसे प्रतिविम्बित कर रहे थे, अंकुर और निशांत जैसी फिल्मों में।1969 में बनी भुवन शोम जैसी संवेदनशील फिल्मों की नई धारा को श्याम बेनेगल ने 71 के बाद एक नया अर्थ दिया, जिसकी एक स्वतंत्र परंपरा बनी। हालांकि ये फिल्में खास दर्शक वर्ग के लिए बन रही थी, लेकिन कहीं न कहीं इसके सामाजिक और बौद्धिक सम्मान ने अमिताभ के कथित विद्रोही भूमिकाओं की स्वीकार्यता के लिए भी जमीन तैयार की।
आखिर कोई तो वजह होगी कि 1975 के बाद राजेश खन्ना महाचोर, शशिकपूर फकीरा और तो और मनोज कुमार भी दस नंबरी बनने का निर्णय लेते हैं, तभी जब कि दीवार में अमिताभ बच्चन एक अलग समाज के युवा आक्रोश को आकार देने में सफल होते हैं।वास्तव में इसकी पूर्व पीठिका 1967 में राज्यों में संविद सरकारों के गठन के बाद ही बननी शुरु हो गई थी। यह आम जनता का कांग्रेस से मोह भंग या कहें आजादी की खुमारी के दौर से निकलने का प्रतीक था।जनता को आजादी अब बेमानी लगने लगी थी। जाहिर है राजनीतिक अस्थिरता बढी, इसी के साथ जनता का विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका से भी मोहभंग हुआ,जिसकी अभिव्यक्ति को विभिन्न कला माध्यमों ने स्वीकार किया,सिनेमा ने भी, अपने तरीके से। यही वह समय था जब कृषि के प्रति निरपेक्षता की मजबूरी और विकास की धुंधली रोशनी की आश में लोग शहर की ओर भागे। देखते देखते हिन्दुस्तान के हर शहर के भीतर एक अवांछित शहर बन कर तैयार हो गया। जिनके पास थी तो सिर्फ सपने और अपने आपको बचाए रखने की जद्दोजहद। खास बात यह कि हिन्दी सिनेमा के लिए यह सबसे बडा दर्शक वर्ग था।गांवों के अपने भरे पूरे समाज और लोक संस्कृति को छोड कर आए लोगों को मनोरंजन सस्ते मनोरंजन की जरुरत थी,जिसे सिनेमा पूरी कर रहा था। लोग चवन्नी में सिनेमा देखते थे, और खुश होते थे तो परदे पर इकन्नी लुटा देते थे। उसे परदे पर दोनों ही चीजें अच्छी लगती थी अपने सपने भी और अपने संघर्ष भी। अमिताभ में इन्होंने अपने आपको देखा। 1973 में जंजीर की सफलता में भारतीय संवैधानिक ढांचे के चरमराने की आवाज भर सुनाई दे रही थी,दीवार में वह स्पष्ट दिखने लगी। हिंसा दिखाने के लिए फिल्मकारों को अब धर्मात्मा की तरह काल्पनिक कथा की जरुरत नहीं थी, परदे पर आम जीवन और उनके बीच की हिंसा दिखाने की शुरुआत हो गई थी।
अमिताभ को सफल होना ही था। इस सफलता में कहीं न कहीं थोडा योगदान अमिताभ के व्यक्तित्व का भी था। उंचा कद जो कभी हिन्दी सिनेमा के नायकों के लिए असामान्य माना जाता था,वही अमिताभ के लिए यू. एस. पी. बन गया, शायद उनके दर्शकों को अपने नायक का सामान्य हिन्दुस्तानियों से अलग दिखना संतोष देता था। अमिताभ तो वही बंशी बिरजू थे, लेकिन उनकी फिल्में बदल गई थी। दीवार, शोले, जमीर, हेरा फेरी, अदालत, खून पसीना, परवरिश, त्रिशूल, डान, मुकद्दर का सिकन्दर, मि.नटवर लाल, सुहाग, शान, लावारिस, कालिया.....अमिताभ के 1975 से 1990 के बीच की फिल्मों के  अधिकांश किरदार उसी हाशिए पर पडे शहर से जुडे दिखते हैं। दीवार में उनकी भूमिका की शुरुआत डाकयार्ड के कुली से होती है जो बाद में अपनी हैसियत ऐसी बना लेता है कि कह सके, 'मेरे पास गाडी है, बंगला है, पैसा है, तुम्हारे पास क्या है'। अमिताभ यह सवाल भले ही परदे पर अपने पुलिस अधिकारी भाई से करते दिखते हैं, लेकिन लोगों को लगता है उनके बीच का कोई व्यक्ति पूरे अभिजात्य समाज से रु ब रु है। शोले में अमिताभ सहृदय चोर की भूमिका में हैं, कालिया में टैक्सी ड्राइवर, नसीब में वेटर, मुकद्दर का सिकन्दर में अनाथ,जो बाद में स्मगलरों को पकडवा कर उनकी कमाई से अमीर बनता है।
अमिताभ के दौर को यदि 1990 में आयी अग्निपथ तक के रुप में याद करें तो कुली, मर्द, नास्तिक, नमकहलाल, खुद्दार अमिताभ की सफलता उनके निभाए चरित्र में समाहित दिखती है। आश्चर्य नहीं कि कि लावारिस, कालिया, और तूफान जैसी फिल्मों की सफलता आज भी सिनेमा के जानकारों के लिए किसी तिलिस्म से कम नहीं। इसके बरक्स यदि 1975 के पहले की फिल्मों को याद करें तो वे सामाजिक समन्वय की कथा बयान करती थी। उसमें परिवार दिखता था, मां बाप ही नहीं, चाचा, मामा से लेकर फूफी मौसी तक का कहानी में अहम किरदार रहा करते थे। कहानियां परिवार में विचरण करती थी और सामाजिक नियंत्रण का निर्वाह करती समाप्त हो जाती थी। अमिताभ सिनेमा को उस बंधे बंधाये दायरे से बाहर निकाल लाये। अमिताभ की फिल्मों में मां तो दिखती थी, लेकिन पिता या तो रहता ही नहीं,यदि रहा भी तो अमजद खान सरीखा। आज का अर्जुन में तो अमिताभ अपने मामा अमरीश पुरी से ही मुकाबला में उतरते दिखते हैं। शायद बदलते समय की यही मांग थी। आश्चर्य नहीं कि अमिताभ ही नहीं, राजेश खन्ना और जीतेन्द्र जैसे रोमांटिक माने जाने वाले अभिनेताओं को भी 'जुझाडू' भूमिकाओं में उतरने को बाध्य होना पडा। राजेश खन्ना की कोशिश तो आमतौर पर असफल रही, लेकिन जीतेन्द्र ने मेरी आवाज सुनो और ज्योति बने ज्वाला जैसी फिल्मों के साथ जरुर हस्तक्षेप करने की कोशिश की।
चूंकि अमिताभ के पहले की फिल्मों की कहानी सामाजिक संदर्भों के साथ बनती थी,इसीलिए एक मूल कथा के साथ कई उपकथाएं भी साथ चलती थी,राजेन्द्र कुमार माला सिन्हा की कहानी का एक ट्रैक रहता था तो महमूद अरुणा इरानी का दूसरा ट्रैक समानान्तर चलता था।ढेर सारे सह अभिनेताओं की भीड देखी जाती थी। अमिताभ की व्यक्ति केन्द्रित कहानियों से समाज का संदर्भ कटा तो पात्र भी कटे। लेकिन सिनेमा को हास्य जाहिए,थोडा नाच गाना चाहिए...अमिताभ ने सारी जवाबदेही अपने कंधे पर उठा ली। राजेश खन्ना को कोई नहीं तो अपने साथ जूनियर महमुद भी चाहिए था, अमिताभ वन मैन आर्मी बन कर उभरे, वही हंसाते थे,वही रुलाते थे, उन्हीं का आयटम भी होता था,उन्हीं का स्टन्ट भी।वास्तव में वे उस वर्ग के नायक थे जिसे अपनी सारी लडाई खुद लडनी थी।
अमिताभ के दौर का सबसे ज्यादा खामियाजा यदि किसी कलाकार को भुगतना पडा तो वे थे संजीव कुमार, आज भी हिन्दी सिनेमा के सबसे प्रतिभाशाली अभिनेताओं की सूची बनायी जायेगी तो उसमें संजीव कुमार शीर्ष पर होंगे। अमिताभ के दौर में संजीव कुमार की सक्रियता इस बात की प्रतीक है कि उस समय अमिताभ के सिनेमा के साथ सिनेमा की एक समानान्तर धारा भी चल रही थी। वास्तव में भारतीय समाज की विविधता के अनुरुप सिनेमा अपने विविध रुपों में हर काल में उपस्थित रहा है,जब बिमल राय  सिनेमा बना रहे थे,उसी समय दारा सिंह और शेख मुख्तार की भी फिल्में आ रही थी। आज यह याद करना भी दिलचस्प लगता है कि जिस साल 'दीवार' रीलिज हुई, उसी साल राजकपूर ने 'बाबी' के साथ हिन्दी दर्शकों को प्रेम का एक नया आस्वाद भी दिया था। 'खेल खेल में', 'रफूचक्कर' जैसी फिल्मों के साथ ऋषिकपूर युवतम दर्शकों में क्रेज बन कर उभरे ,जिनके पास न तो कोई सामाजिक जवाबदेही थी,न ही सामाजिक चिन्ता। 1981 में जब याराना, कालिया, लावारिस, नसीब जैसी फिल्मों के साथ अमिताभ चरम पर दिख रहे थे,उसी समय राजेन्द्र कुमार ने अपने बेटे को लांच करने के 'लव स्टोरी' बनायी, हालांकि बेटा कुमार गौरव नहीं चल सका लेकिन लव स्टोरी उस समय खूब चली। इसी समय मनोज कुमार भी 'क्रांति' के साथ देश प्रेम की अपनी आखिरी लडाई लड रहे थे। जीतेन्द्र ने दक्षिण भारतीय फिल्मकारों के साथ 'हिम्मतवाला', 'तोहफा' के रुप में मनोरंजन और इमोशन का एक अलग खजाना खोला।अमिताभ से मुकाबले के लिए उसी समय मल्टी स्टारर फिल्मों की भी शुरुआत हुई, और मनोरंजन की एकरसता से ऊबे दर्शकों ने उसे स्वीकार भी किया।
लेकिन इस सबके बावजूद यदि 75 से 90 के काल को अमिताभ बच्चन के दौर के रुप में याद किया जाता है तो उसकी वजह है कि अधिकांश कलाकारों की लोकप्रियता अपने सीमित दर्शक वर्ग में थी, दक्षिण भारतीय फिल्में महिलाओं के बीच पसंद की जा रही थी, तो मल्टी स्टारर मध्य वर्ग को लुभा रही थी। अमिताभ एक मात्र ऐसे नायक थे जिनकी स्वीकार्यता सर्वमान्य थी। उनकी फिल्मों की कथा भूमि उन्हें शहरी सर्वहारा से जोडती थी, संवेदना महिलाओं को छूती थी, उनका सहज हास्य मध्य वर्ग को लुभाता था।तो उनका संपूर्ण व्यक्तित्व और संवाद शैली उन्हें क्लास देता था। अमिताभ को भी अपनी इस क्षमता का अहसास था यही कारण है कि अमिताभ का दौर 'कालिया' , 'दीवार' के लिए जितना याद किया जाता है उतना ही 'चुपके चुपके', 'कभी कभी', 'बेमिसाल' और 'सिलसिला' के लिए भी।

मंगलवार, 7 अगस्त 2012

हालीवुड का पाला छूने की होड

टाइम की आवरण कथा से जब भारत के वर्तमान और कथित भावी प्रधानमंत्री का कार्यक्षमता तय हो रही हो तो ,क्या आश्चर्य कि भारतीय फिल्मों  के अभिनेता भी अपनी प्रसिद्धि की उडान में हालीवुड का पंख लगाने की कोशिश करने में जी जान से जुटे दिख रहे हैं। परसिस खंबाटा, कबीर बेदी से लेकर आएशा धारकार, इरफान खान और मल्लिका शेरावत की हालीवुड की यह दौड तो समझ में आती है कि काम की तलाश में लोग चांद पर जा सकते हैं तो हालीवुड क्यों नहीं । लेकिन चिंता तब होती है  जब हिन्दी सिनेमा से सब  कुछ हासिल कर चुके अभिनेता भी हालीवुड की दर पर किसी स्ट्रगलर की तरह ठोकरें खाते दिखते हैं। आखिर हालीवुड के प्रति यह तडप क्यों। दुनिया भर में अमिताभ बच्चन भारतीय सिनेमा के प्रतीक के रुप में स्वाकार्य रहे हैं,शायद इसीलिए जब भारतीय सिनेमा को अंतर्राष्ट्रीय पहचान देने के उद्देश्य से आइफा की शुरुआत हुई तो उसके ब्रांड अम्बेस्डर के रुप में अमिताभ बच्चन का ही चुनाव किया गया। लेकिन अभी तक हिन्दी सिनेमा के बालीवुड संबोधन पर आपत्ति करने और हिन्दी सिनेमा के रुप में  स्वतंत्र पहचान की वकालत करने वाले अमिताभ बच्चन भी जब हालीवुड के प्रभाव से  आतंकित होते दिखते हैं तो सहज ही समझा जा सकता है, अंधेरा कितना घना है। उम्र और कैरियर के इस पडाव पर अमिताभ बच्चन वार्नर ब्रदर के बैनर तले बन रही बेज लुरमेन की फिल्म 'दि ग्रेट गेट्सबाय' से हालीवुड में कदम रखेंगे। रोमांटिक पटकथा की इस फिल्म में अमिताभ मेयर क़ा रोल निभाएंगे। फिल्म के अभिनेता टाइटेनिक फिल्म के हीरो लियोनार्डो डि केप्रियो हैं और हीरोइन स्कॉटिश-आस्ट्रेलियाई हीरोइन इस्ला फिशर हैं। कहा जा रहा है अमिताभ इस फिल्म में कुछ सेकेंड के लिए दिखेंगे। क्या यह माना जा सकता है कि पहचान की भूख ने उन्हें इस निर्णय को बाध्य किया होगा।
वास्तव में आर्थिक उदारीकरण कं साथ आए ग्लोबल विलेज की परिकल्पना ने भारतीय मानस को इस कदर कंडीशंड कर दिया कि हमें अपने ही बारे में दी गई जानकारी पर तब तक विश्वास नहीं होता जब तक वह पश्चिम के दरवाजे से नहीं आए। पीपली लाइव तब अचानक महत्वपूर्ण हो जाती है जब वह बर्लिन होकर आती है। गैंग्स आफ वासेपुर की कलात्मकता ढूंढने हम शीर्षासन तक को तैयार हो जाते हैं इसलिए कि वह वाया कांस हम तक पहुंचती है। यह हमारे पश्चिम प्रेम की इंतहा ही है कि हरेक वर्ष यह जानते हुए भी कि आस्कर से हम कितने दूर हैं, जनवरी से ही स्यापा शुरु हो जाता है। यह अमिताभ बच्चन ही थे, जिन्होंने भारतीय सिनेमा के अलग पहचान की वकालत करते हुए आस्कर को गैरजरुरी बताया था। आज सिनेमा ही नहीं शिक्षा विज्ञान समाज स्वभाव सभी के लिए हमें पश्चम की ओर देखने के लिए बाध्य कर दिया गया है। पश्चिम से प्रमाण पत्र पाकर हमें पूर्णता का बोध होता है।जाहिर है हालीवुड की ओर लपकती कलाकारों के इस नए खेप की तुलना काम की तलाश में हालीवुड जाने वाले कलाकारों की परंपरा से नहीं की जा सकती।
भारत मे सिनेमा बनाना अंग्रजों के सान्निध्य में सीखा। फाल्के सिनेमा सीखने हालीवुड नहीं लंदन ही गए थे। उस दौर में अंग्रेज सरकार हालीवुड के सिनेमा के खिलाफ खडी थी,उसे लगता था जो बाद में सही भी साबित हुआ कि हालीवुड उसकी फिल्मों को खत्म कर देगा। वावजूद इसके भारत ने हालीवुड में 1930 में ही दस्तक दे दी। फिल्म थी एलीफेन्ट ब्वाय,और उसमें महावत की भूमिका निभाई थी साबू दस्तगीर ने। समय समय पर आइ एस जौहर ,परसिस खंबाटा जैसे कलाकारों ने भी हालीवुड में पहचान बनाने की कोशिश की। लेकिन वास्तव में हालीवुड में यदि मुकम्मल तौर पर किसी ने भारतीय पहचान बनायी तो वे थे कबीर बेदी।  कीर बेदी की पहला हालीवुड फिल्म सांदोकन थी, कबीर सांदोकन की केंद्रिय भूमिका में थे। इसमें कबीर बेदी की मदद की उनके लम्बे कद और आकर्षक व्यक्तित्व ने भी। बाद में कबीर ने आक्टोपसी और जेम्सबांड की फिल्म में भी बडी भूमिका निभाई। कबीर के हालीवुड जाने और हालिया होड में एक बडा फर्क है कि कबीर हालीवुड के होकर रह गए थे जबकि आज हालीवुड का पाला छूकर भागने की होड है। कोशिश सिर्फ हालीवुड रिटर्न का तगमा लेने की की जाती है।ताकि बालीवुड में अपनी कीमत बढायी जा सके।इसीलिए आज बगैर किसी शर्त के भारतीय कलाकार हालीवुड फिल्मों में आने की कोशिश में लगे हैं।
शोर था कि इरफान खान स्पाइडरमैन 4 में मुख्य खलनायक बन कर आ रहे हैं ,फिल्म आयी तो पता चला परदे पर कुल जमा 10 मिनट इरफान दिखते हैं। हालांकि द वारियर में इरफान को अच्छी खासी भूमिका मिली थी, वास्तव में हालीवुड भारतीय कलाकारों पर तभी उदार होता है जब भारतीय या एशियाई चेहरे शामिल करना उसकी बाध्यता हो। अनिल कपूर लगातार हालीवुड के दरवाजे खटखटाते रहे तो उन्हें मिशन इंपसाबिल में 15 मिनट की भूमिका मिली। मल्लिका बराक ओबामा से जरुर मिल आयी हो लेकिन अभी तक हालीवुड उस पर पांच दस मिनट की ज्यादा की भूमिका के लिए विश्वास नहीं कर रहा। ऐश्वर्य राय ने ब्राइड एंड प्रिजूडिस’, ‘मिस्ट्रेस ऑफ स्पाइसेज’, ‘प्रोवोक्ड’, ‘द लास्ट लीजनऔर पिंक पैंथर-2’ जैसी फिल्मों में काम किया। लेकिन गौर करें तो इनमें से अधिकांश फिल्में भारतीय मूल के निर्माताओं द्वारा ,भारतीय पृष्ठभूमि पर बनायी गई थी।बानजूद इसके पिंक पैंथर में ऐश की भूमिका काफी छोटी रही ।
हिन्दी फिल्मों में नकारात्मक चरित्रों की मांग घटने के बाद हिन्दी सिनेमा के बैडमैन गुलशन ग्रोवर ने भी हालीवुड की कई फिल्मों में कांम किया,लेकिन यह भी यच है कि आज भी हालीवुड किसी न्यू कमर से ज्यादा उनकी पहचान नहीं मानी जाती। हालीवुड ने ओमपुरी,नसीरुद्दीन शाह,राहुल बोस जैसे कलाकारों को भी अवसर दिए, सईद जाफरी तो कई फिल्मों में आए, लेकिन अपनी जरुरतों पर। न तो ये हालीवुड के हो सके न ही हालीवुड इन्हें अपना सकी। अभिनय और काम के लिए हालीवुड जाने का अर्थ तो समझा जा सकता है।मुश्किल तब होती है जब मात्र अपनी ब्रांडिंग में इजाफा के लिए भारतीय सितारे हालीवुड की दौर लगाते हैं ।  
अभी बिपाशा बसु और अभय देओल की सिंग्युलेरिटी भी रिलीज के लिए तैयार हैं। शबाना आजमी भी एक हॉलीवुड फिल्म में काम कर रही हैं। कैथरीन बिग्लो की जीरो डार्क 30’ में वह ओसामा बिन लादेन की पहली बीवी का किरदार निभा रही हैं। यह फिल्म ओसामा के अंतिम समय की पृष्ठभूमि पर आधारित है। सोनम कूपर  भी  हॉलीवुड की दो फिल्मों 30 मिनट्स ऑर लेस में काम कर रही है। बेन स्टिलर की पिज्जा डिलीवरी ड्राइवर से जुड़ी इस एडवेंचरस कॉमेडी में अभिनेताओं और अभिनेत्रियों की भरमार है,इसमें सोनम को झूंढ पाना वाकई दिलचस्प होगा। रूबेन फ्लिशर निर्देशित इस फिल्म में मुख्य भूमिकाएं जेसी आइजनबर्ग, डेनी मैकब्राइड, फ्रेड वार्ड, अजीज अंसारी, माइकेल पीना, अमांडा राइट, एलेक्स रश आदि की है। इसके अलावा सोनम हॉलीवुड निर्माता एडुअडरे पोंटी की फिल्म 'डास' भी कर रही हैं।
निश्चय ही भारतीय कलाकारों में हालीवुड का पाला छूने की यह होड थमने वाली नहीं है।क्योंकि हिन्दी सिनेमा कभी हमें चुनौती नहीं दे सकती। सिनेमा का अंतिम लक्ष्य हमें प्रभावित करना है,यदि हालीवुड की ब्रांडिंग से हम प्रभावित होते हैं तो भला बालीवुड पीछे क्यों हटेगी।

रविवार, 7 अगस्त 2011

तुम जो आए......



बौराया था शहर।बौराना स्वाभाविक भी थी।अमिताभ बच्चन शहर में थे।सदी के महानायक,कुछ ने तो दो कदम आगे बढ कर कहा सहस्त्राब्दी के महानायक,पता नहीं सहस्त्राब्दी के शब्दार्थ से भी वे अवगत थे या नहीं।वैसे अतिउत्साह में लोग अक्सर होश गंवा बैठते हैं।होश हम भी गंवा बैठे,भूल गए कि अमिताभ आए नहीं ,लाए गए थे।बिहारी फिल्मकार प्रकाश झा के द्वारा अपनी फिल्म आरक्षण के प्रोमोशन के लिए।
अमिताभ बच्चन पहली बार बिहार आए।यदि प्रकाश झा ने अपनी फिल्म आरक्षण में उन्हें नहीं लिया होता ,यदि आरक्षण के प्रोमोशन का कार्यक्रम पटना में नहीं रखा गया होता ,तो शायद अमिताभ अभी भी बिहार नहीं आते,शायद कभी नहीं आते।क्यों आते,जब अपने 40 वर्षों की लम्बी अभिनय यात्रा में उन्हें बिहार आने की जरुरत महसूस नहीं हुई। वर्षों से अपने कंधे पर सुपर स्टार और अब सदी के महानायक के खिताब को उठाए अमिताभ को यह बेहतर पता है कि हिन्दी सिनेमा में काम करने का अर्थ हिन्दी समाज को जानना नहीं है। हिन्दी समाज की महत्वपूर्ण पहचान बिहार को जाने बगैर ही यदि हम हिन्दी सिनेमा के कालपुरुष बन सकते हैं तो क्या जरुरप है बिहार की धुल मिट्टी फांकने की।
वास्तव में अमिताभ का पटना आना ,यह ज्यादा याद दिलाता है कि अभी तक वे पटना या बिहार आए ही नहीं थे।अमिताभ ही क्यों ,आखिर कौन से हिन्दी सिनेमा के स्टार ने बिहार या हिन्दी प्रदेश को करीब से जानने की कोशिश की।यह हिन्दी सिनेमा की सचाई है,जहां स्टारडम की सीढियां चढने के लिए यह कतई जरुरी नहीं कि उस दुनियां को जानें ,समझें,पहचानें,जिस दुनिया को वे परदे पर साकार कर रहे हैं। अमिताभ का आना बिहार के लिए उत्साह से ज्यादा विचार का अवसर है कि आखिर कहां हमारी चूक रह जाती है कि हमारे ही सितारे हमें जानने की कोसिश नहीं करते।आखिर क्यों हिन्दी सिनेमा की चिन्ता में बिहार शामिल नहीं हो पाता।आश्चर्य़ नहीं कि हिन्दी सिनेमा के अभिनेता जब परदे पर किसी बिहारी को करने की कोशिश करते हैं तो वह किसी दूसरे ग्रह का प्राणी हो जाता है ।
सवाल ये भी है कि आखिर अमिताभ क्यों जानें बिहार को।उन्हें पता है बिहार सिनेमा का बाजार नहीं है।बिहार और झारखंड दोनों मिल कर किसी फिल्म के व्यवसाय में मात्र दो प्रतिशत की भागीदारी करते हैं ।ऐसे में उनका मुम्बई या पंजाब को जानना ज्यादा व्यवहारिक होता है जो 30 से 40 प्रतिशत तक की भागीदारी सुनिश्चत करती है।उन्हें पता है बनने के लिए फिल्में हिन्दी में बनती जरुर हैं ,लेकिन उसका हिन्दी दिखना कतई जरुरी नहीं होता।वहां भांगडा दिखना जरुरी होता है,सामा चकेवा या मधुश्रावणी नहीं।आखिर क्यों आते अमिताभ।
लेकिन अच्छा लगा अमिताभ का आना,कुफ्र तो टूटा।भले ही वजह प्रकाश झा का बिहार प्रेम हो,लेकिन इस बात से भी इन्कार नहीं किया जा सकता कि कहीं न कहीं हिन्दी सिनेमा को बिहार के बदलते आर्थिक हालातों में अपने लिए अब बेहतर संभावना भी दिखने लगी हो।निश्चित रुप से एक दर्शक के रुप में हम जितने ही मजबूत होंगे,अमिताभ जैसों का हमारे बीच आना उनकी मजबूरी होती जाएगी।