शुक्रवार, 4 अप्रैल 2014

सनी लियोनी की स्वीकार्यता के मायने




सनी लियोनी ने प्रियंका चोपडा,करीना कपूर के साथ अभी तक स्क्रीन भले ही शेयर नहीं किया हो,लेकिन 'लक्मे फैशन वीक' जैसे आयोजन में शो स्टापर की भूमिका में सनी ने इनके साथ रैम्प शेयर कर बता दिया कि हिन्दी सिनेमा में अब जल्दी ही उनकी हैसियत को वह चुनौती दे सकती हैं। सनी की फिल्में चलें न चलें, सनी चल रही है। कभी मल्लिका शेरावत के लिए हाय तौबा मचाने वाला हिन्दी सिनेमा अब सनी लियोनी को सर पर बिठाए घूम रहा है। उसे न अभिनय आता है, न ही हिन्दी, बावजूद इसके वह हिन्दी सिनेमा की स्टार है। स्टार याने जिसके नाम से फिल्में बिकती हैं,चलती हैं।वह 'कांति शाह' की नायिकायों की तरह हिन्दी सिनेमा के हाशिए पर नहीं, मुख्यधारा में शामिल है। शर्लिन चोपडा और पूनम पांडे की तरह उससे अछूत की तरह व्यवहार नहीं किया जा रहा। हिन्दी सिनेमा के तमाम बडे सितारे अवार्ड इवेंट्स में सनी के साथ थिरकने को तैयार हैं।बडी कंपनियों के इंडोर्समेंट उसे मिल रहे हैं। टेलीविजन शो में वह परफार्म कर रही है। कपिल शर्मा ने कुछ ही दिन पहले 'कामेडी नाइट विद कपिल' में सनी को बुलाने से यह कहते हुए इंकार कर दिया कि यह पारिवारिक शो है,अब वही कपिल सनी के साथ रागिनी एम एम एम2' का प्रमोशन करते दिख रहे हैं, अपने उसी पारिवारिक शो में।

सनी को हिन्दी सिनेमा में लाने का श्रेय जाता है महेश भट्ट को।पता नहीं 'बिग बॉस' के घर में समय बिता रही सनी में उन्होंने कौन सी अभिनय प्रतिभा देख ली कि बगैर शो के खत्म होने की प्रतीक्षा के वे 'जिस्म2' में मेन लीड का आफर लेकर 'बिग बॉस' के घर पहुंच गए। यह तो महेश भट्ट ही बता सकते हैं कि सनी में आखिर कौन सा स्पार्क उन्हें दिख गया था। क्योंकि इसके पहले सनी जिस रुप में आम दर्शकों के लिए उपलब्ध थी वहां चाहे और जो कुछ दिखता हो अभिनय की तो गुंजाइश नहीं ही थी। यह भारतीय मानस पर महेश भट्ट की पकड ही थी कि उन्होंने सनी के इतिहास को छिपाने की कोई कोशिश नहीं की,बल्कि कह सकते हैं उसके पोर्न इंडस्ट्री से जुडे होने को उन्होंने उसकी यू एस पी के रुप में इस्तेमाल किया। भारतीय समाज में जहां नैतिकता के रेशे से बंधे रहने में लोग अभी भी खुशी महसूस करते हैं, जहां अभी भी वैधानिक रुप से पोर्न उद्योग पूरी तरह प्रतिबंधित है,देखना तक भी। वहां यह यकीन वाकई महेश भट्ट ही कर सकते थे कि हिन्दी दर्शक उसे नायिका के रुप में स्वीकार करेंगे, जिसे 'मैक्सिम' जैसी पत्रिका 2010 में ही टॉप 12 पोर्न स्टार में शामिल कर चुकी हो। महेश भट्ट का यह यकीन गलत भी साबित नहीं हुआ,रणदीप हुडा,अरुणोदय सिंह जैसे सितारों की मामूली सी फिल्म को सनी के आकर्षण ने कमाऊ बना दिया। हालांकि सनी के लिए 'जिस्म2' में अपनी बनी बनायी इमेज से अलग कुछ करना नहीं था,बावजूद इसके हिन्दी दर्शकों के बीच अपनी एक फैन फोलोइंग बनाने में वह सफल रही। आश्चर्य नहीं कि अनिल कपूर, जॉन अब्राहम,कंगना राणावत अभिनीत मल्टीस्टारर 'शूटआउट एट वडाला' में एक खास आयटम नंबर के लिए सनी को साइन किया गया। कहा जा सकता है इस आयटम नंबर के साथ सनी घर घर दिखने ही नहीं लगी,उसकी स्वीकार्यता भी आम हो गई। और आज एकता कपूर जैसा ब्रांड सनी के साथ खडी है।'रागिनी एम एम एस2' कमाई में पहले का रिकार्ड तोडने को तैयार है। भोजपुरी फिल्मों की अश्लीलता से परहेज करने वाली हर मल्टीप्लेक्स में सनी के न्यूड पोस्टर लहरा रहे हैं।

यदि बोल्ड दृश्यों से जोड कर देखें तो सनी की उपस्थिती न तो चकित करती है,न ही चिंतित। हिन्दी सिनेमा ने बी और सी ग्रेड के नाम पर कहीं अधिक नग्नता का बोझ उठाया है। सवाल है पोर्न इंडस्ट्री के एक जाने माने चेहरे की स्वीकार्यता का। कहीं न कहीं महेश भट्ट का नाम जुडा होने से हिन्दी सिनेमा में सनी का खैरमकदम किसी क्रांतिकारी की तरह ही हुआ था।सामाजिक हल्कों में भी उसकी उपस्थिती की यह कहते हुए सराहना की गयी कि अपने अतीत की गलतियों से छुटकारा पाने का हक सबों को मिलना चाहिए।सोशल साइट्स पर महिलाओं के काम के चयन के निर्णय की आजादी के नाम पर उसके पोर्न उद्योग से जुडे अतीत को भी सम्मानित करने की कोशिशें की गयी। सवाल है क्या पोर्न को किसी सामान्य काम की तरह देखा जा सकता है,यदि कोई मजबूरी में जुडता है तो उससे सहानुभूति भले ही हो सकती है,लेकिन एक सामान्य काम की तरह पोर्न को कैसे प्रतिष्ठा दी जा सकती है। महेश भट्ट जैसे लोगों ने तो सनी को साहस का प्रतीक बताने से भी संकोच नहीं किया।वास्तव में सारा मामला मार्केटिंग का है,न्यूड माडलिंग कर लोकप्रियता के लिए पूनम पांडे छटपटाती रह जाती है और हम अपना सारा सद्भाव सनी पर उडेल देते हैं।

वाकई सनी को साहसी मानने में संकोच नहीं होता यदि पोर्न इंडस्ट्री से उसका जुडना किसी मजबूरी के कारण होता।सनी स्वयं गर्व के साथ बताती है कि यह उसका निजी चयन था। भारतीय मूल की अमेरिकन कनाडियन नागरिक सनी को बेहतर परिवार और पारिवारिक सुविधाएं हासिल थी।पढाई पूरी कर उसने नर्सिंग भी ज्वाइन की,लेकिन अमीर बनने की ललक में उसने 'पेंटहाउस' और 'हस्लर' जैसी पत्रिकाओं में न्यूड माडलिंग की शुरुआत की जो अंततः पोर्न इंडस्ट्री तक उसे ले ही नहीं गई,सनी ने अपना स्टूडियो, अपना वेबसाइट खोलकर इंडस्ट्री को मजबूत भी करने की कोशिश की।आश्चर्य नहीं कि हिन्दी सिनेमा से जुडने के बाद भी सनी पोर्न से दूरी नहीं बना सकी।बल्कि इस अवसर का उपयोग उसने पोर्न इंडस्ट्री में अपनी स्थिति मजबूत करने में की। यह हिन्दी सिनेमा का ही कमाल माना जा सकता है कि इंटरनेट पर एक पोर्न स्टार सचिन तेंदुलकर और ऐश्वर्या राय से अधिक सर्च किया जाने लगे। आज भी सनी अपनी पोर्न फिल्मों पर उसी तरह बात करती है जैसे कोई अभिनेत्री अपनी शुरुआती फिल्मों पर करती है।जब वह कहती है मेरे पापा या परिवार ने कभी मेरे काम पर कोई आपत्ति नहीं की,तो समझना मुश्किल होता है वह क्या संदेश देना चाहती है कि नर्सिंग छोड कर पोर्न फिल्मों में उतरना उसका सही कदम था। सनी की बातचीत अब किसी एडल्ट साइट की मोहताज नहीं,प्रतिष्ठित हिन्दी अखबारों के पूरे पेज पर वह आ रही है,और हिन्दी समाज पोर्न को एक सामान्य काम की तरह माने जाने की उसकी वकालत पर तारीफ में जुटा है। भारतीय समाज में वाल्मिकी हर काल में स्वीकार्य रहे हैं, आपत्ति सनी की स्वीकार्यता पर भी नहीं होती,यदि सनी अपने अतीत को गौरवान्वित करने की कोशिश नहीं करती।लेकिन सनी की हमेशा कोशिश पोर्न को गौरवान्वित करने की रही है,शायद इसलिए कि हिन्दी सिनेमा उसके लिए माध्यम भर है, अपनी पोर्न के व्यवसाय के विज्ञापन का।कुछ ऐसे ही जैसे लक्ष्य बैगपाइपर शराब बेचना होता है,लेकिन बेचा बैगपाइपर मिनरल वाटर है।  

जाहिर तौर पर यह भारतीय समाज में पोर्न उद्योग को सम्मानित और स्वीकार्य बनाने की शुरुआत है। अगली कडी में 'शांति डाइनामाइट' हिन्दी सिनेमा की प्रतीक्षा सूची में है। यदि समय रहते इसे नियंत्रित करने की कोशिश नहीं की गई तो हमें तैयार रहना होगा कि यहां भी नर्सिंग के स्थान पर पोर्न के चयन को तरजीह दी जाने लगेगी,इस उम्मीद पर कि हिन्दी सिनेमा के रास्ते सुगम हो जायेंगे।

महिला सशक्तिकरण से आगे की कथा कहती क्वीन


पेरिस पहुंच कर भी निर्देशक का कैमरा नहीं भटकता हो तो उनके धैर्य को दाद देनी ही पडेगी। आमतौर पर हिन्दी सिनेमा में विदेशी लोकेशन का अर्थ वहां की सडकें,मकानें,पार्क,समुद्र,पहाड,झरने ही रहे हैं।बाकी की तो बात ही छोड दे,संगम’,’दिलवाले दुल्हनियां ले जाएंगे से लेकर जब तक है जान तक विदेश पहुंचते ही कैमरे की कोशिश अधिक से अधिक खूबसूरत ,नयनाभिराम दृश्यों को समेट लेने भर की दिखती रही है ताकि दर्शकों को विस्मित किया जा सके। विकास बहल की क्वीन इस मायने में असाधारण फिल्म है कि दो तिहाई से अधिक पेरिस और एमस्टर्डम में शूट होने वाली इस फिल्म में शहर उतना ही दिखता है,जितना कहानी के लिए अनिवार्य होता है। यहां पेरिस की उपस्थिती कहानी को विचलित नहीं करती,मजबूती प्रदान करती है।यहां तक कि एफिल टावर के पास जाकर भी फिल्मकार दर्शकों को एफिल टावर देखने का अवसर नहीं देता। परदे पर एफिल टावर दिखता है,लेकिन उतना ही,जितना पात्र देखता है।विदेश में फिल्मायी गयी हिन्दी की यह शायद पहली फिल्म होगी,जिसमें कहानी और पात्र से इतर कुछ नहीं दिखता।

अंतर्राष्ट्रीय होने की कई परिभाषाएं हो सकती हैं, देशों की सीमाओं से परे मानवीय संवेदना को स्थापित करने के कारण भी यदि किसी फिल्म को अंतरराष्ट्रीय माना जा सकता है तो क्वीन शायद हिन्दी की पहली फिल्म होगी।अकेले पेरिस घूमने वाली रानी(कंगना राणावत) को अमस्टर्डम में तीन रुममेट मिलते हैं,एक जापानी,एक रसियन और एक अफ्रिकन। रानी उनकी भाषाएं नहीं जानती,वे रानी की भाषा नहीं समझते,लेकिन साथ रहते चारों की अद्भुत बांडिंग बन जाती है। बाथरुम में छिपकिली देख कर रानी की चीख निकल जाती है, वह निकल कर भागती है,बाद में वे तीनों भी झांकने जाते हैं और उसी तरह चीख मार कर भागते हैं,उन्हें किसी भाषा की जरुरत नहीं होती।ये चारों एक दूसरे की भाषा नहीं समझते,लेकिन एक दूसरे की भावनाएं समझते हैं।और बगैर कोई रिश्ता कायम किए एक दूसरे के लिए खडे होते हैं,रिश्ता मतलब कायदे की दोस्ती भी नहीं दिखती उनके बीच,बस एक ही रिश्ता दिखता है,आदमी होने का। जब औरत मर्द के रिश्ते में सेक्स को अनिवार्य ही नहीं,सहज भी माना जाता हो,वहां तीन अजनबी पुरुषों के साथ संबंध को जिस कोमलता और सहजता से बगैर किसी नाटकियता के विवेक स्वीकार्य बनाते हैं,चकित करता है।

फिल्म में अलग अलग देशों के कई चरित्र है,और वे सब अपनी अपनी पहचान के साथ कहानी मे गुंथे हैं। न तो रानी पर फ्रेंच सीखने का दवाब दिखता है,न ही रानी किसी को हिन्दी सीखने के लिए प्रेरित करती है,बस एक स्वभाविक भावनात्मक रिश्ते में लोग जुडते चले जाते हैं। पूरी फिल्म में सभी अपनी अपनी भाषा में बात करते हैं, दर्शकों को भी न तो कही डबिंग की जरुरत महसूस होती है,न ही सबटाइटिल की। वास्तव में क्वीन वैश्विक भाइचारे का कोई संदेश नहीं देती,बस स्मारित करती है कि सीमा,भाषा और रंग बदलने से लोग नहीं बदल जाते।

स्वाद के लिए मशहूर एक रेस्टोरेंट मालिक को रानी अपने खाने को भारतीय मशाले से बेहतर बनाने का सुझाव देती है। सुझाव से चिढा वह फ्रेंच मालिक एक दिन खाना बनाने की एक प्रतियोगिता में रानी को अपने भारतीय खाने के साथ शामिल होने की चुनौती देता है। रानी अपने तीनों जापानी,रसियन और अफ्रिकन साथी के साथ मिल कर गोल गप्पे बनाती है,और सबसे अधिक बिक्री की चुनौती जीत लेती है। चार देश के लोग मिलकर गोलगप्पे बना रहे हैं,और पांचवे के लोग खा रहे हैं,अद्भुत।यह विकास बहल की पटकथा और निर्देशन की कुशलता है कि ये सारी घटनाएं कहानी के विस्तार में अपने स्वभाविक रौ में आती हैं।अमस्टर्डम में ही उसकी मुलाकात एक पाकिस्तानी लडकी होती है जो एक सेक्स क्लब में काम कर रही है। रानी का परिचय देते ही फ्रेंच में बातचीत की शुरुआत करने वाली वह लडकी खालिस उर्दू में बात करने लगती है। रानी जब उसके काम पर टिप्पणी करती है तो वह कहती है,परिवार की सबसे बडी बेटी थी,अब बेटा बन कर परिवार पाल रही हूं।

वास्तव में यदि महिला सशक्तिकरण का अर्थ महिलाओं का सिर्फ ताकत से सशक्त होना नहीं,बल्कि मन से सशक्त होना है तो विकास बहल अपनी क्वीन को बगैर किसी दावे के आहिस्ते के साथ एक प्रतीक के रुप में दर्शकों के सामने स्थापित करते हैं। यूं तो क्वीन के हरेक दृश्यों पर विस्तार से बात की जा सकती है,लेकिन कुछ दृश्यों में विकास जिस सहजता से विषय को रेखांकित करते जाते हैं,विस्मित करती है।इसलिए नहीं कि दृश्य भव्य हैं,संवाद में गंभीर बात कही जा रही हो,विस्मित अपने नएपन और सार्थकता के कारण करती है।पेरिस में वह रात मे  अकेले सूने सडक से गुजर रही होती है।एक गुंडा उसका बैग छीन कर भागने की कोशिश करता है।पहली बार विदेश गयी रानी बगैर धैर्य खोये बैग की कसकर पकड लेती है, उस अनजान मुल्क की सडक पर अपनी ही भाषा में चीखती है,चिल्लाती है।पकड मजबूत बनाने के लिए वह बैग पकडे हाथों को पैर के बीच दबा लेती है,और बीच सडक पर लोट जाती है।आस पास से लोगों की आवाजें आने लगती है और अंततः वह हट्ठे कट्ठे गुंडे से अपने बैग बचा लेती है।  

रानी राजौरी गार्डन की एक आम लडकी है।पारिवारिक दोस्त के बेटे विजय(राज कुमार राव) से उसकी शादी हो रही है। विजय रानी को पहली ही नजर में दिल दे बैठा था और लगातार पीछा कर रानी को प्रभावित करने में सफल रहा था।लेकिन अब जबकि दो दिन बाद शादी होने वाली है,लंदन से इंजीनियरिंग पढ कर लौटा विजय रानी के देशज व्यक्तित्व के कारण शादी से इन्कार कर देता है।रानी कोई कारण समझ नहीं पाती और टूट जाती है।लेकिन दादी के हिम्मत देने पर वह अपने आपको संभालती है और हनीमून के लिए पेरिस में आरक्षित होटल में अकेले समय बिताने के लिए निकल पडती है। यह वही रानी है जो अपने मंगेतर से भी मिलने अपने छोटे भाई के साथ जाती है। लेकिन अब विजय ने हनीमून पर जो सब दिखाने की उम्मीदे बधायीं थी,रानी वह सब कुछ देख लेना चाहती है।

होटल में ही उसकी मुलाकात रुम अटेंडेंट विजयलक्ष्मी(लीजा हेडेन) से होती है।वह सिंगल मदर है, उसे शराब और सेक्स से परहेज नहीं। लेकिन रानी के लिए वह मायने नहीं रखता, मायने रखता है विजयलक्ष्मी का सद्भाव।विजयलक्ष्मी के साथ एक नई दुनिया से वह रु ब रु होती है।यहां सबसे महत्वपूर्ण उसकी इच्छाएं आकांक्षाएं हैं।विजयलक्ष्मी उसका ख्याल रखती है,लेकिन किसी बडी बहन की तरह नहीं,दोस्त की तरह एक स्पेश देते हुए। विकास की खासियत है कि क्वीन में वे महिला सशक्तीकरण को उसकी शारिरिक स्वतंत्रता से अलग कर देखते ही नहीं,स्थापित भी करते हैं। आजादी रानी को अच्छी लग रही है,लेकिन वह शरीर दिखाने वाले कपडे पहनने को तैयार नहीं हो पाती। क्वीन में परदे पर कई बार ब्रा दिखायी जाती है। कहीं न कहीं विकास 60 के दशक में अमेरिका में शुरु हुए बर्न द ब्रा मूवमेंट का शालीनता से जवाब देते देखते हैं। वे शायद यह दिखाने की कोशिश करते हैं कि ब्रा उतार फेकना आजादी का प्रतीक नहीं हो सकता। विजयलक्ष्मी शराब और सेक्स की चाह में एक क्लब में जाने को तैयार होती है,लेकिन रानी आग्रह करती है,कहीं और नहीं चल सकते,और वह मान जाती है।रानी जब विजयलक्षमी से अलग हो रही होती है तब वह रानी के कुरते में होती है।स्वभाविक है यहां महादेवी वर्मा के उस संस्मरण की याद आती है जिसमें वे अपनी सेविका को हिन्दी नहीं सिखा सकी,लेकिन उन्हें  भोजपुरी सिखा देती है।

विदा लेते हुए रानी कहती भी है।शराब थोडी कम पिया करो,और वो हर किसी के साथ सेक्स भी ठीक नहीं।लेकिन इसी रानी को जब रेस्टोरेंट का मालिक यह कहता है कि गोलगप्पे भले ही हिन्दुस्तानी अच्छे होते हैं,लेकिन फ्रेच किस का जवाब नहीं,तो रानी पल भर नहीं हिचकती उसे किस करने से।निश्चय ही विकास आजादी और अराजकता के फर्क का अहसास कराने की कोशिश करते हैं।

रानी शराब नहीं पीती,सेक्स नहीं करती,सिगरेट नहीं पीती,छोटे कपडे नहीं पहनती..इसके बावजूद पेरिस से लौटने के बाद उसमें इतनी हिम्मत दिखती है कि वह शादी के लिए घिघनते अपने मंगेतर के हाथ में मंगनी की अंगूठी खुद जाकर थमा सकती है। महिलाओं की आजादी के नाम पर शुद्ध देशी रोमांस और सशक्तीकरण के नाम पर गुलाब गैंग जैसे तमाशे के बाद क्वीन वाकई सुकून देती है।

शुक्रवार, 20 सितंबर 2013

हिन्दी के रवि किशन



किसी अभिनेता की दो फिल्में एक साथ रिलीज हों,और दोनो ही फिल्मों में उसके अभिनय और चरित्र को खासतौर से रेखांकित भी किया जाय,अमूमन ऐसा कम देखा जाता है।लेकिन रवि किशन जैसा आमतौर पर हिन्दी सिनेमा के लिए पराया माने वाला अभिनेता जब ऐसा कमाल कर जाता है, तो मानना पडता है जिंदगी में अनुभव और मेहनत कभी न कभी जरुर प्रतिदान देती है। अनुभव और मेहनत का यही प्रभाव देखा जा सकता है,हाल ही में रिलीज 'बजाते रहो' और 'इस्सक' में।एकदम अलग जोनर की सामान्य सी दोनों फिल्मों को यदि कुछ विशिष्ट बनाती है,तो वह है रवि किशन। 'बजाते रहो' में रवि किशन एक चिटफंड बैंक के मालिक बने हैं,जो लोगों को रकम बढाने का झांसा देकर करोडों रुपसे इकट्ठा करता है।लेकिन जब लोगों को रकम लौटाने की बारी आती है तो खुद पीछे हो जाता है और सारी जवाबदेही अपने एक कर्मचारी पर लाद देता है,जो अपमानित होकर आत्महत्या कर लेता है।एक ओर शातिर ठग और दूसरी ओर रईस पंजाबी व्यवसायी सब्बरवाल के दोहरे चरित्र को कुशलता से साकार कर रवि किशन विनय पाठक और रणवीर शौरी जैसे कलाकारों को बराबर की चुनौती ही नहीं देते,अपनी अलग पहचान बनाने में भी सफल होते हैं।इसके ठीक विपरीत मनीष तिवारी की 'इस्सक' में रवि बनारस के बालू माफिया सीता सिंह की दबंग भूमिका में दिखते हैं।जो भूमिका छोटी होने के बावजूद पूरी फिल्म को अपने नियंत्रित रखता है।ये हैं हिन्दी के रवि किशन,अपनी भोजपुरी सिनेमा की जमीन से कोसों दूर। जिसकी गवाही इन्हीं दोनों फिल्मों के साथ में रिलीज हुई उनकी भोजपुरी फिल्म 'धुरंधर' देती भी है।
सिर्फ 'इस्सक' और 'बजाते रहो' में ही नहीं,रवि किशन जब भी ङिन्दी सिनेमा में दिखाई देते हैं,भूमिका  की  लंबाई से परे चमत्कृत करते हैं,चाहे 'रावण' के मंगल हों या '1971' के कैप्टन जैकोब। 1971 के भारत पाक युद्ध पर बनी  पियूष मिश्रा लिखित इस  फिल्म के साथ रामानंद सागर की प्रतिष्ठित फिल्म  कंपनी ने लंबे समय के बाद बडे परदे पर दस्तक ही नहीं दी थी, रामानंद सागर के बेटे अमृत सागर ने निर्देशन की शुरुआत भी की थी। मनोज वाजपेयी,दीपक डोबरियाल सहित दर्जन भर पुरुष अभिनेताओं के बीच भी रवि किशन को भुलाना संभव नहीं होता। खास कर अपने साथी सैनिकों को बचाने के लिए अपनी जान न्यौछावर करने के क्लोज अप में दिखाए जारहे उनके दृश्य में अभिनय की परिपक्वता देखी जा सकती है। मणि रत्नम की 'रावण' में अभिषेक बच्चन के बरक्स रवि की कुछेक दृश्यों में सिमटी छोटी सी भूमिका थी,लेकिन 'द हिन्दू' ने अपनी समीक्षा में खास तौर से रवि के अभिनय की सराहना करते हुए लिखा,अभिषेक बच्चन को रवि किशन से सीखना चाहिए कि किस तरह अभिनेता को पात्र के अंदर प्रवेश करना होता है।'द हिन्दू' की समीक्षा इसलिए भी अतिशयोक्ति नहीं लगती कि आखिर कोई तो बात है कि श्याम बेनेगल,मणि रत्नम,डा.चंद्र प्रकाश द्विवेदी,तिग्मांशु धूलिया,आनंद एल राय जैसे निर्देशक रवि की अभिनय क्षमता पर यकीन कर रहे हैं।'बुलेट राजा' जैसी हार्डकोर कामर्शियल फिल्म में रवि को स्त्री और पुरुष की दोहरी भूमिका सौंपी जा रही है। उल्लेखनीय है कि हिन्दी फिल्मों में रवि के लिए कोई टेलरमेड भूमिका नहीं लिखी जा रही। भोजपुरी में देशज भूमिकाओं की एकरसता के विपरीत हिन्दी में रवि की पहचान विविधता से है,या कह सकते हैं उस अभिनेता के रुप में जो कोई भी भूमिका में अपनी छाप छोड सकता है।'एजेंट विनोद' के रा एजेंट और 'लक' के शातिर अपराधी को देख कर कैसे यकीन किया जा सकता है कि इसकी बुनियाद अभी भी भोजपुरी सिनेमा पर ही टिकी है।
दांत पीस कर और गले फाडकर संवाद बोलते और नायिकाओं के लंहगे को रिमोट से उठाते रवि किशन को देख कर किसी को भी आश्चर्य हो सकता है कि सिर्फ भाषा बदलने  के साथ किसी अभिनेता का अभिनय  ही नहीं,उसका संपूर्ण व्यक्तित्व भी इस कदर किस तरह बदल सकता है। हिन्दी  सिनेमा में रवि की सिर्फ भाषा ही नहीं बदलती लुक से लेकर जेश्चर पोश्चर तक में एक नए रवि दिखाई देते हैं,जो इमरान खान के बरक्स श्रुति हसन जैसी आधुनिका को प्रभावित करने की कोशिश करता है। स्वभाविक सवाल उठता है आखिर रवि किशन अपना उत्कृष्ट हिन्दी के लिए बचा कर क्यों रखते हैं।क्यों नहीं उसका एकांश भी भोजपुरी सिनेमा में प्रदर्शित कर उसे समृद्ध करने की कोशिश करते हैं। जब भोजपुरी में सीजंड निर्देशक किरण कांत वर्मा के साथ रवि किशन 'हमार देवदास' में देवदास की भूमिका में अवतरित हुए तो हर कोई को उम्मीद थी कि भोजपुरी सिनेमा के लिए यह एक प्रस्थान विन्दु बन सकेगा । लेकिन देवदास की कहानी के बावजूद रवि इसे भोजपुरी की सामान्य फिल्म से बेहतर नहीं बना सके।
यह बात सही है कि रवि किशन ने शुरुआत हिन्दी फिल्म से ही की थी, वह भी काजोल जैसी अभिनेत्री के अपोजिट,जितेन्द्र जैसे अभिनेता के साथ, फिल्म थी 'उधार की जिन्दगी'। फिल्म हिट भी हुई लेकिन रवि के लिए मददगार साबित नहीं हुई। रवि को वास्तविक पहचान मिली भोजपुरी सिनेमा से ही । यह संयोग ही कहा जा सकता है कि रवि किशन जब हिन्दी सिनेमा से निराश हो चुके थे, भोजपुरी सिनेमा को सदी के आखिरी दशक में हिन्दी सिनेमा की वह जमीन मिल गई जो डेविड धवन और गोविन्दा की जोडी के साथ कायम भदेशपन के हाशिए पर जाने से खाली हुई थी। यह वह समय था जब हिन्दी सिनेमा एन आर आई  दर्शकों को लुभाने के दवाब में भव्यता को समर्पित होते जा रही थी। स्वभाविक था हिन्दी के मूल दर्शकों को भोजपुरी में थोडा अपनापन दिखा। भोजपुरी फिल्में बनने की गति भी तेज हुई और उसकी सफलता का प्रतिशत भी। इसी जमीन पर उदय हुआ रवि का। उत्तर प्रदेश के जौनपुर से मुम्बई पहुचने वाले रवि के लिए यह सहज भी था। अभिनेता के रुप में रवि की पहचान को भोजपुरी सिनेमा भले ही मजबूत  नहीं कर सकी,एक ब्रांड के रुप में स्टैबलिश होने में रवि को देर नहीं लगी।
लेकिन हिन्दी सिनेमा से शुरुआत करने वाले रवि किशन अपनी क्षेत्रीय पहचान से संतुष्ट नहीं हो सकते थे। भोजपुरी में लोकप्रियता के चरम पर रहते हुए ही उन्हे जब 'बिग बास' में आने का आफर मिला ,तो बेहिचक उन्होंने हामी भर दी ,यह जानते हुए भी कि उनके स्थापित कैरियर के लिए यह खतरनाक हो सकता है। रवि के आत्म विश्वास ने उसका साथ भी दिया और दर्जन भर सेलिब्रेटी के बीच उसने अपने दर्शकों को याद करवा दिया,'जिंदगी झंड बा,फिर भी घमंड बा'।बिग बास के फाइनल तक पहुंचे रवि के व्यक्तित्व और एट्टीट्यड ने हिन्दी सिनेमा को उसे एक बार फिर करीब से जानने का मौका दिया। और फिर रवि ने मिल रहे एक एक अवसर का, चाहे वह छोटा हो या बडा, शिद्दत के साथ उपयोग किया।जो भी चुनौती मिली उसे स्वीकार किया,चाहे वह चितकबरे में नंगे खडे होने का हो या,'4084' में अतुल कुलकर्णी,नसीरूद्दीन शाह, के के मेनन जैसे सीजंड अभिनेताओं के सामने उतरने का,या फिर मेरे डैड की मारुति और तनु वेडस मनु जैसी फिल्मों की छोटी भूमिकाओं में अपनी उपस्थिती दर्ज करवाने का। उल्लेखनीय है कि हिन्दी में लगातार सशक्त होती पहचान के बीच भी रवि भोजपुरी से परहेज करते नहीं दिखते। आज भी रवि किशन की भोजपुरी रिलीज हो रही है,और यहां रवि उसी फूहडता का निर्वाह करते दिखाई देते हे,जिसके लिए भोजपुरी फिल्म जानी जाती है। रवि कहते हैं, सिनेमा एक सामूहिक निर्माण प्रक्रिया है।वह किसी एक के बेस्ट देने से बेस्ट नही हो सकती।कलाकार का अभिनय कई बातों पर निर्भर करता है,पटकथा,निर्देशन, साथी कलाकारों का अभिनय...भोजपुरी सिनेमा की जैसी निर्माण प्रक्रिया है,एक अभिनेता उसे बहुत प्रभावित नहीं कर सकता।जाहिर भोजपुरी में भोजपुरी के व्याकरण में ही मुझे भी काम करना होता है।जबकि जब आप श्याम बेनेगल के साथ काम कर रहे होते हैं या सामने नासिर साहब जैसे महान अभिनेता के सामने होते हैं तो आप स्वयं अपने को बेहतर करने के लिए तैयार कर लेते हैं।

     वाकई हिन्दी सिनेमा में रवि किशन की सफलता कहीं न कहीं भोजपुरी सिनेमा को मुंह चिढाती दिखती है। मराठी,बांग्ला,मलयालम,असमिया..जिस भी भाषा में फिल्म बन रही है,उसके पास अपने अभिनेता हैं,तो अपनी कहानी भी,जिसके बल पर वे फिल्में राष्ट्रीय अंतर्राष्ट्रीय सम्मान तक हासिल कर रही हैं। लेकिन भोजपुरी शायद एकमात्र ऐसी भाषा होगी जिसके अभिनेता को अपना श्रेष्ठ दिखाने के लिए दूसरी भाषा के शरण में जाना पडता हो।सवाल रवि किशन नहीं,भोजपुरी के सामने है,क्या उसके पास भी कभी कोई वेलकम टू सज्जनपुर हो सकेगा,जहां कोई भी अभिनेता अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन को उत्साहित हो सके।

गुरुवार, 12 सितंबर 2013

आजादी की नई परिभाषा गढती -शुद्ध देशी रोमांस



गीता श्री की कहानी प्रार्थना के बाहर की नायिका कहती है, मेरे लिए कोई एक व्यक्ति महत्वपूर्ण नहीं।महत्वपूर्ण है मेरा रास्ता,मेरी पसंद, मेरा आनंद, और आनंद का कोई चेहरा नहीं होता,जो जितनी दूर साथ चले,चलो, नहीं तो भाड में जाओ। स्त्री यौनिकता की आजादी की जो पृष्ठभूमि साहित्य ने तैयार की थी,शुद्ध देशी रोमांस के साथ अब हिन्दी सिनेमा भी अपनी दखल दर्ज करती दिख रही है। यहां भी नायिका गायत्री सेक्स के पहले नहीं सोचती, शादी के नाम पर कन्फ्यूज हो जाती है, तैयार मंडप से भाग जाने की हद तक। जितनी सहजता से वह नायक के साथ काफी पीने तैयार हो जाती है, उतनी ही सहजता से सेक्स के लिए भी। सुप्रीम कोर्ट ने लीव इन को वैधानिकता प्रदान की,जाहिर है इस पर अब विमर्श की गुंजाइश नही। कहने को शुद्ध देशी रोमांस भी लीव इन की ही वकालत करती है,लेकिन मुश्किल यह कि परदे पर जो दिखता है वह कैजुअल सेक्स की कथा ज्यादा लगती है, मतलब सेक्स के लिए किसी इमोशन की जरुरत नहीं,बस इच्छा होनी चाहिए। फिल्म में नायक नायिका कुछ मिनट पहले मिलते हैं,बात शुरु होती है और देखते देखते वे किस में लिप्त हो जाते हैं। दर्शकों के लिए लीव इन जैसे विषय को जिस गंभीरता से लेने की जरुरत थी,कहीं न कहीं जयदीप साहनी इसमें चूकते दिखते हैं।वास्तव में विवाह संस्था कोई कानून के द्वारा लागू की गई चीज नहीं है कि उसे कानून के द्वारा खारिज किया जा सके।वह सभ्यता के साथ सामाजिक अनुशासन के लिए समाज ने स्वयें परिकल्पित की।आश्चर्य नहीं कि किसी न किसी रुप में विवाह संस्था समस्त मानवीय समाज में स्वीकार्य रही।दुनिया भर में आधुनिकता ने बहुत कछ बदला,जरुरतें बदली, मानवीय स्वभाव भी बदले, आशाएं,आकांक्षाएं बदलीं,लेकिन विवाह संस्था अपनी तमाम खूबियों खामियों के साथ कायम रही।जाहिर है सदियों से जो मानवीय आसुरी प्रवृतियों को नियंत्रित करने का साधन ही नहीं,सभ्यता के विस्तार का भी कारण रही हो,उस पर सवाल खडे करना सहज नहीं हो सकता।लेकिन शुद्ध देशी रोमांस के लेखक जयदीप साहनी और निर्देशक मनीष शर्मा जिस हल्के अंदाज में इस विषय को उठाते हैं,एक इमानदार विमर्श के आधार के बजाय एक अराजक समाज की पूर्व पीठिका बन कर रह जाती है।कहते हैं मानव स्वभाव से जानवर होता है, व्यक्ति के रुप में उसे समाज तैयार करता है।समाज शास्त्री भी मानते हैं कि समाज को व्यवस्थित रखने में सामाजिक नियंत्रण की अहम् भूमिका होती है।यही व्यक्ति को रिश्तों की सीख देता है, जवाबदेही का अहसास देता है, संवेदनाएं देता है।
   शुद्ध देशी रोमांस की नायिका गायत्री(परिणति चोपडा) अपने को पारिवारिक अनुशासन से मुक्त करने के लिए गौहाटी में नौकरी कर रहे अपने पिता को अकेले छोड कर पढाई का बहाना बना कर पहले कोटा आती है,फिर जयपुर  शिफ्ट हो जाती है,सिर्फ आजादी के लिए,दूसरा कोई उद्देश्य या लक्षय उसका नहीं दिखता।अंग्रेजी बोल सकने के कारण भाडे पर बारातियों में शामिल होने के काम से वह संतुष्ट दिखती है।उसके लिए आजादी का मतलब दिखता है, सिगरेट शराब और सेक्स। अद्भुत है आजादी की यह ललक जो अपना सब कुछ खोकर पायी जाती है।गायत्री चेन स्मोकर के रुप में दिखती है,परदे पर वह जब भी आती है, सिगरेट स्मोकिंग इज इंजूरियस टू हेल्थ का केप्शन साथ आता है,अफसोस नायिका को सिगरेट पीने के लिए कोई सिर्फ एकबार रोकते दिखता है,जब भाडे के बारातों में शामिल होने का काम देने वाला मैरेज प्लानर बुजुर्ग गोयल(ऋषि कपूर) उसे रोकते हुए कहता है सिगरेट पीते पीते मर जाएगी।यह सुनने में जरुर अच्छा लगता है कि हर किसी को अपनी जिंदगी जीने का अधिकार है,लेकिन कितना अजीब लगता है,जब जिंदगी में कोई गलत को गलत बताने वाला न हो।
रघु(सुशांत सिंह राजपूत) के माता पिता नहीं हैं,वह रजिस्टर्ड टूरिस्ट गाईड है,लेकिन परदे पर जब भी टूरिस्ट के साथ दिखता है, उन्हे ठगते हुए। शादियों के सीजन में रघु भी गोयल के तय बारातों में भाडे पर शामिल होता है।वह अपनी शादी से ठीक वरमाला के पहले भाग खडा होता है क्योंकि उसे बस में एक दूसरी लडकी पसंद आ चुकी है। कमाल यह कि यहां कोई अरेंज मैरेज का मामला नहीं, शादियां वे अपनी इच्छा से तय करते हैं और फिर ऐन शादी के समय भाग जाते हैं।ऐसा ही नयिका भी करती है।उसे लगता है नायक उसके अतीत को जानते हुए उसका साथ नहीं निभा पाएगा। नायक भी अफसोस नहीं करता,और जब उसकी पुरानी पसंद सामने आती है तो उसके पीछे लग लेता है। हो सकता है यह किसी रघु,किसी गायत्री, किसी तारा की कथा हो..लेकिन मुश्किल तब होती है जब इनकी कथित आजादी को फार्मुलेट करने की कोशिश की जाती है।अंतिम दृश्य में नायक नायिका दोनो ही मंडप छोड कर भाग खडे हुए है, नायक कहता है रिश्तों के दरवाजे खुले क्यों नहीं रखे जाते कि जबतक अच्छा लगे साथ रहे,जब चाहे तब निकल लिए। मनीष शर्मा यह स्पष्ट नहीं करते फिर रिश्तों की जरुरत ही कहां रह जाती है।
यूं रिश्तों के प्रति उनका असम्मान पहले दृश्य से ही दिखने लगता है जब गोयल नायिका के बारे में रघु से कहता है कि बारात में यह तुम्हारी बहन बन कर जाएगी,और वहां बहन की रातों की रेट की बात कर मजाक उडाया जाने लगता है।जैसे इतना ही काफी नहीं हो,बहन बन कर जा रही नायिका के साथ बस में ही नायक की चुम्मा चाटी भी शुरु हो जाती है,और हद यह कि बस से उतरने के बाद फिर बहन कह ही परिचय कराया जाता है। रिश्तों के प्रति विद्रुपता की हद यहीं समाप्त नहीं होती, नायक नायिका का रिश्ता जब सेक्स तक पहुंच जाता है,और लीव इन में दोनों साथ रहने लगते हैं तब भी बाहर वे अपने आपको  भाई बहन बताने में संकोच नहीं करते। क्या वाकई लेखक जयदीप या निर्देशक मनीष मानते हैं कि भारतीय समाज में अब कोई रिश्तों के लिए कोई जगह नहीं।यदि हां तो इस विषय पर कम से कम माजाकिया फिल्म तो नहीं ही बनायी जा सकती थी।
गौरतलब है कि रिश्तों की धज्जियां उडाती शुद्ध देशी रोमांस की पृष्ठभूमि में जयपुर जैसे पांपरिक शहर को रखा गया है।नायक का नाम रघुराम है, एक नायिका का गायत्री और दूसरी का तारा।इस उत्तर आधुनिक प्रेमकथा में ये पारंपरिक नाम चौंकाते अवश्य हैं,लेकिन वास्तव में ये लेखक की समझ का साथ देते हैं। निश्चय ही यह कथा मुम्बई या बंगलोर की पृष्ठभूमि में रहती तो शायद कम चौंका पाती। जयपुर,रघु राम,गायत्री और तारा दर्शकों को यह मनवाने की कोशिश है कि यह कहानी किसी दूर देश की कथा नहीं,तुम्हारी है,तुम्हारे पास की है।आश्चर्य नहीं कि रघु और गायत्री जब छत पर शराब के साथ खुशियां मनाते हैं तो गुदगुदी पटना और भागलपुर के युवाओं को भी होती है,जब नायक काम पर निकलने के बजाय नायिका के बटन खोलने लगता है तो सीटियां छोटे शहरों में ज्यादा गूंजती हैं।

जहां आए दिन प्रेम के मायने बदल रहे हों,एकतरफा प्रेम में तेजाब फेंकने से लेकर हत्या तक की खबरों से समाज आतंकित हो।जहां रिश्तों की मर्यादा खतरे में हो, वहां प्रेम को,आजादी को सेक्स का पर्याय बना देने की यह कोशिश वाकई डराती है। अफसोस ड्रग्स के नशे की तरह यह डर भी आनंदित करती है।

शनिवार, 7 सितंबर 2013

विखंडित समाज की व्यथा कथा


' कम उम्र में मां बाप की मृत्यु किसी धोखे की तरह लगती है', अजय बहल की फिल्म 'बी ए पास' का पहला संवाद शायद यही है।वास्तव में यह छोटा सा संवाद इस बात की पूर्व पीठिका है कि मां बाप के बाद दुनिया में सिर्फ धोखे ही शेष रह जाते हैं। जिस संस्कृति में अभी भी संयुक्त परिवार की अवधारणा के प्रति सम्मान कायम हो,जहां टेलिविजन पर अभी भी परिवार के नाम पर 15 से 20 लोगों का समूह दिखाया जा रहा हो,वहां यह सुनना अकल्पनीय लग सकता है ।लेकिन 'बी ए पास' अपने कथा विस्तार में इस स्थिति को सिर्फ दिखाती ही नहीं, इस पर शिद्दत से यकीन भी करवा जाती है। अंतिम दृश्यों में दर्शक हतप्रभ स्थिति में अपने को पाता है, जब शहर से अनजान दो युवा बहनें दिल्ली के बस स्टाप पर अपने भाई की प्रतिक्षा करते हुए बार बार मोबाईल पर फोन कर रही होती है,और भाई पुलिस से बच कर भागते भागते फोन बंद कर उंची इमारत से छलांग लगा देता है।परदे पर तो फिल्म खत्म हो जाती है,लेकिन दर्शकों के मन में चलते रहती है, आखिर क्या गुजर रहा होगा उन लडकियों पर जब भाई का फोन अचानक बंद आने लगा होगा, क्या हुआ होगा उन दो युवा लडकियों का ,कहां गयीं होंगी वे... वाकई बी ए पास उस विखंडित समाज की व्यथा कथा है,जहां लोगों की भीड तो है लेकिन उन्हें एक दूसरे से जोडने वाला भरोसा नहीं है।
अंग्रेजी कथाकार मोहन सिक्का के कथा संग्रह दिल्ली नायर में संग्रहित द रेलवे आंटी पर आधारित बी ए पास आर्थिक दवाब से चरमराते रिश्तों को बेबाकी से रेखांकित करती है। मुकेश (शादाब कमल) के मां-पिता की मौत पर शोक व्यक्त करने परिवार के लोगों का आना जाना लगा है,उसकी बहनें सबों के लिए लगातार चाय बनाने में व्यस्त है,मुकेश चाय बनाने के लिए मना करते हुए कहता है,इन्हें टेसुए बहाने के लिए भी चाय चाहिए। शोक का दौर निकल चुका है और अब परिवार व्यवहारिक जमीन पर उनके बारे में विचार कर रहा है, जिनके सर पर से मां बाप की छाया छिन चुकी है।  तमाम रिश्तेदारों की अपनी मजबूरियां,अपनी व्यस्ततायें हैं।चाचा, मामा वगैरह  कोई भी न तो आर्थिक जवाबदेही उठाने के लिए तैयार होता है,न ही उनकी देखभाल के लिए। दादा आगे आते हैं,वे मुकेश की आर्थिक जवाबदेही का भार उठाने का आश्वासन देते हुए बुआ को उसके बी ए पास करने तक दिल्ली में अपने घर रखने के लिए तैयार कर लेते हैं और दोनो बहनों को अपनी देखभाल में रख लेते हैं। लेकिन जरुरतों से किसी को उम्र तो नहीं मिल जाती, दादा की भी मौत हो जाती है, और एक बार फिर सवाल उठता है अब दोनो बहनों का क्या ..।सारे रिश्ते एकबार फिर निर्रथक हो जाते हैं, तय होता है जब तक मुकेश इनकी जवाबदेही उठाने लायक नहीं हो जाता इन्हें कस्बे के ही हास्टल में रख दिया जाय । वास्तव में अजय बहल उस समाज की अनिवार्यता रेखांकित करने की कोशिश करते है जहां परिवार का दायरा सिर्फ खून के रिश्ते तक ही सीमित नहीं हो।
मुकेश अपनी बुआ के पास दिल्ली आ गया है, बी ए की पढाई करने। इस उम्मीद पर कि बी ए पास कर वह अपनी बहनों की जवाबदेही उठाने के लायक हो सके। यहां भी अजय बहल चरमराते रिश्तों को रेखांकित करने से नहीं चूकते। कभी समय था जब एकल परिवारों में किसी हमउम्र का आना किसी उत्सव से कम नहीं होता था,यहां स्कूल जाने वाला उसके बुआ का बेटा उससे नफरत करता दिखता है, उसकी बुआ भी बात बात पर उसे जलील करने से बाज नहीं आती।आमतौर पर उनका व्यवहार उसके साथ नौकरों वाला ही रहता है। मुकेश के फूफा रेलवे में एक कनिष्ठ अधिकारी हैं।वे रेलवे कालोनी के छोटे से क्वार्टर में रहते हैं। कोलोनियों की आम परंपरा के अनुसार जब उसकी बुआ किटी पार्टी आयोजित करती है, तब उसका काम और भी बढ जाता है। बगैर चेहरे पर शिकन डाले मुकेश महिलाओं के लिए चाय बनाता ही नहीं,उसे सर्व भी करता है,महिलाओं की ओछी टिप्पणियों और भद्दे मजाक को सहते हुए भी।
इन्ही महिलाओं में हैं सारिका आंटी(शिल्पा शुक्ला) भी,बास की पत्नी होने के कारण उनके बीच उनका खास महत्व भी है। वे बुआ से मुकेश को घर पर भेजने कहती हैं, और बुआ उनके बारे में सब कुछ जानते हुए भी मुकेश को लगभग जबरन उसके घर भेजती हैं।यहां से मुकेश के जीवन का एक नया अध्याय आरंभ होता है। वह पहले मुकेश को अपने बिस्तर तक ले जाती है,फिर अपनी कथित सहेलियों के लिए उसे सुलभ बना देती हैं। वास्तव में अजय यह दिखाने में संकोच नहीं करते कि सारिका के लिए यह कमाई का जरिया है। अंधाधुंध कमाई में लगे पतियों की ऐसी असंतुष्ट पत्नियों की कमी नहीं। यह असंतोष जितना शारिरिक जरुरतों को लेकर दिखता है,उतना ही भावनात्मक भी।शायद अपनी कथित यौनिक आजादी का संघर्ष भी।आश्चर्य नहीं कि तमाम महिलाएं मुकेश के साथ सिर्फ अपनी शारिरिक जरुरते पूरी करती नहीं दिखती,अपने सेक्सुअल फैंटेसियों को इंज्वाय करती दिखती हैं। शुरुआती हिचक के बाद मुकेश को भी यह कमाई रास आने लगती है,जो उसके बढते आत्मविश्वास में झलकने लगता है।अब जब बुआ का बेटा उसे अपने घर में रहने का उलाहना देता है तो वह पहले की तरह चुप नहीं रहता, पलट कर जवाब देता है।
उसे जब पता चलता है कि उसकी बहनों के हास्टल में कुछ गलत हो रहा है। वह उनसे मिलने ही नहीं जाता उनके लिए मोबाइल फोन भी लेकर जाता है, और उसे रखने की इजाजत देने के लिए भ्रष्ट वार्डन को पैसे भी देता है।वह उन्हें शीघ्र अपने साथ दिल्ली रखने का आश्वासन है। अद्भुत है रिश्तों का यह खेल कि जहां एक ओर हरेक रिश्ते लाभ लोभ में डूबे दिखते हैं,वहीं एक रिश्ता यह भी है जहां भाई खुद अपने शरीर का सौदा कर अपनी बहन का भविष्य सुरक्षित बनाना चाहता है।लेकिन तब बहुत कुछ बदल जाता है जब सारिका के पति को उसके धंधे की जानकारी मिलती है। वह सारिका से मारपीट ही नहीं करता बल्कि मुकेश की बुआ को उसके पति के प्रमोशन का लालच देकर उसे घर से निकालने के लिए भी तैयार कर लेता है।
घर से निकाले जाने के बाद वह अपने दोस्त जानी के घर आ जाता है। कब्र खोदने वाले जानी की एकमात्र महत्वाकांक्षा मारिशस के सैर की है। जो उसकी सीमित कमाई में शायद ही कभी संभव हो सकता था,लेकिन एक दिन मुकेश जानी को सारिका के पास अपने जमा पैसे लाने भेजता है ताकि अपनी बहनों के लिए घर ले कर उन्हें हास्टल से बुला सके।लेकिन हाथ में पैसे आते ही जानी मारिशस भाग जाता है,और इधर मुकेश को लगता है सारिका ने धोखा दिया, गुस्से में उसके हाथों सारिका की हत्या हो जाती है।बी ए पास सिर्फ मुकेश की कहानी नहीं,किसी भी युवा की कहानी लगती है जो अपना और अपनी बहनों के सुनहरे भविष्य का ख्वाब समेटे दिल्ली आया है। लेकिन जो वह चाहता है,वह उसकी जिंदगी में होता नहीं और जो नहीं चाहता,उसे वह स्वीकार करना पडता है।वह ट्यूशनढूंढने के लिए पर्चे छपवाने के लिए बुआ से पैसे मांगता है ताकि अपनी जरुरतें मेहनत से पूरी कर सके लेकिन पैसे नहीं मिलते उसे। पैसे मिलने पर जब पर्चे छपवा कर वह ट्यूसन ढूंढने की कोशिश करता है तो उसके पास एक भी इंक्वायरी तक नहीं आती।यह कहना आसान लगता है कि वह चाहता तो मजदूरी कर सकता था,लेकिन सामने जब पैसा आसानी से दिख रहा हो तो कैसे किसी युवा से अच्छे बुरे के पहचान की उम्मीद की जा सकती है ,वह भी तब जबकि उसके सामने अच्छे बुरे की कोई परिभाषा ही नहीं हो।  
दिल्ली के पहाडगंज की नियोन लाइट्स के बीच फिल्मायी गयी बी ए पास, समय की चमकार के पीछे छिपे अंधेरे तक दर्शकों को ले जाती है,जहां सिर्फ धोखा है,लालच है,लालसा है,अविश्वास है,और इसका कारण एक ही है,हमारी अंतहीन भूख। यह भूख किन किन रुपों में हमारे सामने परोसी जा रही है,हम शायद समझ भी नहीं पा रहे। जानी की भूख उसके टूटे घर की दिवारों पर लगी मारिशस की तस्वीरों में दिखती है,बुआ की भूख अपने पति के प्रमोशन की है,सारिका को पैसे की भूख है तो उसकी एक सहेली (दिप्ती नवल) ऐसी भी है,जो अपने कोमा में पडे पति की लगातार सेवा की एकरसता दूर करना चाहती है।यह ऐसी भूख है जिसने हमारी मानवीय संवेदना,मानवीय पहचान ही खत्म कर दी है।इसी असीम भूख ने भीड के बावजूद हर व्यक्ति को अकेला कर दिया है। सारिका की हत्या कर मुकेश पडोसियों के सामने भाग निकलता है और सारे लोग देखते रह जाते हैं। अपने सरकारी क्वार्टर में वह नियमित रुप से लडकों को बुलाते रहती है लेकिन कोई कुछ नहीं कहता। उसकी बूढी सास सबों को उसके बारे में बताने की कोशिश भी करते रहती है,लेकिन न तो किसी को उनकी बात सुनने की फुर्सत दिखती है,न यकीन करने की इच्छा। सारिका मुकेश का लगातार उपयोग करते दिखती है शारिरिक ही नहीं,आर्थिक दृष्टि से भी। लेकिन पल भर उसे नहीं लगता मुंह मोडते, जब पति के सामने उसकी सच्चाई सामने आ जाती है,वह खुद से ही उसे दूर नहीं करती,उसके तमाम ग्राहकों से भी उसे दूर कर देती है।कहने को बी ए पास के सारे पात्र संवेदना विहीन दिखते हैं,लेकिन पूरी फिल्म का प्रभाव दर्शकों की संवेदना को कुरेदने का सामर्थ्य रखता है।
अजय बहल मूलतः छायाकार है,कैमरे से इमोशन बयान करना शायद इसीलिए हो भी पाया उनसे। उनका कैमरा चमत्कृत करता है जब लांग शाट में मेट्रो आती दिखती है और धीरे धीरे खिडकी के सीसे से पार मुकेश पूरे डब्बे में अकेला खडा दिखता है।निश्चित रुप से बी ए पास एक खास समय,एक खास समाज की कथा कहती है।लेकिन अजय बहल की यह कुशलता है कि दर्शक इसे सिर्फ कथा की तरह नहीं देख सकता।यह फिल्म डराती है कि यदि इच्छाओं की भूख पर मानवीय नियंत्रण हमने नही सीखा तो कल यह कथा हमारे समाज की भी हो सकती है,किसी के भी समाज की।

गुरुवार, 29 अगस्त 2013

हिन्दी की पहली राजनीतिक थ्रिलर मानी जा सकती है-मद्रास कैफे


जिन्हें आयटम नंबरों और जेम्स बांड की फिल्मों की तरह शयन कक्ष के दृश्यों के बगैर भी थ्रिलर देखने में रुची हो,मद्रास कैफे उनके लिए भी है।सारे इतिहास और राजनीति से परे एक कथा की तरह भी यह फिल्म देखें तो निःसंदेह सांस रोक कर देखे जा सकने वाले एक बेहतरीन थ्रिलर का यह आस्वाद देती है। लेकिन उल्लेखनीय है कि यह सिर्फ थ्रिलर नहीं है, कुछ दिन पहले एक साक्षात्कार में सुजीत सरकार ने कहा था, ऐतिहासिक संदर्भों को जाने बगैर इस फिल्म को समझना कठिन हो सकता है। जिन्हें पता नहीं कि 80-90के दशक में देश किस अवांछित संकट से गुजर रहा था, वे इस फिल्म की गंभीरता का अहसास ही नहीं कर सकते। वाकई आश्चर्य कि हिन्दी सिनेमा के अधिकांश निर्देशक जहां अपने दर्शकों से दिमाग छोड कर फिल्म देखने की अपील करते रहे हैं,वहां सुजीत दर्शकों को इतिहास समझकर सिनेमा घर में आने की चुनौती देते हैं। वास्तव में सुजीत को यह हिम्मत की विषय के प्रति शोध और उसे प्रस्तुत करने की इमानदारी से मिलती दिखती है,जो मद्रास कैफे को थ्रिलर से आगे एक ऐतिहासिक दस्तावेज के रुप में स्वीकार्य बनाती है।
कहने को हिन्दी में राजनीतिक फिल्में बनती रही हैं। आंधी से लेकर माचिस और फिर रंग दे बसंती,राजनीति,आरक्षण तक,एक लम्बी श्रंखला ऐसी फिल्मों की रही है, जो हमारी राजनीतिक समझ को गुगगुदाती रही है। गुदगुदाना इस अर्थ में कि इन कुछ फिल्मों में राजनीतिक सवाल कहानी और इमोशन की चासनी से इस कदर पगे रहे कि उन सवालों की कडवाहट शायद ही कभी दर्शकों को बेचैन कर सकी। मद्रास कैफे में सुजीत सरकार एक ऐतिहासिक संदर्भ को यथावत रखने की कोशिश करते हैं। यदि प्रकाश झा की दामुल और अमृत नाहटा की इमरजेंसी की दौर में बनी किस्सा कुर्सी का को हम याद कर सकें तो इसके राजनीतिक तेवर को उसी क्रम में देख सकते हैं। यहां सुजीत अपनी टिप्पणियां नहीं देते, स्थितियां रखते हैं।लेकिन निरपेक्ष रहते हुए भी वे यह कहने से नहीं चूकती कि किसी भी समस्या का समाधान हिंसा नहीं हो सकता।फिल्म में युद्ध के विद्रुप रुप को दिखाने की कोशिश है जो बाकी युद्ध फिल्म की तरह दर्शकों को उत्तेजित नहीं करता,चिंतित करता है।
वास्तव में इतिहास के जिन पन्नों को सुजीत उठाते हैं,वहां टिप्पणियां संभव भी नहीं।कुछ वर्ष पहले अमिताभ बच्चन अभिनीत एक फिल्म आयी थी ,दीवार,यश चोपडा वाली दीवार नहीं,यह वह दीवार थी जिसमें पाकिस्तान के जेल में बंद 14 कैदियों को छुडाने की मुहिम में नायक पाकिस्तान जाता है और उन कैदियों को छुडा कर लाता है।उसकी मुहिम में एक पाकिस्तानी हिन्दु भी उसके साथ खडा होता है। फिल्म में देखना यह जरुर अच्छा लगता है,लेकिन किसी पाकिस्तानी नागरिक का,चाहे वह हिन्दु ही क्यों न हो,अपनी ही सरकार के खिलाफ षडयंत्र में शामिल होने का क्या समर्थन किया जा सकता है, भले ही वह अपने देश के हित में हो। 80-90 के दशक में जातीय हिंसा की आग में झुलस रहे श्री लंका और भारत की स्थिती भी कमोबेश ऐसी ही रही होगी। श्री लंकाई तमिल अलगाववादी अपनी ही सरकार के खिलाफ मजबूत और हिंसक हो रहे थे, भारतीय तमिल खुश हो रहे थे, बगैर यह महसूस किए कि कल इस सवाल से उन्हें भी जूझना पड सकता है।
हालांकि फिल्म में कहीं भी तमिल अलगाववादियों से भारतीय नेताओं की सहानुभूति रेखांकित नहीं की गई है।बावजूद इसके आज भी यदि मद्रास कैफे को तमिलनाडु में इस आधार पर प्रतिबंधित कर दिया जाता है कि इसमें तमिलों को आतंकवादी के रुप में चित्रित किया गया है तो मानना पडता है हम राष्ट्रवाद को सिर्फ एकांगी रुप में ही स्वीकार कर रहे हैं। ऐसा नहीं हो सकता,राष्ट्रवाद की जो परिभाषा हमारे लिए सही है,वही किसी के लिए भी हो सकती है। यदि हिंसक युद्ध के माध्यम से तमिल अलगाववादी श्री लंका को टुकडे कर एक अलग मुल्क की मांग कर रहे थे तो लाख भाईचारे के कैसे उनके समर्थन में खडा हुआ जा सकता था। लेकिन हम खडे थे। एक ओर एक स्वतंत्र राष्ट्र की संप्रभुता दूसरी ओर जातीय संबंध।
और इसी दुविधा में कहानी की तलाश करती है सुजीत सरकार।भारतीय सरकार की दुविधा, पहले तो उसने राजनीतिक दवाबों में विरोधियों की मदद की, और मामला जब हाथ से बाहर होते दिखा तो सैन्य हस्तक्षेप के लिए तैयार हो गई। मेजर विक्रम सिंह (जॉन अब्राहम)को रॉ के एक ऑपरेशन को कामयाब बनाने के मकसद से श्रीलंका भेजता है। यहां विक्रम को पहले से इसी एजेंसी के लिए काम कर रहे अपने सीनियर सहयोगी बाला की मदद से विद्रोही एलटीएफ हेड अन्ना भास्करन (अजय रत्नम) को शांति वार्ता में शामिल होने और तुरंत युद्ध विराम का ऐलान करने के लिए राजी करना है। अन्ना और उसका संगठन शांति सेना का विरोध करता है,कल तक श्रीलंकाई सेना से मुकाबला कर रहे तमिल अलगाववादी अब भारतीय सेना से आर पार का मुकाबला करते है। अन्ना को वहां रहने वाले तमिलों की पूरी आजादी और उनके लिए अलग मुल्क चाहिए। जाफना आने के बाद विक्रम उस वक्त हैरान रह जाता है, जब उसे पता चलता है कि उसका ऑपरेशन नाकाम होने की वजह अपने कुछ लोगों का एलटीएफ ग्रुप के साथ मिला होना है। विक्रम गुरिल्ला वॉर को कवर करने के लिए लंदन से यहां आई हुई वॉर जर्नलिस्ट जया साहनी (नरगिस फाखरी) की मदद लेता है। इसी ऑपरेशन के दौरान विक्रम को एलटीएफ द्वारा विदेशी शक्तियों के साथ मिलकर देश के पूर्व प्रधानमंत्री की हत्या करने की साजिश का पता चलता है। विक्रम के हाथ कुछ ऐसे पुख्ता सबूत लगते हैं जो पूर्व प्रधानमंत्री की हत्या की साजिश को बेनकाब करने के लिए बहुत है। सरकारी कायदे-कानूनों की आड़ में सुरक्षा एजेंसियां इस साजिश की जानकारी मिलने के बावजूद पूर्व प्रधानमंत्री को सुरक्षा कवर देने को राजी नहीं होतीं।
इतिहास का फिल्मांकन शायद आसान भी होता हो क्योंकि इतिहास में खुद के घुसपैठ की गुंजाइश हमेशा बनी रहती है।यहां इतिहास नहीं सच है। जिससे रु बरु होने वाली पीढी की याददाश्त भी अभी कमजोर नहीं पडी।जाहिर है सुजीत के सामने चुनौतियां बडी थी। आश्चर्य नहीं कि लगभग आधे समय तक यह डाक्यू-ड्रामा की झलक देती है।सच और सच कहने की जिद पूरी फिल्म में महसूस की जा सकती है,यहां भारतीय सेंसर की सीमा पर अवश्य अफसोस होता है कि चरित्रों के वास्तविक नाम नहीं लिए जा सकते। आखिर हरेक दर्शक जब चरित्रों को पहचान रहा होता है कि यह लिट्टे की चर्चा है,यह प्रभाकरण है,ये राजीव गांधी हैं..तो हम ऩाम नहीं बता कर धोखा किसे दे रहे होते हैं।वास्तव में जब सिनेमा प्रौढ हो रहा है,दर्शक प्रौढ हो रहे हैं तो अब समय आ गया है कि सेंसर भी अपनी प्रौढता दिखाए।

सुजीत सरकार की यह खासियत है कि यहां वे दर्शकों को सप्रयास इंटरटेन करने की कोशिश नहीं करते। उनका उद्देश्य दर्शकों को उस कठिन दौर का अहसास कराना दिखता है।पूरी फिल्म एक ग्रे कलरटोन में चलती है।बारुद के करीब लगता यह कलरटोन हमेशा युद्ध के तनाव में जकडे रखने में कहीं न कहीं सहायक होता है।फिल्म में कई परिचित जवाबदेह चेहरे हैं जो फिल्म की गंभीरता को कायम रखते हैं,निश्चय ही सुजीत का यह निर्णय सायास ही होगा।