शुक्रवार, 15 मई 2020

हिंदी सिनेमा में परिवार




यदि परिवार न होता तो भारत में सिनेमा की नींव ही न पडी होती। यह सुनने में थोडा अटपटा अवश्य लगे लेकिन दादा साहब फाल्के के जीवन पर बनी मराठी फिल्म फिल्म हरिश्चंद्रायाची फैक्टरी देखने के बाद इस सच्चाई पर विश्वास करने में कोई शंका नहीं रह जाती। देश को पहला सिनेमा देने के लिए दादा साहब के साथ उनके परिवार का एक एक सदस्य खडा दिखता है।उनकी पत्नी,उनके बच्चे,उनके रिश्तेदार..यहां तक कि जब धन जुटाने के लिए घर का एक एक सामान वे बेच देते हैं तब भी उनका परिवार उनके साथ खडा रहता है।  स्वभाविक है परिवार की नींव पर खडे हुए सिनेमा के लिए विषय के स्तर पर भी परिवार का चयन सबसे सुरक्षित माना जाता रहा। 70 के दशक में जब छोटे कस्बों में रिक्शे पर सिनेमा के प्रचार हुए करते थे,तब भी हरेक फिल्म के साथ महान पारिवारिक फिल्म कहने से नहीं चूका जाता था। दारा सिंह तक की फिल्म के लिए कहा जाता था,मारधाड सीन शिनहरी से भरपूर महान पारिवारिक फिल्म...। परिवार भारतीय समाज में ताकत का प्रतीक रहा है,यह उस विश्वास को प्रदर्शित करता रहा है कि परिवार साथ है तो हर संकट का सामना किया जा सकता है। वक्त जैसी फिल्म में एक भरेपूरे परिवार को भूकंप बर्बाद कर देता,लेकिन यही परिवार फिर एक होकर खडा होता है। 2006 में आयी राजकुमार संतोषी की फेमिली में भी परिवार की इस ताकत का अहसास किया जा सकता है।2018 में वरुण धवन,अनुष्का की सुई धागा में पूरा समाज ही एक परिवार की तरह खडा होता है, और अपने गृह उद्योग की रक्षा करता है।
आश्चर्य नहीं कि दिलीप कुमार,राजेन्द्र कुमार,शशि कपूर,धर्मेन्द्र,जीतेन्द्र से लेकर राजेश खन्ना तक की सफलता की कहानी उनके द्वारा अभिनीत पारिवारिक फिल्मों के साथ पूरी होती है। राजेश खन्ना की लोकप्रियता की सबसे बडी वजह ही यही माना जाती है  वे उस दौर में फिल्मों में परिवार लेकर आ रहे थे, जब भारतीय समाज एकल परिवार की ओर बढ रहा था। आराधना, कटी पतंग, दो रास्ते, शहजादा, दुश्मन,बावर्ची जैसी कई फिल्में थी जिनमें परिवार के बीच ही समस्याएं खडी होती थी, और परिवार के बीच ही रोते गाते सुलझा ली जाती थी। इन फिल्मों में पात्रों के साथ दर्शक रोते भी थे और हंसते भी थे। 80-90 के दशक में खासकर जीतेन्द्र के साथ प्यासा सावन और जुदाई जैसी दक्षिण भारतीय फिल्मों की एक बडी खेप आयी, जिसमें परिवार को पूरे मेलोड्रामेटिक अंदाज में प्रस्तुत किया जा रहा था। ऐसी फिल्मों की महिला दर्शकों ने जमकर सराहना की और फिर उस दौर में परिवार,घर परिवार,स्वर्ग से सुंदर,बडे घर की बेटी,अमृत जैसी कई फिल्में आयीं। यह नहीं भूल सकते कि इसी दौर में सुखी परिवार की तलाश में बेचैन विद्रोही नायक की छवि के साथ अमिताभ बच्चन भी आए।
ये भी आश्चर्य कि जिस अमिताभ के आने से हिंदी सिनेमा में परिवार के बिखरने की शुरुआत हुई, उसी अमिताभ ने बागबान के साथ परिवार को नए सिरे से परिभाषित भी करने की शुरुआत की। बाद में पीकू जैसी फिल्म के साथ परिवार सिकुडता भले ही चला गया,परिवार की बांडिंग किसी न किसी रुप में दिखती रही। वास्तव में आमतौर परदे पर हम अपने सपने को साकार होते देखना चाहते हैं, परिवार हमारे पास न हो, हमारे नास्टेलजिया में परिवार रहा है,शायद इसीलिए हम आपके हैं कौन, विवाह और कभी खुशी कभी गम की तरह परिवार के बीच विचरती लगभग हरेक फिल्म के प्रति दर्शकों की कमजोरी दिखती रही।
अफसोस अब सिनेमा उन हाथों में हैं जिन्होंने परिवार देखा ही नहीं।इनके नास्टेलजिया में भी परिवार नहीं है।जाहिर है सिनेमा में अब व्यक्ति दिखते, व्यक्ति का अहं दिखता,बहाने कुछ भी हो,परिवार नहीं दिखता, परिवार की ताकत नहीं दिखता।

रविवार, 11 अगस्त 2019

ये कश्मीर है,ये कश्मीर है....


कितनी खूबसूरत ये तस्वीर है
मौसम बेमिसाल बेनजीर है
ये कश्मीर है,ये कश्मीर है...
1982 में रिलीज हुई अमिताभ बच्चन और राखी अभिनीत बेमिसाल का यह गीत हिन्दी सिनेमा का कश्मीर के प्रति कायम समझ को शब्द देती लगती है।कश्मीर मतलब खूबसूरती,कश्मीर मतलब डल लेक,कश्मीर मतलब हाउस बोट और शिकारे।आश्चर्य नहीं कि लगभग तीन दशकों तक कश्मीर हिंदी सिनेमा के लिए खूबसूरती का पर्याय बना रहा।प्रेम कहानियां कश्मीर में जाकर ही पूरी होती थी,पूरी फिल्म न सही एकाध गाने तो कश्मीर में होने हीचाहिए। देवदार के जंगल,सेव के बाग,रंगबिरंगे फूलों की बहार,सफेद उंचे बर्फीले पहाड,नीला चमकता आसमान ...प्रेम कहानियों के लिए कश्मीर में बस होना ही काफी होता था।
1964 में बनी कश्मीर की कली तो सबों को याद है,कितनी सहजता से यह टाइटिल स्वीकार किया गया था।फिल्म बडी हिट हुई,इसके गाने आज भी सुने जाते हैं। बात परस्पर विश्वास की है,आज ऐसे टाइटिल सोचे भी नहीं जा सकते खैर,यह याद करना मुश्किल है कि कश्मीर में शूट होने वाली पहली फिल्म कौन सी थी।यह अवश्य है कि 1963 में रामानंद सागर की आरजू में कश्मीर की खूबसूरती को हिंदी दर्शकों ने पहली बार अहसास किया।ए फूलों की रानी, बहारों की मलिका,तेरा मुस्कुराना गजब हो गया... के बैकग्राउंड में झांकती कश्मीर की खूबसूरती गीत के प्रभाव को दूना कर देती है।यह प्रेम कहानियों का दौर था,शम्मी कपूर खिलंदडे नायक के रुप में शीर्ष पर थे,उनकी अठखेलियों के लिए कश्मीर से बेहतर जगह नहीं हो सकती थी।याहू की गूंज के साथ बर्फ की पहाडियों पर जब  फिसलते थे तो कश्मीर जैसे लाइव हो उठता था।जंगली,जानवर,कश्मीर की कली जैसी न जाने कितनी फिल्में कश्मीर की खूबसूरती के दस्तावेज के रुप में देखी जा सकती हैं। यह कश्मीर की खूबसूरती का ही कमाल था कि दर्शक बार बार एक ही दृश्य बार बार देखते लेकिन उनका जी नहीं भरता। लेकिन यह भी सच है कि हिंदी सिनेमा में कश्मीर का उपयोग मात्र दृश्यात्मकता के लिए हो रहा था,न तो कश्मीर कहानी का हिस्सा बन पा रही थी, न ही कश्मीर का जन जीवन संस्कृति को जगह मिल पा रही थी।
ऐसे में शशि कपूर की जब जब फूल खिले प्रेम के मिठास में पगी होने के बावजूद एक अलग आस्वाद की याद दिलाती है।एक अमीर टूरिस्ट और एक शिकारे वाले के बीच पनपती प्रेमकथा के बीच दर्शकों ने वहां के जीवन को भी झांकते देखा था।उनके जीवन के संघर्ष भले ही कहानी के हिस्सा नहीं थे,उनकी गरीबी कश्मीर की खूबसूरती के पीछे की कलई अवश्य एक सीमा तक खोलती लगती थी।टूरिस्ट नायिका को घोडे पर ले जाते नायक का यह गुनगुनाना ...एक था गुल और एक थी बुलबुल...कहीं न कहीं तीसरी कसम की तरह कश्मीर की लोकगाथा से जोडने की एक कोशिश लगती थी।महत्वपूर्ण यह कि शिकारे वाले और अमीर पर्यटक की इस प्रेमकथा में अमीरी गरीबी मुद्दा बनती थी,कश्मीरी होना मुद्दा नहीं था। वह 1964 था, आज कश्मीर का प्रतीक धर्म हो गया है,यह वह समय था जब कश्मीर सिर्फ कश्मीर के रुप में जाना जाता था।
यह वह दौर था जब कश्मीर की पृष्ठभूमि पर फिल्में  सोची जाती थी,लिखी जाती थी और कश्मीर में ही शूट की जाती थी।कहा जाता है कश्मीर की फील पटकथा में लाने के लिए फिल्म के पटकथा लेखक और गीतकारों को खास तौर पर कश्मीर भेजा जाता था। लेकिन यह भी कमाल है कि फिल्मों में कश्मीर तो दिखता था,कशमीरी नहीं दिखते थे।शायद यह हिन्दी सिनेमा की सीमा भी रही है।कश्मीर की पवित्र वादियां पवित्र प्रेम कहानियों के लिए 84-85 तक आकर्षित करती रही।सन्नी देओल की लांचिंग के लिए बेताब की तैयारी शुरु हुई।एक अमीर बिगडैल लडकी और सीधे साधे किसान लडके की प्रेमकथा।राहुल रवेल इस कहानी को पहलगाम लेकर चले गए।बेताब के पिक्चर पोस्टकार्ड जैसे दृश्य आज भी कश्मीर की एक अलग ही छवि बयान करते हैं।आज भी पहलगाम की वह घाटी बेताब वैली के नाम से पर्यटकों को खास तौर पर दिखाई जाती है।
वास्तव में सिनेमा की शूटिंग किसी क्षेत्र का स्वरुप तभी तक नहीं बदलती जब तक शूटिंग  चल रही होती है,वर्षों वर्ष उसका प्रभा कायम रहता है।आखिर कोई तो कारण है कि स्वीटजरलैंड में झील और सडक यश चोपडा के नाम पर कर उन्हें सम्मानित किया जाता है। किसी फिल्म की शूटिंग जब तक चल रही होती है तब तक तो स्थानीय व्यापार को लाभ मिलता ही है।फिल्म बन जाने के बाद ह पर्यटन उद्योग के लिए बगैर कहे ब्रांड एम्बेस्डर का काम करती है।यश चोपडा की मल्टीस्टारर कभी कभी भी मुख्य रुप से कश्मीर में शूट हुई थी। अमिताभ बच्चन राखी या फिर ऋषि कपूर नीतू सिंह के साथ कश्मीर जिस तरह लुभाता था,आंकडे बता सकते हैं कि कभी कभी से कश्मीर के पर्यटन को कितना लाभ हुआ होगा।यहां राजकपूर की अलहदा फिल्म बाबी को भी नहीं भूला जा सकता।पता नहीं कितने किशोर 75-76 में स्कूल बैग में कपडे रख हम तुम एक कमरे में बंद हो...’ वाला काटेज ढूंढने निकल गए थे।यह वह समय था जब सिनेमा के लिए खूबसूरती का पर्याय कश्मीर था।निश्चित रुप से सिनेमा में एक बडा संसाधन इन्वाल्व होता है,किसी फिल्मकार को सिर्फ खूबसूरती आकर्षित नहीं कर सकती।यश चोपडा यदि स्वीटजरलैंडके प्रति आकर्षित थे तो वजह वहां की खूबसूरती को साथ वहां मिलने वाली सहुलियते भी थी।आश्चर्य नहीं कि हिंदी सिनेमा में एक दौर वह भी आया जब कश्मीर कीतरह कोई भी फिल्म स्वीटजरलैंड के बगैर पूरी नहीं होती थी।मतलब स्पष्ट है कि यदि तीन दशकों तक कश्मीर हिंदी सिनेमा का सबसे प्रिय लोकेशन रहा तो इसकी वजह वहां मिलने वाली सहुलियते,सहयोग और सुविधाएं भी रही होंगी।एक बडे क्रू के साथ बेताब जैसी बडी फिल्म की पूरी शूटिंग बगैर स्थानीय सहयोग के संभव हो ही नहीं सकती।किनका सहयोग मिलता था,कश्मीरयों का।क्यों..शायद इसलिए कि तब तक उन्हें अहसास नहीं कराया जाता था कि ये हिन्दुस्तानी हैं और तुम कश्मीरी हो।
तस्वीर बदली 1990 से,जब घाटी में आतंकवाद ने अपनी दखल बढाने की शुरुआत की।घाटी के सीधे शीधे लोग पीछे हटते गए और बंदूक के बल पर आतंकवादी क्मीर की सांसों को अपने नियंत्रण में लेते चले गए।कभी समय था जब कश्मीर में 19 सिनेमाघर थे,अकेले श्रीनगर में  11 सिनेमाघर थे,जहां कालेज की लडकियां ग्रुप बना कर सिनेमा देखने जाया करती थी।ये सिनेमाघर किसी न किसी रुप में शेष भारत की सांस्कृतिक हलचल,संवेदना से भी कश्मीर को जोडे रखने का काम करती थी।जाहिर है धर्म के बहाने आतंकवादियों ने सबसे पहली चोट सिनेमाघरों पर की।एक आदेश से सारे सिनेमाघर बंद करवा दिए गए। नेमा देखना धर्मविरोधी करार दिया गया।1999 में सरकार की कोशिशों से सिनेमाघर फिर से कलने की कोशिश की गयीं तो बयानक हमला कर दर्शकों को निशाना बनाया गया।हालात बिगडे तो सिनेमा भी कश्मीर के विकल्प की तलाश में विदेशों की ओर मुड गई।फिल्मकारों की यह मजबूरी थी और आतंकवादियों की सफलता कि शेष भारत से बने इस सांस्कृतिक पुल को उसने ध्वस्त कर दिया था।
कश्मीर का यह बदला स्वरुप लंबे अंतराल के बाद दिखा 1992 की तमिल फिल्म रोजा में,जो बाद में कई भाषाओं में डब होकर आयीं और बदलते कश्मीर को रेखांकित करने में सफल रही।रोजा की सफलता से उत्साहित मणिरत्नम ने 1998 में फिर हिंदी में शाहरुख खान को लेकर दिल से बनायी।कश्मीर के दहकते आतंकवाद के बीच प्रेम की यह संवेदनशील कहानी चली तो नहीं,लेकिन चल छैयां छैयां..जबान पर चढ कश्मीर की याद आज भी दिलाती है।यह भी अजीब है कि जब परदे पर कश्मीर का दिखना बंद हो गया तो कश्मीर की कहानियां दिखने लगी। मिशन कश्मीर, यहां, एल ओ सी कारगिल, लक्ष्य और फिर हैदर। आतंकवाद की पृष्ठभूमि पर बनी इस तरह की अधिकांश फिल्मों में कश्मीर की कोमलता की जगह बारुद का ढेर दिखता था।इनमें से कितनी झूठ और कितनी सच थी,यह तो समय तय करेगा।लेकिन यह भी सच है कि अपनी संवेदना के अनुरुप इस तरह की विषय पर बनी अधिकांश फिल्मों में आतंकवाद को जस्टिफाई और ग्लोरीफाई करने की कोशिश की गई।यश चोपडा फना जैसी प्रेमकथा में कश्मीर के मामले पर जनमत संग्रह की बात करते हैं,वह भी सिर्फ भारतीय हिस्से में।वे आतंकवाद को कश्मीर की आजादी की लडाई के रुप में स्थापित करते हैं।
अब जब कश्मीर 370 की सीमा से आजाद हो गया है हम विश्वास कर सकते हैं बडे परदे के लिए आतंकवाद की कहानिया इतिहास बन जाएगी और फिर एक बार हम देख सकेंगे,सुन सकेंगे..
साथी ये हमारी तकदीर है
कितनी खूबसूरत ये कश्मीर है


परदे पर लद्दाख
2009 में आयी थ्री इडियट  देश की शिक्षा व्यवस्था को प्रभावित करने में कितना सफल रही यह तो राम जाने लेकिन यह निःसंदेह कहा जा सकता है कि लद्दाख को आम भारतीयों के आकर्षण के केन्द्र में ला दिया।यह है सिनेमा की ताकत जिस झील  के किनारे थ्री इडियट का क्लाइमेक्स फिल्माया गया था,वहां साल में 4 लाख से अधिक पर्यटक पहुंच रहे हैं।करीना कपूर का वह पीला स्कूटर अभी भी वहां है जिस पर बैठ लोग तस्वीरें लेते हैं। थ्री इडियट में दिखती लद्दाख की निश्छल खूबसूरती  नए की तलाश में भटकती हिन्दी सिनेमा के लिए भी आकर्षण का केन्द्र बनी और ट्यूबलाइट जैसी बडी फिल्म के साथ सलमान पहुंचे।इसके पहले पूजा भट्ट को लद्धाख में शूटिंग का श्रेय जाता है जिन्होंने अपनी पहली फिल्म पाप की पूरी शूटिंग लद्दाख को मोनेस्ट्री और पहाडियों में की।शाहरुख खान यश चोपडा की जब तक जान हैं को लेकर लद्दाख पहुंचे थे।उल्लेखनीय है कि आज लद्दाख की पहचान सिर्फ शूटिंग लोकेशन के रुप में नहीं,सिनेमा में सार्थक हस्तक्षेप के लिए भी है।वहां के या फिल्मकार अपने सीमित संसाधनों में अपने लोगों के साथ फिल्म बनाकर राष्ट्रीय पहचान दर्ज कर रहे हैं,यहां बीते वर्ष सर्वश्रेष्ठ फिल्म के रास्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित वाकिंग विद द विंड का स्मरण स्वभाविक है।बीते कई वर्षों से आयोजित होने वाला लद्दाखी फिल्म फेस्टिल में देश और दुनिया के नामचीन फिल्मकार शिरकत कर रहे हैं।इसे दुनिया में सबसे अधिक उंचाई पर होने वाला फिल्म फेस्टिवल माना जा रहा है। अब जबकि लद्दाख को एक अलग केंन्द्र शासित प्रदेश बनाने का निर्णय लिया जा चुका है,निश्चित रुप से सिनेमा में एक प्रभावशाली हस्तक्षेप के लिए हमें ज्यादा प्रतीक्षा नहीं करनी पडेगी।                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                               

रविवार, 23 जून 2019

सिनेमा में गणित


सिनेमा को कलाओं की कला और विज्ञानों का विज्ञान कहा गया है।लेकिन यहां यह नजरअंदाज कर दिया जाता रहा कि वास्तव में सिनेमा गणित है,जिसका ख्याल इसकी शुरुआती दिनों से ही रखा जाने लगा था।आखिर जब 10 करोड की बनी फिल्म के प्रचार प्रसार पर 15 करोड का बजट हो,तो इसमें कौन सी कला,कौन सा विज्ञान। इस गणित की अभिव्यक्ति कभी सिल्वर जुबली,गोल्डन जुबली में अभिव्यक्त होती तो ,कभी वीकएंड कलेक्शन में ।कभी म्यूजिक राइट्स के रुप में तो कभी डिजीटल राइट्स के रुप में।कुल मिला कर मुद्दा यह कि फिल्म बनी कितने में और कमाई कितनी की।मतलब शुरुआत गणित से और अंत गणित से।जाहिर है 100 वर्षों से अधिक की सफल यात्रा के बाद आज सिनेमा यदि विश्व के नामचीन चर्चित गणितज्ञों की शरण में अपने को सुरक्षित करने की कोशिश कर रही है तो यह अस्वभाविक नहीं।
पटना के गणितज्ञ आनंद कुमार पर ऋतिक रोशन अभिनीत सुपर 30 रिलीज के लिए तैयार है। समकालीनता में कहानी ढूंढने वाले प्रकाश झा बिहार के ही गणितज्ञ वशिष्ठ नारायण सिंह पर फिल्म बनाने को तैयार हैं।डर्टी गर्ल विद्या बालन गणितज्ञ शकुंतला देवी को परदे पर साकार करने को तैयार है। रामानुजन पर अंतरराष्ट्रीय स्तर की कई फिल्में आ चुकी हैं।हालिवुड की बात करें तो नोबल से सम्मानित गणितज्ञ जान नैस के जीवन पर  ए ब्यूटीफुल माइंड जैसी अविस्मरणीय फिल्म बनी,जिसे2002 में सर्वश्रेष्ठ फिल्म के आस्कर पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।  स्टीफन हाकिंस के जीवन पर पर 1991 में ए ब्रीफ हिस्ट्री आफ टाइम एरोल मारिस के निर्देशन में, फिर 2014 में द थ्योरी आफ एवरीथिंग बनी। 2016 में गणितज्ञ कैथरिन जानसन के जीवन पर हिडन फिगर्स बनी।रूसी गणितज्ञ सोफ्या कोवालसक्या के जीवन पर चार फिल्मों की एक महागाथा भी इसी नाम से बनायी गई। 2015 में निर्देशक मैथ्यू ब्राउन ने महान भारतीय गणितज्ञ रामानुजन के जीवन पर द मैन हू न्यू इनफिनिटी बनायी। हालिवुड में गणितज्ञों  पर या गणित पर केंद्रित इसके अलावे भी अगोरा जैसी कई फिल्में बनी ,हिन्दी में या कहें भारत में   गणित की कोचिंग पढाने वाले आनंद कुमार को यदि गणितज्ञ मानें, तो उनकी बायोपिक के रुप में चर्चित सुपर 30 को इस दिशा में एक नई पहल मान सकते हैं।
क्वीन और शानदार जैसी फिल्म में अपनी रचनात्मकता का दो चरम दिखा चुके विकास बहल के निर्देशन में बनी सुपर30 पटना में अवस्थित विश्व भर में अपनी सफलता के लिए चर्चित एक आइ आइ टी कोचिंग संस्थान सुपर 30 के मालिक आनंद कुमार के जीवन संघर्ष और सफलता पर केंद्रित है।इनकी सफलता और संघर्षों पर हालांकि डिस्कवरी और बी बी सी सहित कई देशी विदेशीचैनलों के लिए डाक्यूमेंट्री बन चुके हैं।बच्चों को निशुल्क शिक्षा देने के लिए इनका नाम गिनीज बुक आफ लिम्का में भी दर्ज है। मुश्किल यह है कि सुपर30 को एक गणितज्ञ की बायोपिक मानी जाय या कोचिंग संचालक की। लगातार सफलताओं के बावजूद इनका कोचिंग भी कभी विवादों से परे नहीं रहा। यह भी कमाल है कि सुपर 30 के बैनर से कोई संस्था अस्तित्व में नहीं है,आनंद कुमार के संस्थान का नाम रामानुजन स्कूल आफ मैथेमेटिक्स है,जिसमें हजार से भी अधिक बच्चे पढते हैं।उनमें से 30 को चुनकर आइ आइ टी की खास तैय़ारी करायी जाती है, जिसे सुपर 30 का नाम दिया गया है।बीते वर्ष ही आइ आइ टी के ही चार छात्रों ने बकायदा इन पर एफ आई आर दर्ज कराया कि ये छात्रों को सफलता के नाम पर धोखा देते हैं।यह भी सच है कि विवादों के कारण ही इस फिल्म की रिलीज डेट कई बार आगे खिसकायी गई। लगता है सुपर 30 के रिलीज की अडचनें समाप्त हो गई है और अगले माह यह दर्शकों की अदालत में होगी।
अपने निम्न वर्गीय छवि के लिए सुपरिचित आनंद कुमार को रोमन खूबसूरती के प्रतीक ऋतिक रोशन किस तरह जस्टिफाई करेंगे,देखना दिलचस्प होगा।फिल्म रिलीज के बाद यह तय करना भी आसान होगा कि इसे हिन्दी में गणितज्ञों पर बनने वाली फिल्म की शुरुआत मानें या एक व्यवसायी की सफलता की कहानी। सर्वविदित है कि सुपर30 की नींव बिहार के आइपीएस अधिकारी और डीजीपी रह चुके अभयानंद ने डाली थी। कुछ विवादों के कारण आनंद कुमार से अलग होने के बाद अभयानंद ने माइनरिटी के लिए कोचिंग संस्थान की शुरुआत की,और वहां भी यह सफलता उन्होंने भी दोहरायी।जानकारों के लिए देखना दिलचस्प होगा कि सुपर30 की इस गाथा में अभयानंद कितना और कैसे दिखते हैं।यह भी दिलचस्प है कि सुपर 30 की अधिकांश शूटिंग बिहार से बाहर ही हुई है।बिहार की सघनता और यहां की सांस्कृतिक विशेषता किस तरह विकास बहल साकार कर पाते हैं,इस पर भी बिहारी दर्शकों और आनंद सर के पूर्व छात्रों की नजर भी रहेगी।इस फिल्म का सबसे उल्लेखनीय पक्ष छात्रों की भूमिका में बिहार बाल भवन किलकारी के बच्चों का चयन रहा है।इनमें से कई का चयन प्रकाश झा ने भी अपनी अगली फिल्म के लिए किया है। दशरथ मांझी सहित कई फिल्मों में काम कर चुके हाशिए पर जीवन गुजार रहे इन बच्चों की भूमिका विश्वास है फिल्म को एक नया फ्लेवर देगी।
जो भी हो सुपर30 के साथ हिन्दी सिनेमा के एक नए जोनर में प्रवेश से इन्कार नहीं किया जा सकता। हिन्दी में बायोपिक के नाम पर जहां अभिनेत्रियों,अभिनेताओं और खिलाडियों का चरित्र चित्रण होता रहा है,सुपर 30 को श्रेय दिया जा सकता है कि इसने फिल्मकारों और बडे अभिनेताओं की हिचक तोडी।कहीं न कहीं गणित तक के इस सफर में सिनेमा का गणित ही बाधक भी बना रहा।सिनेमा के विषय का आधार कहीं न कहीं उसकी सफलता से तय होती रही है। यदि सिल्क स्मिता को देखने दर्शक आने की उम्मीद हो तो डर्टी फिक्चर ही बनेगी,यदि सजायाफ्ता अभिनेता में दिलचस्पी हो तो संजू भी बन सकती है।हिन्दी में धोनी ही नहीं अजहरुद्दीन की बायोपिक बनी है।ऐसे में अपनी विद्वता से पहचान बनाने वाले वशिष्ठ नारायण सिंह या शकुंतला देवी पर फिल्म की घोषणा इस बात का स्पष्ट संकेत देती है कि दर्शक बदल रहे हैं।
वास्तव में इसका श्रेय कुछ हद तक मल्टीप्लेक्स को दिया जा सकता है,जहां के छोटी छोटी क्षमता के थिएटर के लिए हरेक दर्शकों की पसंद का ध्यान रखना आसान हो गया है। मल्टीप्लेक्स के मजबूत होने से पारिवारिक दर्शकों की थिएटर तक वापसी भी हुई।ये ऐसे दर्शक थे जिन्हें सेक्स और हिंसा के बजाय कहानी चाहिए।हाल के दिनों में युवाओं के सेक्स और हिंसा की भूख मिटाने का जिम्मा वेबसिरीज ने उठा लिया,युवा दर्शकों के लिए मल्टीप्लेक्स में अधिक आकर्षण बच नहीं गया था।ऐसे में मनोरंजन का बडा सा पेट लिए मल्टीप्लेक्स के लिए नए दर्शक की तलाश आवश्यक थी,जिसे जोडने की कोशिश सुपर30 और शकुंतला जैसी फिल्म से की जा रही।ये ऐसे व्यक्तित्व हैं जिनसे आमलोग इमोशनली जुडे हैं।ये मध्यवर्ग या निम्न मध्यवर्ग से आए हैं,इनकी सफलता में कोई भी अपने सपने की झलक देख सकता है।
शंकुतला देवी के पिता सर्कस में काम करते थे। वे भी उनके साथ रस्सी पर चलने का कारनामा और जादू दिखाया करती थीं। उनके पिता ने शकुंतला को अपनी कई सारी ट्रिक सिखा दी थीं। एक दिन  शकुंतला को ताश के पत्तों का खेल सिखाते हुए उन्हें लगा कि उनकी बेटी की याद्दाश्त बहुत तेज है। शकुंतला के पिता को संख्याओं के प्रति उनकी याद्दाश्त पर धीरे-धीरे इतना विश्वास हो गया कि उन्होंने अपना सर्कस बंद कर दिया और शंकुतला की संख्याओं को याद रखने की क्षमता दिखाने लगे। 18 जून, 1980 को उन्होंने 13 अंकों की संख्याओं का गुणा करके दिखाया था। यह संख्या थी 76,86,36,97,74,870 × 24,65,09,97,45,779। जबकि इस सवाल के बारे में पहले से किसी को नहीं पता था. इसे इंपीरियल कॉलेज, लंदन के कंप्यूटर डिपार्टमेंट के स्टूडेंट्स ने तुरंत तैयार किया था। विद्या बालन इस गणितज्ञ शकुंतला देवी पर बनने जा रही फिल्म में लीड रोल निभाती नजर आएंगी। शकुंतला देवी को उनकी अविश्वसनीय रूप से तेज गणना करने की क्षमता की वजह सेमानव कंप्यूटर' भी कहा जाता था,हालांकि उन्हें कभी कोई औपचारिक शिक्षा नहीं मिली, लेकिन उनकी प्रतिभा ने उन्हें 1982 के द गिनेज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स' में भी जगह दिलायी।  'द शकुंतला देवी' फिल्म को अमेजॉन प्राइम की ओरिजिनल 'फोर मोर शॉट्स प्लीज' के डायरेक्टर अनु मेनन बना रही हैं। इसकी कहानी अनु मेनन और नयनिका महतानी ने लिखी है और संवाद इशिता मोइत्रा ने लिखे हैं। फिल्म के 2020 के इन्हीं महीनों में रिलीज किए जाने की उम्मीद है।
इसी तरह डा.वशिष्ठ नारायण सिंह का जन्म भी भोजपुर जिले के अति सामान्य परिवार में हुआ था।नेतरहाट आवासीय विद्यालय से 1962 में मैट्रिक की परीक्षा में राज्य में टाप कर पटना साइंस में दाखिला लिया।वहां इनकी प्रतिभा को देखते हुए दो वर्षों में ही स्नातक की डिग्री मिल गई।कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी में इन्होंने शोध कर डाक्टरेट की उपाधि प्राप्त की। इन्हें अमेरिका के चर्चित अपोलो मिशन में भी काम करने का मौका मिला। इन्होंने आंइस्टीन के सापेक्ष सिद्धांत को चुनौती दी थी। कहा जाता है कि नासा में अपोलो की लांचिंग से पहले जब 31 कंप्यूटर कुछ समय के लिए बंद हो गए तो कंप्यूटर ठीक होने पर उनका और कंप्यूटर्स का कैलकुलेशन एक था।लेकिन कुछ ही समय के बाद ये भारत लौट आए।लेकिन देश लौटने के कुछ ही दिनों बाद ये मानसिक रोग से ग्रसित हो गए। डा.सिंह अभी भी उसी अवस्था में अपने गांव में रह रहे हैं। अब प्रकाश झा के निर्देशन में उनकी बायोपिक बनाने की घोषणा की गई है।. फिलहाल इसकी कास्टिंग पर काम हो रहा हैं 
यह शुरुआत मान सकते हैं गणितज्ञों के प्रति सिनेमा की यह सहजता उम्मीद देती है कि आने वाले दिनों में हम प्रेमचंद,परसाई और अज्ञेय पर भी फीचर फिल्म देख सकते हैं।कहानियां तो इनके जीवन में भी कम नहीं

मंगलवार, 5 मई 2015

बेहतर सिनेमा के सपने को सम्मान


मेरे पास मां है,भारतीय सिनेमा के इतिहास में शशिकपूर को अमर बनाने के लिए दीवार का यही एक संवाद काफी था,लेकिन अब जब 77 वर्ष की उम्र में उन्हें दादा साहब फाल्के अवार्ड से सम्मानित के जाने की घोषणा हुई तो यही माना जा सकता है,यह शशि कपूर से कहीं अधिक उनके सिनेमा का सम्मान है,उस सिनेमा का जो उनके सपनों में बसता था, जिस सिनेमा के लिए उन्होंने अपनी पूरी सफलता दांव पर लगा दी थी। शशि कपूर ने कहने को 150 से भी अधिक फिल्मों में काम किया,यदि इनमें से कुछ आरंभिक दौर की फिल्मों को छोड दिया जाय तो अधिकांश काफी सफल रहीं।इसके बावजूद शशि कपूर जब 1978 में जब फिल्म निर्माण में आए तो शुरुआत जूनून से की।1857 के दौर पर ऐतिहासिक संदर्भों के साथ श्याम बेनेगल के निर्देशन में बनी यह फिल्म अपने आप में यह कहती लगती थी कि शशि कपूर आखिर सिनेमा से चाहते क्या थे। जुनून नहीं चली,लेकिन बेहतर सिनेमा के प्रति शशि कपूर ने अपने जुनून के कभी विराम नहीं दिया। वास्तव में शशि कपूर के अभिनय की स्कूलिंग जहां से हुई थी, फकीरा का विजेता के रुप में रुपांतरण अस्वभाविक भी नहीं था। 
पृथ्वीराज कपूर के सबसे छोटे बेटे के रुप में जन्में शशि कपूर के लिए भी बाकी कपूरों की तरह सिनेमा की डगर आसान नहीं रही थी। पृथ्वी राज कपूर एक सख्त अभिभावक थे और उन्होंने कभी किसी बेटे को अपने पोजिशन का लाभ नहीं उठाने नहीं दिया।शशि कपूर की प्रतिभा हालांकि आग और आवारा जैसी फिल्मों से बाल भूमिकाओं में ही दिखने लगी थी,लेकिन पृथ्वीराज कपूर ने उन्हें थियेटर में सक्रिय होने की सलाह दी।पृथ्वी थियेटर में काम करते हुए शशि कपूर ब्रिटेन के नाटककार केण्डेल के संपर्क में आए जो अपनी नाट्यकंपनी शेक्सपियेराना के साथ भारत आए हुए थे। शेक्सपियेराना के साथ शशिकपूर को देश के कई रंगमंच पर उतरने का मौका मिला। शेक्सपियेराना ने उन्हे जीवन के अनुभवों के साथ जेनिफर केण्डेल जैसी पत्नी भी दी,जिनके साथ ने शशि कपूर के जीवन को दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। अस्सी के दशक में शशि कपूर जब सहनायक के रुप में सफलता का नया व्याकरण रच रहे थे,उसी समय जेनिफर की असमय मौत ने उन्हें तोड ही नहीं दिया,उनके जीवन की दशा और दिशा भी बदल दी।वे सिनेमा से भी लापरवाह हो गए और सबसे दुखद अपने आप से भी।
शशि कपूर ने परदे पर अभिनय की शुरुआत 1961 में यश चोपडा की निर्देशक के रुप में पहली फिल्म धर्मपुत्र से की,फिल्म हालांकि नहीं चली लेकिन अपने विषय के कारण आज भी याद की जाती है। प्रेमकथाओं के उस दौर में शशि कपूर को चार दीवारी’, ‘मेहंदी लगी मेरे हाथ’, ‘प्रेमपत्र’, ‘मोहब्बत इसको कहते हैं’, ‘नींद हमारी ख्वाब तुम्हारे’,’जुआरी’,’कन्यादान’, ‘हसीना मान जाएगी जैसी कई फिल्में मिलीं,लेकिन ज्यादातर फ्लॉप रहीं। यह वह दौर था जब दिलीप कुमार, राजेन्द्र कुमार,देवआनंद जैसे अभिनेता सफलता के पर्याय के रुप में स्थापित थे,जाहिर है शशिकपूर को सफलता के लिए प्रतीक्षा करनी पडी।1965 में जब जब फूल खिले आयी और कश्मीरी हाउसबोट मालिक के रुप में अपनी सहज मुस्कान और खूबसूरत चेहरे से प्रशंसकों की कतार खडी कर ली,जो अब उनकी फिल्मों की प्रतीक्षा कर रही थी। 70 के दशक में उनकी व्यस्तता का यह आलम था कि एक साथ तीन तीन शिफ्टों में वे शूटिंग किया करते थे। यह शशि कपूर का आत्मविश्वास ही था कि उन्होंने कभी भी किसी स्टार या अभिनेता के साथ काम करने में कभी संकोच नहीं किया,न ही कभी अपनी भूमिका के लिए चिंतित रहे।राजेश खन्ना जब निर्विवाद सुपर स्टार थे,शशि कपूर ने प्रेम कहानी जैसी फिल्म में सहनायक की भूमिका में उतरने का जोखिम उठाया,अमिताभ बच्चन के साथ तो कभी कभी,दीवार,सुहाग,इमान धरम,त्रिशूल,काला पत्थर, दो और दो पांच’, सिलसिला’, ‘नमक हलाल जैसी फिल्मों में कमजोर चरित्र के बावजूद वे आते रहे।शत्रुघ्न सिन्हा का भी आ गले लग जा और गौतम गोविंदा जैसी फिल्म में साथ निभाया। वास्तव में इन फिल्मों को देखते हुए यही कहा जा सकता है कि शशि कपूर के लिए महत्वपूर्ण सिर्फ और सिर्फ काम रहा। आश्चर्य नहीं कि लगातार काम करते हुए कभी भी किसी अवार्ड के लिए उन्हें नामांकन नहीं मिल सका।शायद शशि कपूर को भी पता था कि वे इन फिल्मों के लिए नहीं बने हैं।
बेसिरपैर की भूमिकाओं और सिनेमा के प्रति शशि कपूर की अनथक दौड का अर्थ उनके प्रशंसकों को तब समझ में आया जब उन्होंने  शेक्सपीयरवाला के नाम से अपने होम प्रोडक्शन की शुरुआत की। इस बैनर माध्यम से उन्होंने श्याम बेनेगल,गोविंद निहलाणी,अपर्णा सेन,गिरीश कर्नाड जैसे अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता के लिए चर्चित फिल्मकारों के सहयोग से जूनून (1979), कलयुग (1981), ‘36 चौरंगी लेन (1981), ‘विजेता (1983) तथा उत्सव (1985) जैसी फिल्म का निर्माण कर हिन्दी दर्शकों को एक नए सिनेमा का आस्वाद दिया। अनुभवी शशिकपूर को पता था कि इन फिल्मों का व्यवसायिक हश्र क्या होने वाला है,लेकिन शायद कहीं न कहीं रंगमंच की वैचारिक प्रतिबद्धता का दवाब था कि शशि कपूर पीछे नहीं मुडे। उन्होंने शेक्सपीयरवाला के साथ अपने जीवन का एक बडा हिस्सा पृथ्वी थियेटर के रुप में रंगमंच को समृद्ध करने में लगा दिया,जिसका निर्वहन आज भी उनकी बेटी संजना कपूर पूरे उत्साह के साथ कर रही है।
यह हिन्दी सिनेमा के परंपरागत अभिनेताओं से इतर दिखती परिपक्वता ही थी कि ब्रिटिश फिल्मकारों के वे प्रिय अभिनेताओं में रहे।1972 में कोनार्ड रुक्स की सिद्धार्थ में जब भारतीय चेहरे की बारी आयी तो शशि कपूर का विकल्प नहीं था। जेम्स आइवरी-इस्माइल मर्चेण्ट की फिल्म शशि कपूर से ही जानी और देखी जाती थी। द हाउस होल्डर (1963), ‘शेक्सपीयरवाला (1965), ‘बॉम्बे टॉकी (1970) तथा हीट एंड डस्ट (1983) में अभिनेता के तौर पर उनकी उंचाई किसी को भी चमत्कृत कर सकती है। 1993 में इन्होंने मर्चेंट आइवरी की के साथ इन कस्टडी(मुहाफिज) पूरी की,एक शायर की ढलती हुई जिंदगी को निभाते हुए उन्हें शायद ही अहसास होगा कि यही उनकी जिंदगी का सच बनने जा रहा है।

आज शशि कपूर अस्वस्थ हैं। व्हील चेयर पर हैं। तब उन्हें दादा साहब फाल्के अवार्ड दिया जा रहा है। वास्तव में यह अवार्ड शशि कपूर को नहीं बेहतर सिनेमा के लिए देखे उनके सपने को समर्पित माना जा सकता है।