सोमवार, 19 जून 2023

अपनी कहानी देखती आंखें

 


मेरा नाम जोकर बनाने में राजकपूर ने अपनी सारी पूंजी लगा दी थी,यहां तक कि कहते हैं पत्नी के जेवर और अपनी प्रतिष्ठा के प्रतीक आर के स्टूडियो को भी गिरवी रख दिया था।समय से आगे की भव्य और लगभग सवा चार घंटे लंबी यह फिल्म बुरी तरह फ्लाप हो गई थी।राजकपूर को लग रहा था कि सबकुछ हाथों से निकल गया,तब ख्वाजा अहमद अब्बास उनके पास अमीर उद्योगपति के बेटे और मछुआरे की बेटी की युवा प्रेमकथा लेकर आए। भला राजेश खन्ना और अमिताभ बच्च्न के 75 के उस दौर में युवा प्रेमकथा का जोखिम कौन लेना चाहता, लेकिन राजकपूर तो राजकपूर थे,उन्होंने कहानी में बस एक छोटा सा परिवर्तन सुझाया कि नायक नायिका के मौत के बजाय उसे मिलवा दिया जाय। और फिर जो हुआ वह इतिहास में दर्ज है।बाबी किंवंदति बन गई। बाबी से लेकर स्टूडेंट आफ द ईयर और फिर प्यार का पंचनामा तक हिंदी सिनेमा के लिए युवा प्रेमकथा सफलता का सर्वमान्य फार्मूला बन गई।कहानियां बदलती रही,ट्रीटमेंट बदलते रहे,युवा बरकरार रहे।

सच यही है कि जब भी हिंदी सिनेमा को सफलता की तलब हुई,वह युवाओं के  ही शरण में गई। राजेन्द्र कुमार को अपने बेटे कुमार गौरव को लांच करना हो,या धर्मेन्द्र को सनी देओल को, राकेश रोशन को ऋतिक रोशन को,या फिर ताराचंद बडजात्या को अमेरिका से सिनेमा पढकर लौटे बेटे सूरज बडजात्या को, युवा प्रेम की कहानियों ने हिंदी सिनेमा में इनकी राह सुगम बनायी। लव स्टोरी, बेताब, कहो न प्यार है, मैंने प्यार किया जैसी न जाने कितनी ही फिल्में अपने अपने समय में अपने अपने तरीके से युवाओं से कनेक्ट कर उन्हें सिनेमाघरों तक लाती रही। प्रेमकथाओं से परे भी देखें तो सनी देओल की अर्जुन जैसी फिल्मों में युवाओं की उपस्थिति एक व्यापक दर्शक वर्ग से संवाद करने में सफल रही। आश्चर्य नहीं कि कभी समय था जब युवा हिंदी सिनेमा के सबसे विश्वसनीय दर्शक थे। टेलीविजन के दौर में भी जब मध्यवर्ग के दर्शक,खास कर महिलाएं सिनेमाघरों से दूर हुई,युवाओं ने सिनेमा घरों का साथ नही छोडा।

सिनेमा के प्रति युवाओं की दिवानगी हम तब तक नहीं समझ सकते,जब तक सिंगल थिएटर के उस दौर को याद नहीं कर लें,जब सिनेमाघर की डेढ बाय डेढ फीट की टिकट खिडकी में एक हथेली मोड कर घुसाने की जगह में एक साथ चार हाथ घुसे होते थे।खिडकी के बाहर टिकट के लिए युवाओं की लाइन अपनी जगह और खिडकी के पास शर्ट उतार कर गुत्थमगुत्था होकर टिकट लेने का सुख अपनी जगह।अद्भुत थी सिनेमा के प्रति वह दिवानगी,जब गरमी,उमस,भीड और छोटी मैली कुरसियों वाले  में सिनेमाघर में शरीर के तकलीफ की कीमत पर सिनेमा देख युवा मन का सुख हासिल करते थे।वास्तव में यह सपनों का सपनों से मिलन जैसा था,एक ओर युवाओं के आंखों में भविष्य के तैरते सपने,दूसरी ओर उन सपनों को पुचकारते सहलाते बडे परदे पर झिलमिलाते सपने।इतनी तकलीफ सह कर भी उस दौर में युवा सिनेमा के लिए बेचैन रहते थे तो शायद इसीलिए कि सिनेमा उन्हें अहसास देता था कि वह सब कुछ वे कर सकते ,जो उनके सपनों में तैरते हैं।लेकिन पहले मल्टीप्लेक्स और फिर ओटीटी ने भारतीय दर्शकों की सिनेमा देखने की आदत में जिस तरह बदलाव लाया,उससे सबसे अधिक कोई प्रभावित हुए तो वे युवा थे।मल्टीप्लेक्स ने दो तरह से युवाओं को सिनेमा से दूर होने के लिए बाध्य किया,अव्वल तो टिकट दर जो अठारह-बीस रुपए थी,वह बढकर दो सौ और अब तो उससे भी उपर हो गई।कई खास फिल्मों में,और सिनेमाघरों में यह बढ कर पांच सौ तक भी चली जाती है।ऐसी बात नहीं कि सिनेमा ने युवाओं को जोडे रखने की कोशिश नहीं की।

सिनेमा व्यवसाय को यह गणित तो समझ में आ ही रहा है कि भारत की आधी से अधिक आबादी 25 साल से कम की है,और 65 प्रतिशत 35 साल से नीचे की।एक आंकडे के अनुसार भारत में 15 से 24 वर्ष के युवाओं की संख्या लगभग 25 करोड है,कई यूरोपीय देशों की आबादी से अधिक।भारत को युवाओं का देश इसीलिए कहा जा रहा है कि इसकी औसत आयु 29 वर्ष है,जबकि चीन की 37 वर्ष और जापान की 48 वर्ष।जाहिर है देश के सबसे बडे बाजार को कोई इंटरटेनमेंट इंडस्ट्री नजरअंदाज नहीं कर सकती।आश्चर्य नहीं कि यशराज ने कुछ वर्ष पहले वाय फिल्म्स के नाम से युवाओं के लिए एक अलग प्रोडक्शन की शुरुआत की,जिसके बैनर से लव का द एंड और मुझसे प्रेंडशिप करोगे जैसी फिल्मों के साथ आज के यूथ को आकर्षित करने की कोशिश की। मुझसे फ्रेंडशिप करोगे तो सोशल मीडिया की दोस्ती और ब्रेकअप पर आधारित थी।एक ओर लव का द एंड बन रही थी,तो दूसरी ओर युवा कथा के नाम पर लव रंजन प्यार का पंचनामा की सीरिज ला रहे थे।शाहरुख खान की रेडचिलीज आलवेज कभी कभी जैसी फिल्में लेकर आयी। इसमें से कुछ फिल्में चली भी,कुछ पूरी तरह नकार भी दी गई।लेकिन कुल जमा सच यही था कि देश के वृहतर युवा समुदाय से जुडने में न तो ये फिल्में सफल थी,न ही इनकी कोशिश थी।स्टूडेंट आफ द इयर के युवा छात्र किस धरा धाम से आते थे,हमारे युवाओं के लिए कनेक्ट करना ही मुश्किल था।सिनेमा देखना अलग मामला था,सिनेमा के साथ कनसिसटेंसी बना कर रखना वह अलग।यह सिनेमा कहीं न कहीं उसमें चूकता रहा।

जाहिर है समय के साथ भारत के आम युवाओं के लिए सिनेमा दूर होती चली गई।सिनेमा को भी पता हो गया कि मल्टीप्लेक्स के दर्शक एलीट होंगे,ऐसे जिनके सपने पूरे हो चुके होंगे, उन्हें सपनों से अधिक सच उद्वेलित करेगा।समय के साथ सिनेमा से सपने गायब होते चले गए,उनकी जगह खबरों और सच ने ले ली। जाहिर है सिनेमा ने युवाओं से मुंह मोडा तो युवाओं ने भी विकल्प की तलाश शुरु की,जो कहीं न कहीं ओटीटी पर आकर पूरी हुई लगती है।

इंटरटेनमेंट इंडस्ट्री की बात करें तो जैसे कोरोना काल ओटीटी की जमीन तैयार करने ही आया था।अब तो ओटीटी को सिनेमाघर के विकल्प के रुप में माना जाने लगा हैफिल्में ओटीटी पर रिलीज ही नहीं रही,खास तौर पर ओटीटी के लिए बनाई जा रही हैं।आंकडों के अनुसार 2020 में सबसे अधिक ओटीटी भारत में देखा गया।एक साल में 50 से अधिक फिल्में ओटीटी पर सीधे रिलीज हुई।ओटीटी ने शुरुआती भटकाव के बाद देश के सबसे बडे दर्शक समूह को टार्गेट करने की कोशिश की।उसे पता था कि 89 प्रतिशत दर्शक 35 वर्ष से कम उम्र के हैं। और किसी के नहीं,देश के अधिकांश युवाओं के हाथ में कम से कम 6 ईंच स्क्रीन का स्मार्ट फोन है,जिसमें अनलिमिटेड इंटरनेट सेवा उपलब्ध है।सबसे बडी बात यह ऐसा समूह है जिसे इस यंत्र को आपरेट करने में किसी का सहयोग लेने की जरुरत नहीं।टीवी और सिनेमा से दूर युवा समूह जैसे इसी की प्रतीक्षा में था।जो मिला इसने सब देखा और तालियां बजाई।सक्रेड गेम्स से लेकर मिर्जापुर तक और लस्ट स्टोरिज से गंदी बात तक।लेकिन कह सकते हैं समय के साथ देश के ओटीटी को बाजार की समझ आयी फिर वृहतर युवा समुदाय से संवाद करने की सार्थक कोशिशें भी दिखने लगी।

हाल ही में सोनी लिव पर आयी तिग्मांशु धूलिया की गर्मी आम युवाओं की समस्या को पूरे दम से रेखांकित करती है।किस तरह सुनहरे भविष्य को लेकर आया एक युवा स्थानीय कालेज की राजनीति में फंस कर अपने सपने से दूर होता जाता है।यहां युवा की उपस्थिति से युवा रिलेट कर सकते हैं।ऐसा ही कुछ दिन पहले निर्मल पाठक की घर वापसी में दिखा था,जब एक पढा लिखा युवा अपने गांव अपने रिश्तेदारों से मिलने आता है,लेकिन गांव को अपराध,जातिवाद और शोषण में जकडा देख लौटने की हिम्मत नहीं जुटा पाता और वहीं ठहर कर संघर्ष करता है।कह सकते हैं जो कहानियां हिंदी सिनेमा से अनुपस्थित हो गई थी,ओटीटी ने युवाओं के लिए वहीं से अपनी शुरुआत की। गुल्लक जैसी सीरिज में परिवार के बीच युवा दिखने लगे। जामताडा एक ओर युवाओं की अपराध कथा थी,तो कोटा फैक्ट्री जैसी सीरिज में प्रतियोगिता परीक्षाओं में सफलता का दवाब झेलते युवाओं को पूरी संवेदना से चित्रित करती थी।ऐसा ही कुछ विश्व कल्यण रथ की अमेजन प्राइम सीरिज लाखों में एक में दिखता था।वास्तव में युवाओं के नाम पर जहां सिनेमा अति उच्च वर्ग के बीच विचरती रही,ओटीटी ने निम्न मध्यवर्ग की समस्याओं चाहे जाति हो,चाहे दहेज या फिर कैरियर जैसी समस्याओं को उनके बीच से निकालने की कोशिश की।

जी5 की वेब सीरिज पिचर्स चार दोस्तों के स्टार्ट अप को लेकर संघर्ष की कहानी कहती है।आई टी के क्षेत्र में काम करने वाले ये युवा किस तरह गलतियां करते हैं,लडते हैं और फिर एक साथ संघर्ष करते हैं।वास्तव में हिंदी सिनेमा युवा के नाम पर जहां कबीर सिंह की कहानी सुनाता रहा,ओटीटी का स्टार्ट अप की कहानी की कहानी का चयन युवाओं को पहचानने और उनकी समझ संघर्ष को सम्मान देने की कोशिश को कहीं न कहीं जाहिर करता है।जिन तीन कारणों से युवा सिनेमा से दूर हुए थे,विषय,सुविधा और कीमत,वही तीन को लेकर वे ओटीटी के करीब आते गए।सिनेमा देखने की ऐसी सुविधा पहले कभी नहीं थी।आपके पास कार्यक्रमों की पूरी लाईब्रेरी उपलब्ध है,बस क्लिक करें और देख लें।जो सिनेमा देखने के लिए 500 से हजार का खर्च किया जा रहा था,अनलिमिटेड इंटरनेट की और जगह जगह वाय फाई की सुविधा उसे लगभग मुफ्त में उपलब्ध करा रही है।सबसे बडी सुविधा समय की मिली,आपके पास जितना समय हो देखें,फिर समय मिले तो वहीं से शुरु करे।ओटीटी ने सब कुछ दर्शकों के नियंत्रण में दे दिया।आश्चर्य नहीं कि एक सर्वे के अनुसार 49 प्रतिशत युवा 2 से 3 घंटा हर दिन ओटीटी कार्यक्रम देखते हैं। 2022 में भारत इंटरनेट का 10 वां बडा उपभोक्ता माना गया।

सवाल है क्या वाकई ओटीटी सिनेमा के जादू का विकल्प हो सकता है।अंधेरे में सीधे दिमाग में उतरते सिनेमा और लोकल या मेट्रो की भीडभाड में 6 इंच में आंखें गडाए सिनेमा देखने का प्रभाव क्या एक हो सकता है। सवाल तो यह भी है कि क्या समय का चक्र वापस लौट सकता है।अभी इतना संतोष कर सकते हैं कि पहली बार इंटरटेनमेंट इंडस्ट्री युवाओं के जीवन के यथार्थ को देखने सुनने समझने की कोशिश कर रही है।

रविवार, 18 जून 2023

सच कहने का साहस जागा

 


जयराज और अनिता गुहा अभिनीत1959 में बनी टीपू सुल्तान स्मृतियों में नहीं हो, स्मृतियों में तो 1977 में रज्जाक कैसर के निर्देशन में बनी टीपू सुल्तान भी नहीं होगी, लेकिन 1990 में दूरदर्शन के लिए बनाया गया संजय खान का धारावाहिक स्वार्ड आफ टीपू सुल्तान उस दौर के दर्शकों की स्मृतियों में कहीं न कहीं अभी भी सुरक्षित होगी। स्वार्ड आफ टीपू सुल्तानके 45 - 45 मिनट के 60 ऐपीसोड में सीन दर सीन बस उनकी बहादुरी के, उनकी महानता के किस्से दिखाए गए थे। ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ उनके युदध को वीरता,युद्धकौशल और देशभक्ति की पराकाष्ठा के रुप में दिखाया गया था। इतिहास की किताबों और हिंदी सिनेमा ने मुगल शासकों की कुछ ऐसी ही छवि हमारे लिए निर्मित कर रखी है कि टीपू सुल्तान के साथ तलवार की याद आती। अब आजादी के 75 वर्षों के बाद हम इस सत्य से रु ब रु हो रहे हैं कि टीपू सुल्तान ने 800 मंदिर और 27 गिरजाघर ध्वस्त किए थे,40 लाख हिंन्दुओं को इस्लाम मानने के लिए मजबूर कर दिया था। एक लाख से अधिक हिंदुओं को जेल में डाल दिया गया।कालीकट के 2000 ब्राह्मण परिवारों को समाप्त कर दिया था। 1783 से टीपू ने इस जिहाद की शुरुआत थी। यह जानकारी इरोज इंटरनेशनल की आनेवाली फिल्म टीपूके मोशन पोस्टर में दी जा रही है, और अंत में टीपू के चेहरे पर कालिख लगाये जाते हम देखते हैं।जाहिर है दशकों से सिनेमा जिस झूठ के साथ जीता रहा और दर्शकों तक झूठ परोसता रहा,अब उससे उबरने की कोशिश में दिखने लगा है।

आजादी के बाद से ही भारतीय इतिहास की तरह भारतीय सिनेमा भी एक ऐसी जवाबदेही के दवाब में फंसती चली गई,जो उसे सौंपी ही नहीं गई थी।विभाजन के बाद जिस तरह की सांप्रदायिक हिंसा पूरे देश में फैली उसके तह में जाने के बजाय राजनीतिज्ञों की तरह इतिहासकारों,साहित्यकारों और फिल्मकारों नें भी एक आसान रास्ते का चुनाव किया कि लोगों तक सच पहुंचने ही नहीं दिया जाय,ऐसा सच जिसमें धर्म के नाम पर किए गए क्रूरता की जानकारी हो।धर्म के नाम एक पूरा देश अलग हो गया, कत्लेआम कर दूसरे धर्म के लोगों भागने पर मजबूर कर दिया गया।और यहां सिनेमा गुनगुनाता रहा, न हिंदू बनेगा,न मुसलमान बनेगा,इंसान की औलाद है,इंसान बनेगा। यह तथ्य है कि हिंदी सिनेमा के विकास में विभाजन के बाद भारत लौटे कलाकारों ने अपनी अहम भूमिका निभाई थी। लेकिन उनके सिनेमा को देख ऐसा लगता है विभाजन के खौफनाक मंजर ने उनकी हिम्मत इस कदर तोड दी कि आजीवन वे सच को सच नहीं कह सके। क्या यह सिर्फ संयोग है कि भारत में विभाजन पर फिल्में न के बराबर बनी। जबकि विभाजन झेल कर आए राजकपूर हिना और यश चोपडा फना और वीरजारा बनाने में लगे रहे।

आश्चर्य नहीं कि बीते कुछ वर्षों में पंजाबी में भले ही चार साहिबजादे जैसी मुगलों के बेइंतहा जुल्म को प्रदर्शित करती फिल्में बनी,लेकिन हिंदी सिनेमा के लिए जोधा अकबर का दामन छोडना आसान नहीं था।उधर आतंकवाद से कश्मीर कराह रहा था,और विधुविनोद चोपडा मिशन कश्मीर में फौज के जुल्म की कहानी कह रहे थे।निर्दोष मारे जा रहे थे,और गुलजार साहब माचिस में आतंकियों का भोलापन चित्रित करते कह रहे थे,आतंकवादी खेतों में नहीं उगते।ऐसा जैसे उन्हें पता ही नहीं हो कि किस तरह कश्मीर से लेकर सीरिया तक आतंकियों की खेती हो रही है।ऐसे में हिंदी सिनेमा की सुप्तप्राय समझदारी को विवेक अग्निहोत्री ने द कश्मीर फाइल्स के साथ लगा झकझोर कर जगा दिया हो।दर्शकों के लिए सिनेमा के बडे परदे पर सच को इस तरह देखने का पहला अवसर था, द कश्मीर फाइल्स के बहाने देश ने कश्मीर के आतंकवाद पीडित लोगों से पहली बार खुल कर अपनी एकजुटता प्रदर्शित की।

हिंदी सिनेमा ने महसूस किया कि हिंदी सिनेमा के दर्शक तो पूरी जवाबदेही के साथ सच देखने सुनने को तैयार हैं,कहीं न कहीं उनकी समझदारी पर अविश्वास कर वह चूक कर रही थी।हाल में द केरल स्टोरी जैसी संवेदनशील फिल्म को जिस जवाबदेही के साथ देश के दर्शकों ने देखी,उसकी सराहना की जानी चाहिए।वास्तव में हिंदी सिनेमा पूर्व प्रधानमंत्री के उस वकतव्य से प्रभावित दिखती थी,जिसमें उन्होंने कहा था,देश के संसाधनों पर पहला हक अल्पसंख्यकों का है। हिंदी सिनेमा भी यही मान कर चल रही थी,उसे हर हाल में अल्पसंख्यकों के साथ खडे रहना है।इंतहा कि मैं हूं ना जैसी फिल्म में तो आतंकवादी भी हिंदू परिकल्पित कर लिए गए। मुसलमान मतलब ईमानदार,वचन का पक्का,दोस्ती पर जान देने वाला,गरीबों का रखवाला इसके बरक्स अत्याचारी,बलात्कारी,डाकू सब के सब हिंदू, हर दूसरी फिल्म जब दशकों से चीख चीख कर यही कह रही थी,फिर इसे नहीं मानने का कोई कारण भी नहीं था।

आज भी हिंदी में एक ही बंदा काफी है,बनाना आसान है।यह फिल्म ओटीटी से निकल कर थिएटर तक पहुंच जाती है।लेकिन जब रिलाइंस इंटरनेशनल की अजमेर92 की चर्चा होती है तो एक खास समूह की भवें तन जाती हैं।250 से भी अधिक लडकियों के बलात्कार और कई आत्महत्यों की सच्चाई बडे परदे पर सिर्फ इसलिए नहीं आनी चाहिए थी कि इसके पीछे अजमेर का प्रभावशाली खादिम परिवार जुडा था।संतोष व्यक्त कर सकते हैं कि हिंदी सिनेमा अब इस तरह के सेलेक्टिव नैरेटिव से उबर रही है।आश्चर्य नहीं कि इंदिरा गांधी फिल्म पुरस्कार से सम्मानित  संजय पूरण सिंह चौहान जैसे फिल्मकार की फिल्म 72 हूरें भी अब सिनेमाघरों तक पहुंच रही है।द डायरी आफ वेस्ट बंगाल और गोधरा-एक्सीडेंट या षडयंत्र की घोषणा भी जाहिर कर रही कि हिंदी सिनेमा अपने पूर्वाग्रहों से उबर कर सच के साथ खडे होने को तैयार है।

वास्तव में लंबी प्रतीक्षा के बाद देश को सच जानने का,सच देखने का,सच सुनने का अवसर मिला है।जरुरत है देश की आवाज को समझा जाय,बजाय इसके कि सच को एजेंडा और प्रोपगंडा कह किनारे करने की कोशिश की जाय़।

शुक्रवार, 26 मई 2023

फना - प्रेम पगा आतंकवाद

 


कश्मीर के महाराज हरि सिंह ने भारतीय गणतंत्र में शामिल होना इस शर्त पर मंजूर किया था कि छह महीने के अंदर भारत या पाकिस्तान में शामिल होने के सवाल पर वहां जनमत संग्रह करवा लिया जायेगा, जो आज तक संभव नहीं हो सका। यह एक ऐतिहासिक तथ्य भले ही हो, लेकिन कश्मीर के आतंकवाद के संदर्भ में आज इसे याद करना या करवाया जाना, कहीं न कहीं वहां चल रहे आतंकवाद को वैधता प्रदान करने की कोशिश ही कही जायेगी। वास्तव में भारतीय मानस जब उदार होता है तो सबसे पहले अपना हित त्यागता है। 'फना' में यश चोपड़ा भी अपनी सहज उदारता में इस शर्त को पूरा करने में आये राजनीतिक व्यवधानों को भूल जाते हैं। एक पात्र जब तर्क देता है कि आज स्थितियां बदल चुकी हैं, महाराजा हरि सिंह ने अविभाजित कश्मीर के लिए जनमत संग्रह की मांग की थी, लेकिन आज जनमत संग्रह की बात सिर्फ भारतीय क्षेत्र के लिए की जा रही है तो आतंकवादियों के मनोविज्ञान का अध्ययन कर रही अधिकारी (तब्बू) कहती हैं 'ऐसी बात नहीं है, वहां के आंदोलनकारी अपना एक स्वतंत्र देश चाहते हैं, भारत-पाकिस्तान दोनों से आजाद।' क्या वाकई?

उदारता अच्छी बात है,लेकिन बात जब देश की अखंडता संप्रभुता की हो तो कलाकारों बुद्धिजीवियों को एक क्षण रुक कर जरुर सोचना चाहिए कि कहीं उनकी स्थापनाएं देशहित के खिलाफ तो नहीं जा रही हैं? कितना भी सहृदय होकर हम सोचें आज आतंकवाद के क्रूरतम स्वरूप को देखते हुए इस निष्कर्ष पर पहुंचने की कोशिश कैसे कर सकते हैं कि कश्मीर का आतंकवाद वहां की आजादी की लड़ाई का एक हिस्सा है ?

 'फना' में निर्देशक कुणाल कोहली राजनीतिक मुद्दों को छेड़ते जरूर हैं, लेकिन उसे यशराज फिल्म्स की प्रेम की परम्परा से विचलित भी नहीं होने देते। आतंकवाद और स्वाधीनता आंदोलन की जटिलताओं में उलझने के बजाय, कुणाल फिल्म को प्रेम की परतों को पलटने में व्यस्त रखते हैं। रेहान (आमीर खान) कट्टर आतंकवादी है, जो राष्ट्रपति भवन उड़ाने के मिशन में टूरिस्ट गाइड बन कर दिल्ली में रह रहा है। उसकी मुलाकात जूनी (कालोज) से होती है, जो कश्मीर से एक कालेज टीम के साथ राष्ट्रपति भवन में कार्यक्रम प्रस्तुत करने आयी है। नेत्रहीन जूनी में रेहान को अपनी मंजिल तक पहुंचने का रास्ता दिख जाता है। रेहान के प्रेम के नाटक को जूनी असलियत समझ बैठती है। वह रेहान के प्रेम के अहसास के साथ जीने की जिद में अपने आपको पूर्णतया उसे सौंप देती है। एक समय ऐसा भी आता है जब जूनी के प्रेम के अहसास के सामने रेहान के प्रेम की जरूरत कमजोर पड़ने लगती है। रेहान की कोशिश से जूनी का अंधापन दूर हो जाता है। लेकिन उसके साथ ही राष्ट्रपति भवन के पास हुए विस्फोट में रेहान के मरने की खबर आ जाती है।



जूनी अपने पिता के साथ कश्मीर की घाटियों में रेहान के बच्चे की परवरिश में लगी होती है। इधर भारतीय सेना के एक बेस से एटम बम का 'ट्रिगर' चुरा कर भागते हुए रेहान एक रात जूनी के दरवाजे पर अपने आपको खड़ा पाता है। जूनी उसे पहचान नहीं पाती और रेहान के लिए उसे पहचानने से ज्यादा जरूरी उस ट्रिगर को आतंकवादियों के प्रमुख तक पहुंचाने का मिशन है। आंतंकवाद की ट्रेनिंग किस तरह एक मनुष्य की संवेदना को जर्जर बना देती है, 'फना' में इसकी एक झलक देखी जा सकती है। रेहान को पता है कि जूनी के घर में पल रहा सात साल का बच्चा उसका अपना खून है, लेकिन उसके प्रति भी वह अपने अहसासों को छिपाते हुए कठोर बना रहता है। उसके मिशन के सामने जब भी जो आता है, मारा जाता है, चाहे वह दिल्ली का सरदार कांस्टेबल हो या जूनी के पिता या फिर जूनी के अंकल

अंत के दृश्यों में 'फना' प्रेम और देशप्रेम के द्वन्द्व को रेखांकित करने की कोशिश करती है। रेहान अपने मिशन के लिए प्रेम को छोड़ता है और जूनी भी अपने देश के लिए अपने 'प्रेम' को छोड़ने पर विवश होती है। वास्तव में जिंदगी कभी प्रेम का पर्याय नहीं होती, जैसा आम हिन्दी फिल्मों में दिखता है। यशराज फिल्म्स ने शायद पहली बार प्रेम के व्यावहारिक पहलू को इस रूप में रेखांकित करने की कोशिश की है कि प्रेम के बाहर भी एक बड़ी दुनिया है जो हमारे लिए ज्यादा जरूरी हो सकती है, भावनात्मकता में डूबकर हम इसे पल भर को भूल तो सकते हैं, नजरअंदाज नहीं कर सकते।

रविवार, 14 मई 2023

धर्म ही काटेगा जिहाद का जहर

 



द केरल स्टोरी का सबसे हृदयविदारक दृश्य है जब एक बेटी हार्ट अटैक के कारण अस्पताल में बेहोश पडे अपने पिता के कमरे में आती है,और मां से कहती है हार्ट अटैक अल्लाह का कहर है।फिर अपने पिता के पास जाती है और बेहोश पडे पिता के माथे पर थूक देती है। ...गलती सिर्फ यही कि उसके कम्यूनिस्ट नास्तिक पिता उसके इस्लाम स्वीकार करने के खिलाफ थे। ऐसा इसलिए कि इस्लाम कबूल करते ही उसे बताया जाता है कि जो अल्लाह को नहीं मानता वह काफिर है,और काफिर होने का गुनाह तब तक माफ नहीं होता जब तक उसे पत्थर नहीं मारे जाएं,या उसके माथे पर थूका न जाय। कहां से आती है यह क्रूरता। कल तक अपने बडों के सामने सर झुकाए रखने वाले बच्चे कैसे इतने बदल जाते हैं। सवाल है जीवन के 18 से 20 साल जिस धर्म संस्कृति के साथ उन्होंने व्यतीत किया है,आखिर क्यों एक झटके में उसे खारिज ही नहीं करते,उसे मिटाने के मिशन में लग जाते हैं। इसका जवाब इस सवाल में है कि धर्मान्तरण के इस तरह के विश्वव्यापी दुष्चक्र का सामना करने के लिए हमने अपने बच्चों को कितना तैयार किया है। द केरल स्टोरी के अंतिम दृश्यों में गीतांजली अपने कम्यूनिस्ट पिता से कहती है,इसमें गलती आपकी भी है,पापा, आपने विदेशी दर्शन के बारे में तो बताया,अपने ही धर्म और संस्कृति की कभी चर्चा नहीं की। सच यही है कि वैज्ञानिक शिक्षा के नामपर स्वतंत्रता के बाद से ही धर्म के बारे में हमें बहुत सेलेक्टिव जानकारी दी गई। इस्लाम के जुडते ही सब महान, औरंगजेब और टीपू सुल्तान तक की अच्छाइयां पढाई गई।सूफियों के तो कहने ही क्या। इसके बरक्स रामायण से लेकर वेद तक पर सवाल ही सवाल खडे कर उनसे दूर रखने की कोशिशें होती रहीं।क्या यह संयोग है कि केरल स्टोरी की पृष्ठभूमि केरल बनती है,देश का सबसे पढा लिखा प्रदेश।

द केरल स्टोरी में शालिनी उन्नीकृष्णन,निमाह,गीतांजलि और आसिफा नर्सिंग की पढाई के लिए एक ही कमरे में रहती हैं। आसिफा वास्तव में आइ एस आइ एस के रैकेट का हिस्सा है,जिसमें उसे अपनी साथी लडकियों का धर्मान्तरण कर इस्लाम के लिए लडने सीरिया भेजने की जवाबदेही दी गई है। आसिफा उनके अपने अपने धर्म पर संदेह पैदा कर उनकी आस्था को तोडती है। आसिफा, शालिनी से जब हिंदू देवताओं के बारे में पूछती है तो वह पहले शिव और फिर राम का नाम लेती है। आसिफा कहती है, राम तुम्हारी क्या रक्षा करेगा,जब रावण से अपनी पत्नी को बचाने के लिए उसे वानरों की मदद लेनी पडी। आगे कहती है,कितना कमजोर है तुम्हारा शिव अपनी पत्नी के मरने पर उसकी डेडबाडी लेकर पूरे भारत का चक्कर लगाता है।वह कहती है कैसा है तुम्हारा देवता जो हर लडकी के साथ रासलीला करता है,और डर कर अपना ही राज्य छोड कर भाग जाता है।वह कैसे तुम्हारी रक्षा करेगा।


शालिनी चुप रह जाती,उसे अपने धर्म के बारे में,राम,कृष्ण और शिव के बारे में तो कुछ पता ही नहीं,वह अभिभूत होकर अल्लाह के सर्वशक्तिमान होने के दावे को सुनते रहती है। दिवाली के एक दृश्य में जब उससे इसके रिचुअल्स के बारे में पूछा जाता है,तो वह कहती है,यह बस फेस्टिवल है,बचपन से ही कभी पूजा रिचुअल्स नहीं किया,गौर करें किस तरह दशहरा,रामनवमी,सरस्वती पूजा,गणेश पूजा पर मेले हावी होते गए,और रिचुअल्स कमजोर पडते गए।वास्तव में अपने धार्मिक उत्सवों को भी हमने बच्चों के लिए तमाशे में बदल दिया। कैसे उम्मीद कर सकते कि वे एक संगठित वैचारिक आक्रमण से अपने आपको बचा पाएंगे। 

जबकि फिल्म में दिखता है कि आसिफा को अपने धर्म के बारे में भी पता है और आपके धर्म के बारे में भी। शायद इसलिए कि आसिफा को बचपन से बताया जाता रहा।शालिनी और गीतांजली के लिए अपना धर्म बस मजाक है।लेकिन गौरतलब है कि निमाह को प्रभावित करना आसिफा के लिए आसान नहीं होता।वह जब कहती है गाड का बेटा सूली पर लटकाया जा रहा था,उसे वो बचा नहीं पाया, तुमको कैसे बचा पाएगा, तो निमाह उस पर ऐतराज करती,रोकती उसे गाड के बारे में ऐसा कहने से। शायद इसलिए कि बचपन से ही चर्च जाना,रिचुअल्स में भाग लेना उनकी दिनचर्या में शामिल रहा है। वास्तव में एक हिंदू धर्म ही है शायद, जहां अपने बच्चों को अपने ही धर्म की छाया से दूर रखने की कोशिश की जाती है।रिलिजन के कालम में वे हिंदू लिखते अवश्य हैं,लेकिन उन्हें पता नहीं कि वे हिंदू क्यों हैं। 

बाकी बातें अपनी जगह द केरल स्टोरी का यही सीधा संदेश है। बच्चों को अपने धर्म की मुकम्मल शिक्षा देनी चाहिए। अपने धर्म पर, अपने धार्मिक पहचान पर गर्व करना सिखाना चाहिए। इस्लाम सिखाता है न, कोई भी मुस्लिम कितना भी प्रगतिशील क्यों न हो, कितने भी उंचे पद पर हो,कितना भी पढा लिखा हो। अपने माथे के कालेपन को नहीं छिपाता, अपनी दाढी और टोपी को शान के साथ पहनता, आप किसी मुस्लिम को टीके लगाने की सोच भी नहीं सकते, वह बेहिचक आपको अपनी टोपी पहनाता है। बडी से बडी जवाबदेही छोड कर पांच वक्त नमाज पढने जाता है। वे अपनी धार्मिक किताबें पढता है। हम हिंदू पढना शुरु करते ही सबसे पहले बच्चों को धार्मिक पहचान से मुक्ति देते हैं। कोई जरुरत नहीं जनेउ की,शिखा की,चंदन टीके की,मंदिर जाने की।तुम पढाई पर ध्यान लगाओ। रहा सहा कसर कान्वेंट वाले प्रेयर करवा कर पूरी कर देते हैं। जाहिर है जब वे युवा होते हैं,उन्हें अपने धर्म के बारे में कुछ पता ही नहीं होता,उनकी आस्था अज्ञानता के कच्चे धागे पर टिकी होती है, जो किसी आसिफा के जरा सा झटका देते ही टूट जाती है।

शुक्रवार, 15 मई 2020

लाकडाउन और हिंदी सिनेमा इंडस्ट्री




हिन्दी सिनेमा के इतिहास में 24 मार्च 2020 रोहित शेट्टी की फिल्म सूर्यवंशी की रिलीज के लिए भी याद की जा सकती थी। सिंघम, सिंघम रिटर्न और सिम्बा की सफलता के क्रम में यह उम्मीद की जा रही थी कि अजय देवगण, रणबीर सिंह और अक्षय कुमार अभिनीत उससे आगे की यह पुलिस कथा 2020 में सुस्त चल रही इंडस्ट्री के लिए संजीवनी होगी। फिल्म के रिलीज की सारी तैयारियां हो चुकी थी, ट्रेलर लांच हो चुके थे, रोहित शेट्टी प्रमोशन में अपने तीनों स्टार के साथ लगे हुए थे। कोई शक नहीं कि यह फिल्म 300 करोड से अधिक का व्यवसाय करने के लिए तैयार थी। लेकिन इंडस्ट्री की सारी उम्मीदें धरी की धरी रह गई, अफसोस की यह 24 मार्च 2020 अब हिंदी सिनेमा इंडस्ट्री के सबसे बडे ल़ाकडाउन की शुरुआत के लिए इतिहास में दर्ज हो गई।  
इसके पहले 21 मार्च को ही जब प्रधानमंत्री ने 14 घंटे के जनता कर्फ्यू के लिए लोगों से, जिसमें सिनेमा इंडस्ट्री भी शामिल थी, आग्रह किया तो उम्मीद की जाने लगी थी, कुछ बडे निर्णय की पूर्वपीठिका हो सकती है यह। लेकिन ऐसा लाकडाउन, जो कभी देखा, न सुना गया हो की उम्मीद तो शायद किसी को नहीं थी, सिनेमा इंडस्ट्री को भी नहीं। लाकडाउन के ठीक पहले बागी जैसी सफल सीरिज की तीसरी फिल्मबागी3 रिलीज हुई थी, इरफान खान की आखिरी फिल्म अंग्रेजी मीडियम, जिसे उन्होंने लंबी जानलेवा बीमारी से रिकवर होने के बाद पूरा किया था, दोनों ही फिल्मों से अच्छे खासे व्यवसाय की उम्मीद थी। बागी सीरिज की पहली दोनों ही फिल्मों ने 100 करोड से अधिक की कमाई की थी, लाकडाउन की अफरा तफरी के बावजूद 5 दिनों में 97 करोड की कमाई इसके बडे बिजनेस का आज भी इशारा करती है।अंग्रेजी मीडियम तो सही से अपना खाता भी शुरु नहीं कर पाई।
पहला लाकडाउन 14 अप्रेल तक घोषित था, जाहिर था इंडस्ट्री को उम्मीद थी कि इसके बाद सब पहले का तरह हो जाएगा। इसी समय कार्तिक आर्यन ने लाकडाउन के प्रति आमलोगों को सचेत करते हुए एक महत्वपूर्ण वीडियो जारी किया था। इसके बाद कई अभिनेताओं ने उत्साह में अपने अपने वीडियो संदेश जारी किए। लेकिन उसके बाद लाकडाउन 2 और फिर 3 ने इंडस्ट्री के सारे उत्साह और उम्मीदों को कमजोर कर दिया। साल के पहले दो महिने में लगभग 40 फिल्में रिलीज हुई थी, इसमें से सिर्फ एक फिल्म अजय देवगण की तान्हा जी लगभग 300 करोड के व्यवसाय के साथ हिट मानी गई,जबकि बीते वर्ष 17 फिल्मों ने 100 करोड से अधिक की कमाई कर इंडस्ट्री की उम्मीदें बढा दी थी। जाहिर है इंडस्ट्री इस वर्ष सफलता के लिए थोडी बेचैन थी। हिन्दी सिनेमा इंडस्ट्री की स्थिति कमोबेश दिहाडी मजदूरों सी है। बातें यहां भले ही सौ करोड से कम की नहीं होती हो, सच यही है कि इस सौ करोड के लिए इसे रोज कमाई करनी पडती है, वह भी सौ पचास कर। देश भर में हरेक दिन हरेक दर्शक से आए पैसे से इसके लाभ हानि का हिसाब तैयार होता है, इसीलिए एक दिन के लिए भी बाक्स आफिस का बंद हो जाना इंडस्ट्री के लिए बडा धक्का होता है।
स्वभाविक है विषम से विषम परिस्थिति में भी इंडस्ट्री इस नियति से बचने की कोशिश करती है। लेकिन यह भी सच है कि इस तरह का भले ही नहीं, सिनेमा घरों का बंद होना और शूटिंग का ठप होना इंडस्ट्री ने पहले भी देखे हैं। 2008 मे अपने पारिश्रमिक बढाने और सेवा शर्तों की मांग को लेकर इंडस्ट्री में काम करने वाले लगभग डेढ लाख वर्कर जिनमें स्पाट व्वाय,लाइटमैन,मेकअपमैन से लेकर एक्स्ट्रा कलाकार तक थे, हडताल पर चले गए थे, तो कई दिनों तक फिल्मों और टेलिविजन धारावाहिकों की शूटिंग बंद हो गई थी। कहते हैं बीते 50 सालों में हिंदी सिनेमा इंडस्ट्री की सबसे बडी हडताल थी वह।
ऐसा ही एक मौका 2009 में आया जब कमीशन की मांग को लेकर मल्टीप्लेक्स मालिकों और प्रोड्यूसरों के बीच ठन गई थी। देश के अधिकांश मल्टीप्लेक्स में नई रिलीज बंद हो गई थी। उस समय भी कल किसने देखा, जश्न और न्यूयार्क जैसी फिल्मों की रिलीज टल गई थी। बंदी का एक स्वाद इंडस्ट्री ने 2018 में चखा, जब देश भर के कई राज्यों में स्थानीय निकायों को इंटरटेनमेंट टैक्स लगाने का अधिकार दे दिया गया था। इसकेविरोध में कई राज्यों में तमाम सिनेमाघरों ने अपने शटर गिरा दिए। इसी बंदी मे ठग्स आफ हिंदुस्तान जैसी कई फिल्मों की रिलीज डेट आगे बढानी पडी थी।लेकिन यह भी सच है यह लाकडाउन इन हडतालों या बंद से अलग है। व्यवसाय दोनों में बाधित हुआ, लेकिन वह बंदी अपने नियंत्रण की थी, अपने अधिकार के लिए थी, अपनी इच्छा से थी, यह बंदी किसी के नियंत्रण में नहीं, यह कब समाप्त होगा, किसी को पता नहीं। समाप्त होगा, उसके बाद भी इंडस्ट्री पहले की तरह अपने ढर्रे पर लौट पाएगी, कुछ भी किसी के भी सामने स्पष्ट नहीं। जाहिर है जैसे जैसे समय बीतता जा रहा,इंडस्ट्री से जुडे लोगों के माथे पर लकीरें गहरी होती जा रही हैं।
इस लाकडाउन का इंडस्ट्री में सबसे सीधा नुक्शान यदि किसी को झेलना पडा तो वे यहां के वर्कर हैं। वही स्पाट ब्वाय, लाइटमैन, कारपेंटर से लेकर मेकअपमैन सहायक और एक्स्ट्रा तक। इनकी संख्या लाखों में हैं जिनके घर के चुल्हे स्टूडियों में लाइट साउंड के बाद जलते हैं। यह जरुर है कि उनकी मदद के लिए सलमान खान जैसे कई सितारे आगे आए, लेकिन मेहनताना की जगह मदद कभी नहीं ले सकती। लाकडाउन के कारण सिनेमा घर भी बंद हैं, देश में सिनेमा घरों की कुल संख्या लगभग 9 हजार है, जिसमें 3 हजार के करीब मल्टी प्लेक्स हैं। अब इन सिनेमा घरों और मल्टीप्लेक्स से जुडे कामगरों को देखें तो माना जाता है इनकी संख्या लगभग 5 लाख होगी, जो आज अपने मालिक के रहम पर हैं। कल इनकी नौकरी रहेगी,या नहीं अपने भविष्य से पीरी तरह अनिश्चित। यदि सिनेमा घरों पर आश्रित पार्किंग, काफी शाप,पापकार्न के व्यवसाय से जुडे लोगों को भी जोड लें तो प्रभावितों की संख्या और भी बडी हो सकती है। लाकडाउन का एक प्रभाव तो यह है,लेकिन इसे उस बडे प्रभाव के एक अंश के रुप में देखा जाना चाहिए, जिससे उबरना इंडस्ट्री के लिए आसान नहीं होगा।
हिंदी सिनेमा की औसत कमाई महिने में 4 से 5 सौ करोड तक की मानी जाती है। यदि ओवर सीज बिजनेस को जोड दें तो यह आंकडा और भी बडा हो सकता है। अभीतक के अनुमान के अनुसार एक छोटी सी अनियोजित इंडस्ट्री के लिए हजार करोड के नुक्शान की भरपाई आसान नहीं मानी जा सकती। रोहित शेट्टी की सूर्यवंशी 100 करोड से अधिक की लागत से बनकर तैयार पडी है, इस तरह पूंजी का जाम होना व्यवसाय ही नहीं, सिनेमा की रचनात्मकता के लिए धक्का होगा। आखिर जब तक पुरानी फिल्म सामने पडी है, नई फिल्म पर कोई कैसे काम कर  सकता, और किस उम्मीद पर काम शुरु कर सकता है, इंडस्ट्री में वैसे भी पूंजी रोटेट होती है। यदि मार्च,अप्रेल,मई की बात करें तो सूर्यवंशी के अतिरिक्त एक और महत्वपूर्ण फिल्म प्रतिक्षित थी कबीर खान की 83, भारत के क्रिकेट विश्व कप में विजय पर एक महत्वपूर्ण फिल्म मानी जा रही यह,जिसमें रणबीर सिंह ने कपिलदेव की भूमिका निभायी है। इसी के साथ यशराज फिल्म्स की संदीप और पिंकी फरार,हाथी मेरे साथी के रिलीज की तारीख भी अप्रेल में तय मानी जा रही थी। इसी लाकडाउन के दौरान अमिताभ बच्चन की गुलाबो सिताबो,अभिषेक बच्चन की लूडो, जाह्न्वी कपूर की गुंजन सक्सेना भी रिलीज होनी थी। इसके अलावे भी कई फिल्में हैं जो अपनी पूरी पूंजी समेट कर लाकडाउन के इंतजार में रुकी है। ऐसे में यह कहना मन को बहलाना ही होगा कि लाकडाउन खत्म होते ही हिंदी सिनेमा अपने पुराने रौ में आ जाएगी।
लाकडाउन के कारण जहां फिल्मों की रिलीज रुकी, वहीं कई फिल्मों की शूटिंग भी कैंसिल करनी पडी। करण जौहर की ऐतिहासिक कथानक पर बन रही तख्त के लिए यूरोप में शिड्यूल तय था, अप्रेल में शूटिंग शुरु होनी थी, जिसके लिए भव्य सेट तक तैयार कर लिए गए थे। इस एक फिल्म की शूटिंग रुकने से इंडस्ट्री को 100 करोड तक के नुक्शान की उम्मीद की जा सकती है।ऐतिहासिक सेट को हटाना और फिर बनाना,दोनों ही बडे खर्च की मांग करते हैं। जयललिता के जीवन पर बन रही फिल्म थलाइवी की शूटिंग तमिलनाडु में शुरु हो गई थी,लेकिन अचानक सब समेट कर कंगना को मुंबई वापस लौटना पडा। इस तरह की कई फिल्मों के प्रोडक्शन और पोस्ट प्रोडक्शन के स्थगित हो जाने से हो सकता है कई फिल्म इस घाटे से ऊबर ही नहीं सके, और प्रोजेक्ट बंद कर देना पडे।
अब चिंता लाकडाउन से अधिक इसके भविष्य को लेकर हो रही। क्या जब कभी भी लाकडाउन खत्म होगा,सिनेमा घर उसी तरह सक्रिय हो सकेंगे,शूटिंग उसी तरह शुरु हो सकेगी। अभी की स्थिति से यह स्पष्ट लग रहा है कि स्थिति को सामान्य होने में एक वर्ष से भी अधिक लग सकते हैं। अभी लाकडाउन के बाद सिनेमाघर खोलने की अनुमति मिलेगी भी तो जाहिर है कई सारी शर्तों के साथ, अब उतनी शर्तों के साथ कितने दर्शक सिनेमाघर तक पहुंचने की जहमत उठाएंगे, यह भी एक बडा सवाल है।सिनेमा कभी आवश्यक आवश्यकता तो रही नहीं कि लोग मास्क,सेनिटाइजर और सोशल डिस्टेंसिंग का अनुपालन करते हुए सिनेमाघर आने को तैयार हों। आश्चर्य नहीं कि सिनेमा ने खतरे को भांपते हुए विकल्प ढूंढने की शुरुआत कर दी है।
ईद का त्योहार जो आमतौर पर सलमान खान के लिए सुरक्षित रहता है, इस साल भी ईद 22 मई को सलमान खान की राधे की रिलीज शिड्यूल थी,और सलमान की फिल्म का व्यवसाय हमेशा ही उम्मीद से अधिक रहता रहा है।राधे के 300 करोड से अधिक के व्यवसाय में कोई शक ही नहीं किया जा सकता था,लेकिन अब बदलते हालात में इसके डिजीटल प्लेटफार्म पर रिलीज की खबरें आ रही हैं। 500 करोड की संभावना भले ही नहीं हो,माना जा रहा है कि राधे के लिए 300 करोड तक दिया जा सकता है, जो निश्चय ही सिनेमा के लिए एक बडे द्वार खोलने की संभावना को मजबूत कर रहा। हो सकता है लाकडाउन के बाद रिलीज की प्रतीक्षा में कई रुकी हुई फिल्में डिजीटल रिलीज के लिए तैयार हो सके।
जो फिल्में तैयार हैं उनके बारे में तो नहीं कहा जा सकता, लेकिन सिनेमा देखने के साधन बदलेंगे तो उसके अनुसार सिनेमा को भी बदलना ही होगा। तख्त जैसी फिल्म जिस भव्यता के साथ 70 एम एम के लिए बन सकती, डिजीटल के छोटे स्क्रीन में वह प्रभावहीन हो जा सकता है, ऐसे में सिनेमा को भी वेबसीरिज की तरह अपने को छोटे स्क्रीन के अनुरुप बदलने की शुरुआत करनी पडेगी। हालांकि सिनेमा के परदे पर जिस लार्जर दैन लाइफ को देखने की दर्शकों को आदत लगी है,वह किस हद तक मोबाइल के 6 इंच के स्क्रीन पर स्वीकार्य होगी, देखना दिलचस्प होगा। जैसा कि देखा जा रहा है यह भी यह सकता है कि सिनेमा का विकल्प वेबसिरीज में ढूंढने की नई सिरे से इंडस्ट्री शुरुआत कर दे। आज यूं भी मनोज वाजपेई, पंकज त्रिपाठी, नवाजुद्दीन सिद्दीकी, सेफ अली खान, इमरान हाशमी, विवेक ओबेराय, राधिका आप्टे जैसे मेनस्ट्रीम कलाकार निःसंकोच वेबसीरिज में काम कर रहे हैं। अनुराग कश्यप तो पहले ही डिजीटल को स्वीकार कर चुके, अब कबीर खान,शिरीष कुंदर,विक्रम भट्ट जैसे सफल निर्देशक भी वेबसीरिज लेकर आ रहे हैं। जाहिर है नए माध्यम के लिए सिनेमा को तैयार होने में अधिक मुश्किल नहीं हो सकती।
जिस तरह की शर्तों के साथ लाकडाउन समाप्त हो भी रहे हैं, उससे यह भी स्पष्ट है कि सितारों को अपने फैंस से मिलने का लोभ पर सब्र रखना पडेगा। अमिताभ बच्चन ने 1982 से जलसा पर हरेक रविवार अपने फैंस के सामने आने की शुरुआत की थी, लेकिन कोरोना की गंभीरता को महसूस करते हुए 15 मार्च से ही आपने फैंस से मिलना बंद कर दिया है। अमिताभ की ही तरह अब कोई भी स्टार अपने फैंस के सामने आने का जोखिम नहीं उठा रहे। जाहिर है इससे फिल्मों के प्रमोशन के तरीके बदल जाएंगे।अब सबकुछ वर्चुअल दुनिया में शिफ्ट हो जा सकता है। ट्वीटर पर ही फैंस से बातें होगी और फेसबुक लाइव पर मुलाकातें। लेकिन इसका एक बडा नुक्शान यह होगा कि सितारों के लाइव शो बंद हो जाएंगे,उनके इंटरनेशनल टूर और विभिन्न कार्यक्रमों में शामिल होने भर से जो बडी फी उन्हें मिलती थी,वह पूरी तरह बंद हो जाएगी,जिससे अंततः इंडस्ट्री ही प्रभावित होगी।
लाइव शो स्थगित होने से निश्चित रुप से सैक़डों की संख्या में अवार्ड शो भी प्रभावित होंगे। लाकडाउन के ठीक पहले एक अवार्ड इवेंट बगैर रियल दर्शकों के सिर्फ टेलीविजन कैमरे के लिए संपन्न हुआ।
एक और परिवर्तन जिसके लिए इंडस्ट्री और फैंस को तैयार रहना चाहिए, फिल्म फेस्टिवल पूरी तरह बंद हो जा सकते हैं। क्योंकि फेस्टिवल की परंपरा ही इंडस्ट्री से जुडे दुनियया भर के लोगों से मिलने के लिए शुरु की गई थी,अब जब सबसे बडा खतरा मुलाकातों में ही हो तो कैसे फेस्टिवल हो सकते हैं।करोना के कारण कांस फिल्म फेस्टिवल के भी रद्द होने की खबरें आ रही हैं।12 से 23 मई को फ्रांस में इस फेस्टिवल का आयोजन प्रस्तित था। कहते हैं 52 साल के इतिहास में यह पहली बार होगा जब कांस फेस्टिवल आयोजित नहीं होगा। 1939 में इस फेस्टिवल की शुरुआत हुई थी,द्वितीय विश्व युद्ध के समय एक स्क्रीनिंग के बाद इसे रद्द करने का निर्णय लिया गया था।1968 में कुछ फिल्मकारों के नेतृत्व में प्रदर्शन के कारण इसे एक लप्ताह पहले समाप्त करना पडा था।
हालांकि यह भी सच है कि ये सारी कल्पना आज की स्थिति की गंभीरता को देखते हुए की जा रही है। यह भी हो सकता है कि जिस तरह प्लेग और विभिन्न महामिरियों पर दुनिया ने विजय पायी है,इस कोरोना पर भी हम विजय हासिल कर लें,और एक सामान्य दुनिया एक बार फिर हमारे सामने हो।जिसमें सिनेमा भी हो, सितारे भी हों, फैंस भी हो, लाइव शो भी, फेस्टिल भी, पापकार्न भी हो, कोल्डड्रिंक भी...।आमीन।